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पौधे उगाने की सबसे अनुपजाऊ जगह मानव का दिमाग है| इंसान के माथे में पौधा लगाना बहुत कठिन है, मिट्टी में लगाना तो आसान है|

वन विभाग अपनी पौधशालाओं में हर साल सैकड़ों प्रजातियों के करोड़ों पौधे पूरे देश भर में उगाता है|

उन्हें आकर्षक दरों पर लोगों को प्रोत्साहित करते हुये बांटने का तमाम इंतजाम करता है, लेकिन दुनिया भर के तामझाम करने और लोगों को रिझाने के बाद भी किसी भी शहर या गाँव में थोड़े से लोग हैं जो पौधशालाओं में पौधे लेने के लिये पहुंचते हैं|

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कुछ लोग तो मन से रोपण करते हैं पर बहुत से लोग पौधे लगाते हुये बढ़िया चमकदार फोटो खिंचा कर अपने कर्तव्य की इतिश्री करते हैं|

फोटो खींचने-खिंचाने का मज़ा तब और बढ़ जाता है जब वरिष्ठ पत्रकार वहां रहते हैं| छपना भी तो जरूरी है, तभी न दुनिया को पता चलेगा कि हम कितने बड़े पर्यावरण प्रेमी हैं!

आजकल एक नवाचारी तरीका भी लोगों ने खोज लिया है| पौधा, झारा, बैनर, फोटोग्राफर और पौधा लगवाने वाली सुन्दर और सुघड़ टीम तुरंत सारा सामान लेकर हाज़िर हो जाती है|

आप जहाँ भी समारोह करना चाहें, यह टीम माहौल खींचने के लिये तैयार रहती है| बस आपको थोड़ा जलपान आदि का इंतजाम करना पड़ता है| यहाँ तक तो बात बिलकुल ठीक है|

पर फोटो खिंचाने के बाद से लेकर अगले दस साल तक उन बाल-पौधों को कौन पालेगा पोसेगा जिन्हें आपने रोपा है?

गड्ढे में एक पौधा रखने और मुस्कुराते हुये फोटो खिंचा लेने से अगर पौधे लग गये होते तो हमारे आसपास खूब हरियाली होती| दरअसल एक पौधा लगाने के लिये आपको पूरा मन प्राण झोंकना पड़ता है|

पौधे को बच्चों की तरह लालन-पालन करना होता है| उन्हें समय-समय पर खाद और पानी देना होता है| सर्दी-गर्मी से उनका बचाव करना होता है|

धरती में पौधा खोंस देने मात्र से काम नहीं चलता| यह उम्मीद करना बेमानी है कि पौधे हम लगायें और पाल-पोस कर कोई और बड़ा करे|

एक नागरिक होने के नाते हमारे द्वारा अपने आसपास रोपित पौधों के दीर्घकालीन पालन-पोषण और बड़ा करने का उत्तरदायित्व भी हमारा ही है|

हाँ, इस दायित्व को निभाना मेहनत का कार्य है, और उससे मिलने वाला संतोष और सुख अनमोल है|

जब एक छोटा पौधा आपकी छत्रछाया में बढ़कर एक वृक्ष का रूप लेकर आपको छत्रछाया देता है, तो आप यकीन मानिये जितने बार आप उस वृक्ष की ओर निहारते हैं उतने बार आपको एक ऐसे आनंद की अनुभूति होती है जिसे शब्दों में नहीं लिखा जा सकता|

कम से कम इस वर्षा ऋतु में तो धरती माता के साथ फोटो-खिंचाऊ छल मत करिये| पौधा आप रोपित करें और उसे पालने-पोसने का ठेका किसी और का हो, यह तो बात बनी नहीं|

भले ही आप अपने जीवनकाल में एक ही पौधा लगायें, परन्तु उसे पाल पोस कर अवश्य बड़ा करें| हमारे बस का नहीं है तो लगाने का नाटक क्यों किया जाये| बात कटु है पर सत्य और पथ्यकारी है|

आजकल एक और चलन चल पड़ा है| हम अपने पुरखों की याद में पेड़ लगाते हैं| कई ऐसे उपवन हैं जहां पैसे देकर पौधों के रखरखाव की जिम्मेदारी किसी और को दे दी जाती है|

