योग और आयुर्वेद दोनों ही प्रायोगिक विज्ञान हैं| इसलिये न केवल दोनों में अनेक समानतायें हैं, बल्कि चिकित्सा विज्ञान होने के नाते आयुर्वेद में योग के चिकित्सकीय और स्वास्थ्य-विषयक उपयोग के लिये प्रायोगिक कदम भी स्पष्ट दर्शित किये गये हैं|

आचार्य चरक का मुख्य ध्येय योग के चिकित्सकीय उपयोग और रोगों के उपचार के लिये है, इसलिये स्पष्ट रूप से मन को आत्मा में लगाने की प्रक्रिया में शामिल वास्तविक कदम दिये हैं।

वास्तव में आचार्य चरक ने योग में आवश्यक एकाग्रता को सुन्दर व्यावहारिक कदमों के द्वारा चिकित्सार्थ या स्वास्थ्य-रक्षणार्थ क्रियान्वित करने की विधि सुझाई है।

जैसा कि हम आगे देखेंगे, यहां आप आचार्य पतंजलि और आचार्य चरक के दृष्टिकोण के बीच लगभग मौलिक समानता पाते हैं (देखें सन्दर्भ 1, च.शा.1.138-139:): आत्मेन्द्रियमनोर्थानां सन्निकर्षात् प्रवर्तते|

सुखदुःखमनारम्भादात्मस्थे मनसि स्थिरे|| निवर्तते तदुभयं वशित्वं चोपजायते| सशरीरस्य योगज्ञास्तं योगमृषयो विदुः||

ध्यानपूर्वक देखिये, आचार्य चरक की उपरोक्त परिभाषा और आचार्य पतंजलि की परिभाषा कि योग चित्त की वृत्तियों का निरोध है— योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः —में बहुत समानता है|

इसी बात को कठोपनिषद् (2.3.11) में भी स्पष्ट किया गया है — तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम्‌|

तात्पर्य यह कि योग वही जब इन्द्रियाँ कब्जे में हों| यही वह स्थिति है जिसको श्वेताश्वतरोपनिषद् (2.12) के अनुसार जरा और मृत्यु सब समाप्त हो जाना कहा गया है: पृथिव्यप्तेजोऽनिलखे समुत्थिते पञ्चात्मके योगगुणे प्रवृत्ते। न तस्य रोगो न जरा न मृत्युः प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम्‌॥

चरकसंहिता में प्राणायाम की चर्चा न होते हुये भी प्राण-तत्व एवं उसका स्वास्थ्य व रोग के संदर्भ में गहन विश्लेषण मिलता है। योग और आयुर्वेद दोनों में ही रजोगुण, तमोगुण, और सतोगुण की भूमिका और पारस्परिक सम्बन्ध सर्वविदित हैं।

योग अपनी समग्रता में कैवल्य की ओर ले जाता है, परन्तु कैवल्य प्राप्ति की यात्रा जरा-व्याधि पीड़ित तन में संभव नहीं है। आयुर्वेद के द्वारा जरा-व्याधि मुक्त शरीर और मस्तिष्क पाया जा सकता है जिसमें दोष, अग्नि, धातु, मलक्रिया सम हों तथा आत्मा, इन्द्रियां व मन प्रसन्न हों।

योग मोक्ष का प्रवर्तक है। किन्तु अनेक बीमारियों से जूझ रहे समकालीन विश्व ने अपनी सुविधा से कैवल्योन्मुख योग को स्वास्थ्योन्मुख योगा बना लिया है।

कैवल्योन्मुख हो या स्वास्थ्योन्मुख, योग व्यक्तिगत और वैश्विक कल्याण का बीज है। कैवल्योन्मुख योग की स्वास्थ्योन्मुखता आज आर्थिक वरदान भी हो गयी है।

समकालीन विश्व में योग की व्यापारिक सफलता का राज योग की स्वास्थ्योन्मुखता में छिपा है। अब जब भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान योग (आसन, प्राणायाम और ध्यान आदि) का प्रजनन स्वास्थ्य पर प्रभाव पर शोध करने लगा है तो यकीनन योग अब कैवल्योन्मुख से स्वास्थ्योन्मुख हो गया है|

यों तो प्राचीन भारतीय मनीषियों ने योग पर बहुत कुछ समझा और लिखा है, परन्तु सबसे महत्वपूर्ण कार्य महर्षि पतञ्जलि का है।

पतञ्जलि योगसूत्र में योग के समस्त सिद्धान्तों, दर्शन और अभ्यास का सूत्रीकरण है। भारत में योग के उद्भव के प्रमाण लगभग तीन हजार वर्ष ईसा पूर्व से मिलते हैं।

