CPEC के माध्यम से पाकिस्तान पर कब्जा करेगा चीन, POK में होगा भारत-चीन-पाकिस्तान के बीच युद्ध!

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चीन पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर (CPEC) के माध्यम से चीन एक तरफ जहां पाकिस्तान के ऊपर आर्थिक रूप से कब्जा करने का प्रयास कर रहा है, तो दूसरी तरफ इसके द्वारा अफगानिस्तान के अंदर अपनी पहुंच बनाने के इरादे से भी काम कर रहा है।

इस परियोजना के द्वारा चीन प्रतिवर्ष अपने लाखों डॉलर बचाने का काम करेगा, तो दूसरी तरफ पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में भी कब्जा करने का जतन शुरू कर चुका है।

46 बिलियन डॉलर के निवेश के साथ पाकिस्तान के अंदर चीन सीपीईसी के नाम से यह गलियारा बना रहा है। इस गलियारे के द्वारा चीन प्रतिवर्ष ग्वादर बंदरगाह के यहां से 19 बिलियन टन कच्चे तेल का सीधा आयात कर सकेगा।

यह कच्चा तेल अभी चीन के पास 12000 किलोमीटर की दूरी तय करके पहुंच रहा है। इस योजना के बनने के बाद चीन के पास प्रतिवर्ष 19 बिलियन टन तेल केवल 3000 किलोमीटर की दूरी में पहुंच सकेगा।

वैसे तो पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान का कहना है कि जब अमेरिका ने उसको मिलने वाली आर्थिक सहायता रोक दी, तब आर्थिक संकट के दौर में चीन जैसे पड़ोसी देश ने बड़ी मदद की थी। लेकिन हकीकत यह है कि इस योजना के माध्यम से पाकिस्तान की संप्रभुता पर ही खतरा शुरू हो चुका है।

सर्वविदित है कि चीन की नीति विस्तारवादी है और वहां पर समाजवाद का अंत हो चुका है, हिटलरशाही राज कर रही है। चीन के वर्तमान राष्ट्रपति शी जिनपिंग आजीवन राष्ट्रपति बन चुके हैं। जब तक हो जाएंगे, तब तक चीन के राष्ट्रपति बने रहेंगे। ऐसी स्थिति में शी जिनपिंग की सरकार अपनी मर्जी से काम कर रही है।

2442 किलोमीटर में 46 बिलियन डॉलर का निवेश किया गया है। इसके जरिए चीन को ग्वादर बंदरगाह से प्रतिवर्ष 19 मिलियन टन कच्चा तेल सीधे चीन पहुंच सकेगा। इससे पहले चीन ने 1998 में ग्वादर बंदरगाह का निर्माण शुरु किया था, जो 2002 में पूरा हो गया था। यह बंदरगाह बलूचिस्तान के बिल्कुल नजदीक है।

चीन-पाकिस्तान की सरकारों ने 18 दिसंबर 2017 को इस योजना को मंजूरी दे दी थी। इस योजना के तहत पाकिस्तान ने पाक में ही चीनी मुद्रा, युआन के इस्तेमाल को भी मंजूरी दे दी है। दोनों देशों के बीच 2030 तक आर्थिक हित साझेदार रहेंगे। उसके बाद चीन इस गलियारे का पूरी तरह इस्तेमाल करने लगेगा। इस पूरे कॉरिडोर पर केवल चीन का कब्जा होगा, पाकिस्तान का कोई दखल नहीं होगा।

चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत ने कई बार अपनी आपत्ति दर्ज करवाई है। भारत ने न केवल चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ अपनी आपत्ति दर्ज करवाई, बल्कि भारत सरकार ने पाक अधिकृत कश्मीर में से होकर गुजर रहे इस गलियारे को लेकर रूस की सरकार के समक्ष भी अपना विरोध जताया था। इस प्रकरण को लेकर चीन ने भारत की सभी आपत्तियां दरकिनार कर दी।

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चाइना और पाकिस्तान की आर्थिक हितों की बात की जाए तो चीन इस योजना के माध्यम से पाकिस्तान में 46 बिलियन डॉलर का निवेश कर रहा है। यह योजना दक्षिण एशिया की भू- राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव लाने के लिए बताई जा रही है।

योजना का उद्देश्य चीन के उत्तरी पश्चिमी प्रांत के कासगंज से होकर पाकिस्तान के बलूचिस्तान होते हुए ग्वादर बंदरगाह के बीच सड़कों के माध्यम से 3000 किलोमीटर का एक बड़ा नेटवर्क बनाती है।