यह तो फिर भी ठीक है| आप द्वारा दी गई धनराशि ऐसे स्थलों को हरा भरा करने में बहुत मददगार है| पर कभी-कभी उन पौधों को जाकर देखा भी करिये|

कभी-कभी उन्हें जा कर अपने हाथ से प्यार और दुलार से संभालिये| कभी-कभी उन पौधों से जाकर बात करिये| आपको परम आनंद की अनुभूति होगी|

धन की व्यवस्था कर किसी अन्य से पौधे लगवाना एक बात है, लेकिन अपने हाथ से उन्हें पाल पोस कर बड़ा करना एक परम पवित्र कार्य है|

अगर आप अपने जीवन में कम से कम एक पौधा लगाकर वृक्ष का रूप न दे सके, तो जीवन में आपने किया ही क्या! बात का स्वाद कुछ कटु-तिक्त-कषाय है, लेकिन आज कहना जरूरी है।

विश्व में 70 से 80 प्रतिशत जनसंख्या आज भी पौधों से किसी न किसी रूप में औषधि की जरूरतों को पूरी करती है|

यही कारण है कि हमारे घरों में प्राचीनकाल से ही बाग-बगीचे लगाने और उनमें रोजमर्रा के उपयोग हेतु औषधीय पौधे उगाने की सुदृढ़ प्रक्रिया और परंपरा है|

भारत में गांवों और शहरों के विकास तथा मानव के स्थायी निवास की शुरूआत से लेकर, घरों के आसपास पौधारोपण की परंपरा कम से कम 5000 साल पुरानी है| आज देश के अधिसंख्य घरों में किसी न किसी रूप में हरियाली या होम-गार्डन लगे हुये हैं|

इस वर्षा ऋतु में एक छोटा औषधीय उपवन लगाना है तो कुछ सलाह यहाँ उपयोगी है| पहली बात यह है कि घर, आयुर्वेदिक, यूनानी, आयुष या किसी भी तरह के चिकित्सालयों और दफ्तरों के इर्द-गिर्द औषधीय पौधों की उन प्रजातियों को उगाया जाना बहुत लाभकारी होता है जो रोज रोज काम आ सकते हैं|

नीम, बेल, आंवला, बरगद, पीपल, सीताफल, गूंदी, मीठी नीम, घृतकुमारी, तुलसी, हडजोड़, काली पीपल, अश्वगंधा, कालमेघ, अडूसा, पपीता, अदरक, निर्गुन्डी, अपामार्ग, गिलोय, पत्थरचटा, धनिया, जीरा, मरुआ, पुदीना, पत्ता अजवाइन, अदरक, लेमन घास, वज्रदंती, हल्दी या ऐसे ही अन्य पौधों को घरों और चिकित्सालयों में आसानी से उगाया जा सकता है|

दूसरी बात यह है कि छोटे बाग़-बगीचों में ऐसी प्रजातियों को प्राथमिकता दिया जाना चाहिये जो भोजन, रसायन एवं औषधि तीनों में ही प्रयुक्त हों, त्रिदोषशामक हों, और जिनसे दवा आसानी से घर पर ही बने जा सके|

स्थानीय ज्ञान, वैज्ञानिक ज्ञान एवं हमारी आवश्यकता तीनों को ध्यान में रखते हुये रोपण या बुवाई की जानी चाहिये|

तीसरी बात यह है कि तिजोरी में धन और बगीचे में पौधों का संग्रह धीरे धीरे ही होता है| अतः यदि आप एक साथ औषधीय पौधों की बुवाई या रोपण न कर सकें तो वर्ष भर में समय समय पर प्रजातियों की विविधता को समय के साथ बढ़ाते रहें|

चौथी बात यह है कि उपवन या बगिया का कुछ क्षेत्र ऐसा अवश्य हो जहां अनेक प्रजातियों के पौधे इस प्रकार लगाये जायें कि प्राकृतिक क्षेत्र का आभास हो|

यदि आप अपने बगीचे में 50 प्रजातियों के पौधे उगाना चाहते हैं तो इनमें से अधिसंख्य को उपवन के एक कोने में बेतरतीबी से बहु-प्रजातीय पौधे रोपित करें कि उस क्षेत्र में प्राकृतिक वनों की तरह बीजोत्पादन, बीज विकीर्णन, पुनरुत्पादन जैसी पारिस्थितिकीय प्रक्रियायें समय के साथ अपने आप संचालित होने लगें| यह सेमी-वाइल्ड हिस्सा बहुत मनोहारी, आरोग्यकर एवं उपयोगी होता है|