इसके पश्चात् योग का संदर्भ उपनिषदों, जिनका समयकाल प्रायः 500 से 600 ईसा पूर्व माना जाता है, में मिलता है।

उसके बाद के ग्रन्थों में मुख्य रूप से महाभारत के उस अंश जिसे गीता कहा जाता है, और जिसका समयकाल ईसा के 400 वर्ष पूर्व से लेकर कुछ बाद तक माना जाता है, में योग पर गंभीर चर्चा की गई है।

इन विविध संदर्भों को समाहित करते हुये एवं तत्समय में प्रचलित भारत के अनुभवजन्य-ज्ञान को पतञ्जलि ने 200 से 300 वर्ष ईसा पूर्व योगसूत्र की रचना की।

बाद के वर्षों में 1950 से लेकर 1980 के दशक तक अनेक भारतीय योग शिक्षकों ने योग को पश्चिमी देशों में पहुंचाया।

पतञ्जलि योगसूत्र के अनुसार योग के आठ अंग बताये गये हैं: यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। महर्षि पतञ्जलि ने योग को चित्त की वृत्तियों के निरोध–

“योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः”– के रूप में परिभाषित करते हुये 196 सूत्रों के माध्यम से अंततः कैवल्य– “पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति”– का मार्ग दिखाया है।

योग के प्रथम पांच अंग अर्थात, यम, नियम, आसन, प्राणायाम तथा प्रत्याहार बहिरंग और बाकी तीन अंग धारणा, ध्यान, समाधि अंतरंग नाम से जाने जाते हैं।

जब तक आप बहिरंग साधना को नहीं साध लेते तब तक अंतरंग साधना प्राप्त नहीं हो सकती। यम में पांच प्रकार यथा अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, और अपरिग्रह शामिल हैं।

नियम में भी पांच प्रकार यथा शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान शामिल हैं। आसन का अर्थ उस देहस्थिरता से है जो सुखदायी हो।

आसन लग जाने पर श्वास प्रश्वास की गति के विच्छेद के अभ्यास को ही प्राणायाम कहा जाता है। जहाँ एक ओर आसन देह के स्थिरता की साधना है वहीं दूसरी ओर प्राणायाम प्राणों के स्थिरता की साधना है।

देह और प्राण की स्थिरता के बिना मन की स्थिरता, जो योग के अंतिम तीन अंगों से प्राप्त की जाती है, संभव नहीं है। प्रत्याहार वास्तव में प्राण और मन की स्थिरता के बीच सेतु का काम करता है।

देहस्थैर्य और प्राणस्थैर्य से इंद्रियाँ बाहरी विषयों से हटकर अंतर्मुखी हो जाती हैं, इसे प्रत्याहार कहा जाता है। बहिर्मुखी गति के निरोध से अंतर्मुखी होकर मनस्थैर्य की चेष्टा को धारणा कहा जाता है।

ध्यान इसके आगे की अवस्था है और ध्यान से आगे परमानंद की अवस्था ही समाधि है।

अष्टांग योग या आठ अंगों वाला योग वस्तुतः आठ आयामों वाला मार्ग है जिसमें आठों आयामों का अभ्यास एक साथ किया जाता है।

इनमें यम सार्वभौमिक मूल्यों पर, नियम व्यक्तिगत मूल्यों पर, आसन विभिन्न प्रकार की शारीरिक मुद्राओं और व्यायामों पर, प्राणायाम श्वसन और प्राण पर नियंत्रण, प्रत्याहार चेतनता पर नियंत्रण, धारणा एकाग्रता से सम्बंधित, ध्यान मन की स्थिरता से सम्बंधित एवं समाधि परमानन्द से संबंधित है।

यहाँ यह समझना आवश्यक है कि अपने मूल स्वरुप में अष्टांग योग के आठों अंग आपस में संबंधित हैं और एक दूसरे से पृथक नहीं हैं।

योग का मूल दर्शन शरीर, मन, और आत्मा के योग, और इन सबका ब्रह्म के साथ योग को लेकर है।

योग पर हमारे आधुनिक दृष्टिकोण ने इसे मात्र शारीरिक-मानसिक व्यायाम और श्वसन क्रिया मान लिया है।

विश्वभर में योग पर जो वैज्ञानिक शोध हुई है वह वस्तुतः केवल आसन, प्राणायाम एवं ध्यान तक ही सीमित है, और उसका मूल उद्देश्य कैवल्य न होकर केवल स्वास्थ्य के विषय तक सीमित है।

एक आश्चर्यजनक बात यह है कि विश्वभर में हुई शोध में से 83 प्रतिशत शोधपत्र, अर्थात् कुल 5754 शोधपत्रों में से 4781 ऐसे हैं जो पूर्णतया विदेश में रहने वाले वैज्ञानिकों द्वारा लिखे गये हैं।

शेष 17 प्रतिशत या 973 शोधपत्र या तो भारत में रहने वाले वैज्ञानिकों या भारतीयों और विदेशियों के साथ साझे में हैं।

कहने का तात्पर्य यह है कि जिस योग का जन्म भारत में हुआ आज उस पर भारत में नाम मात्र की शोध हो रही है।

योग और आयुर्वेद के मूल उद्देश्य में अंतर को तो महर्षि चरक ने स्वयं यह कहते स्पष्ट किया है कि आयुर्वेद का उद्देश्य स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा और पीड़ित व्यक्ति के विकार का शमन है (च.सू. 30.26): स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणम् आतुरस्य विकारप्रशमनम्।

जबकि, योग व मोक्ष में वेदनायें नहीं, मोक्ष होने पर वेदनाओं से पूर्ण निवृत्ति हो जाती है, योग मोक्ष का प्रवर्तक है (च.शा. 1.137) योगे मोक्षे च सर्वासां वेदनानामवर्तनम्।

मोक्षे निवृत्तिर्निःशेषा योगो मोक्षप्रवर्तकः॥ योग के यम व नियम और आयुर्वेद के आचार रसायनों में कोई अंतर नहीं है। योग के आसनों, व कुछ सीमा तक प्राणायाम व ध्यान, की आयुर्वेद के व्यायामों से साम्यता है।

योग के यम, नियम, आसन, प्राणायाम व ध्यान तथा आयुर्वेद के व्यायाम, आचार रसायन व स्वास्थ्यवृत्त शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य के सन्दर्भ में परस्पर समान और समरूप परिणामदायक हैं। शारीरिक दोष दैव-व्यपाश्रय व युक्ति व्यपाश्रय चिकित्सा से शांत हो जाते हैं।

मानसिक दोष ज्ञान (आत्म-ज्ञान), विज्ञान (यथार्थ ज्ञान), धैर्य (चित्त की स्थिरता), स्मृति (अनुभूत का स्मरण), व समाधि (विषयों से मन हटाकर आत्मस्थ होना) से शांत हो जाते हैं। वस्तुतः बुद्धि, धैर्य व स्वयं की समझ मनोरोग की परम औषधि है।

चरकसंहिता में प्राणायाम की चर्चा न होते हुये भी प्राण-तत्व एवं उसका स्वास्थ्य व रोग के संदर्भ में गहन विश्लेषण मिलता है।

योग और आयुर्वेद दोनों में ही रजोगुण, तमोगुण, और सतोगुण की भूमिका और पारस्परिक सम्बन्ध सर्वविदित हैं।

योग अपनी समग्रता में कैवल्य की ओर ले जाता है, और कैवल्य प्राप्ति की यात्रा जरा-व्याधि पीड़ित शरीर और मनःस्थिति में संभव नहीं है।

आयुर्वेद के द्वारा जरा-व्याधि मुक्त शरीर और मस्तिष्क पाया जा सकता है जिसमें दोष, अग्नि, धातु, मलक्रिया सम हों तथा आत्मा, इन्द्रियां व मन प्रसन्न हों।

योग व आयुर्वेद की जुगलबंदी स्वास्थ्य, सम्पदा व सुख के रूप में पुनर्परिभाषित कैवल्य देने में समर्थ है।

योग विश्वभर में आज 80 अरब डालर का उद्योग बन चुका है। अगर भारत में देखें तो योग और वेलनेस उद्योग 490 अरब रुपये का हो चुका है।

शान्ति और स्वास्थ्य की खोज का यह बाज़ार अमेरिका में 28 से 30 बिलियन डालर का है।

हम सबके लिये इस तमाम चर्चा का महत्त्व यह है कि योग्य आयुर्वेदाचार्यों और योगाचार्यों की मदद से योग को हम अपनी दिनचर्या में अवश्य शामिल करें।

अब विश्व भर में हुई शोध से यह निर्विवाद सिद्ध हो चुका है कि आसन, प्राणायाम और ध्यान मानव के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य में सुधार करते हैं।

असल में योग मानव स्वास्थ्य में समग्र बेहतरी लाता है।

डॉ. दीप नारायण पाण्डेय
(इंडियन फारेस्ट सर्विस में वरिष्ठ अधिकारी)
(यह लेखक के निजी विचार हैं और ‘सार्वभौमिक कल्याण के सिद्धांत’ से प्रेरित हैं|)