पांचवीं बात यह कि बीज, कलम और पौधे प्राप्त करने सबसे आसान तरीका परिवारों के मध्य आदान-प्रदान है जो मानव सभ्यता के विकास के साथ ही विकसित हुआ है|

उदाहरण के लिये, जब भी आप किसी परिवार या चिकित्सालय की सुंदर बगीची देखें तो उनसे कुछ पौधे अवश्य मांग कर लायें और अपने उपवन में लगायें|

इसी प्रकार आप उन लोगों को भी कुछ पौधे उपहार में दें| आप वन विभाग द्वारा या आयुष मिशन के अंतर्गत तैयार पौधशालाओं से भी पौधे लाकर लगा सकते हैं|

रोपणकाल में यदि प्रत्येक सप्ताह एक प्रजाति के पौधे अपने बगीचे में आयें तो धीरे-धीरे उपयोगी जैव-विविधता का संग्रह हो जाता है|

छठा, घर में लगाये गए उपवन के आरोग्यकर, बहुउपयोगी एवं मनोहारी दृश्य का गंभीर मनोवैज्ञानिक प्रभाव स्वास्थ्य पर पड़ता है|

प्रतिदिन जब आप अपनी बगिया में लगे पौधों को निहारते हैं तो स्वयं स्वस्थ रहने की उत्कट लालसा जागती है| यह दिव्य मनोवैज्ञानिक प्रभाव औषधि की तरह कारगर है|

सातवाँ बात यह है कि यदि आपके पास जगह की कमी हो तो गमलों तथा पुराने टूटे पड़े कंटेनर्स में भी अनेक प्रजातियों के पौधे उगाये जा सकते हैं|

इसी प्रकार पानी की कमी को पौधों के इर्द-गिर्द थांवला बनाकर वर्षा-जल का लाभ लिया जा सकता है|

घरों में औषधीय प्रजातियों का रोपण और संरक्षण हमारे पारंपरिक ज्ञान को विलुप्त होने से बचा सकता है|

जैसे जैसे स्थानीय प्रजातियों का हमारे आसपास से विलोप हो रहा है, वैसे वैसे उपयोग घटने के कारण पुरानी पीढ़ी से नई पीढ़ी में स्थानीय ज्ञान का आदान-प्रदान भी घट रहा है|

अंततः, प्रजातियों के लुप्त होने से पीढ़ियों का संचित ज्ञान भी लुप्त हो जाता है|

आपकी बगिया में पनप रहे औषधीय पौधे प्रमाणिक बीजों का भी सबसे अच्छा स्रोत हैं| अपने पड़ोसियों, मित्रों और संबंधियों के साथ बीजों का आदान-प्रदान हमारी पुरानी परंपरा है|

आज भी एशिया, अफ्रीका, दक्षिणी अमेरिका, उत्तरी अमेरिका, यूरोप आदि महाद्वीपों के देशों में यह परंपरा यथावत विद्यमान है और अनवरत जारी है|

बीजों के इस आदान-प्रदान को सम्पूर्ण विश्व का समाज एक सुखद तोहफ़ा मानता है|

पौधे पहले हमारे माथे में लगते हैं| जिसके मन-मस्तिष्क में पौधारोपण हो गया, वह मिट्टी में तो उगा ही लेता है|

बगिया में उग रहे पौधे सहज ही स्वस्थ रहने की प्रेरणा देते रहते हैं| आज उगाये गये औषधीय पौधे कल हमारे प्रियजनों की भी जान बचा सकते हैं|

कम से कम अपने जीते जी बरगद, पीपल, नीम, महुआ, जामुन, अर्जुन, आम, खजूर, करंज, कदंब, खेजड़ी, सीताफल, आंवला, बहेड़ा, हरड़, तुलसी, कालमेघ व गुडूची का रोपण और पालन-पोसन कर बड़ा कीजिये।

डॉ. दीप नारायण पाण्डेय
(इंडियन फारेस्ट सर्विस में वरिष्ठ अधिकारी)
(यह लेखक के निजी विचार हैं और ‘सार्वभौमिक कल्याण के सिद्धांत’ से प्रेरित हैं|)