दूसरी तरफ ढांचागत योजनाओं के द्वारा भी संपर्क स्थापित किया जा रहा है। दोनों देशों के बीच हुए एमओयू के दस्तावेजों के मुताबिक इस योजना को 2030 तक पूरा कर लिया जाएगा। जिससे दोनों देशों को फायदा होगा।

इस गलियारे के निर्माण के बाद चीन अपनी उर्जा आयात करने के लिए वर्तमान में 12000 किलोमीटर लंबे रास्ते के बजाय केवल 3000 किलोमीटर के रास्ते का इस्तेमाल करने लगेगा। इससे हर साल चीन के लाखों डॉलर की बचत होगी।

इतना ही नहीं, हिंद महासागर तक उसकी पहुंच भी सीधी हो जाएगी, जो एक भौगोलिक जीत के रूप में देखे जा रही है। इसके साथ ही पाकिस्तान को उम्मीद है कि उसका निर्माण ढांचा विकसित होगा और जिसके चलते उसके यहां पर ऊष्मा, सौर ऊर्जा, जल और पवन ऊर्जा से संचालित होने वाले यंत्रों के लिए अलग से 34 बिलियन डॉलर की संभावित राशि भी मिलने लगेगी।

इसके चलते पाकिस्तान की आर्थिक संकट में भी कमी आएगी। भविष्य की बात की जाए तो सीपीईसी का हिस्सा बनने को लेकर ईरान, रूस और सऊदी अरब भी काफी उत्साहित नजर आ रहे हैं। इस योजना के तहत चीन पाकिस्तान को 8 पनडुब्बी की आपूर्ति करेगा, जिसके कारण पाकिस्तान के नोसैनिक ताकत में भी काफी भर्ती होगी।

संप्रभुता के हिसाब से बात किया जाए तो एक तरह से पाकिस्तान के बीचों बीच से गुजरने वाली इस योजना के बाद पूरे पाकिस्तान पर चीन का एक तरह से कब्जा हो जाएगा। योजना के द्वारा पाक बीच में से दो हिस्सों में बांट रहा है।

यहां पर काम करने वाले श्रमिक भी चीनी हैं, अधिकारी और इंजीनियर भी चीन से ही हैं। पाकिस्तान के लोगों को इस योजना में अभी तक कोई रोजगार नहीं दिया गया है। जबकि पाकिस्तान में काम करने वाले चीनी इंजीनियर और अधिकारी पाकिस्तान से लड़कियां खरीदकर चीन ले जा रहे हैं।

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कहा जा रहा है कि इस योजना के माध्यम से चीन एक नए साम्राज्यवादी सोच को लेकर उसे साकार करने जा रहा है। इस योजना के द्वारा चीन न केवल पाकिस्तान, बल्कि अफगानिस्तान में भी निवेश के प्रयत्न में शुरू कर चुका है।

चीन अपने विकास की आड़ में इस महापरियोजना के द्वारा पाकिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों, विशेषकर बलूचिस्तान का इस्तेमाल कर रहा है। इसी का नतीजा है कि बलूचिस्तान के लोग चिंता में हैं और वह भारत से सहयोग की उम्मीद कर रहे हैं।

इस योजना के नाम पर चीनी कंपनियों ने पाकिस्तान के अंदर हजारों एकड़ जमीन पट्टे पर आवंटित कर वाली है, जहां पर फसलें उगाई जा रही है। चीनी कंपनियों के द्वारा यहां से माल तैयार कर विदेशों में भेजा जा रहा है। इसके साथ ही पाकिस्तान में भी काफी खपत हो रही है।

नतीजा ही हो रहा है कि पाकिस्तान में डिवेलप होने वाले स्थानीय उद्योग धंधे दम तोड़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ इसका सारा रेवेन्यू चीनी सरकार को मिल रहा है। योजना के निर्माण कार्य पूरा होने के बाद बलूचिस्तान के अधिकांश हिस्से पर चीनी कंपनियों का कब्जा हो जाएगा। क्योंकि ग्वादर बंदरगाह का अधिकांश हिस्सा बलूचिस्तान में पड़ता है और इस बंदरगाह के पूरी तरह से संचालित होने के बाद पाकिस्तान के अन्य हिस्सों से भी लोग बलूचिस्तान में रहने लगेंगे।

इससे वहां के स्थानीय निवासियों में असुरक्षा की भावना उत्पन्न हो रही है। इस गलियारे को लेकर पाकिस्तान में कई प्रतिबंधित संगठनों ने भी चीनी सरकार के खिलाफ आवाज उठानी शुरू कर दी है। दूसरी तरफ से खैबर पख्तूनख्वा और सिंध प्रांत जैसे स्थानों के अनेक राजनीतिक संगठनों ने भी इस गलियारे के वास्तविक रूप को बदले जाने को लेकर अपनी चिंता पाकिस्तान और चीनी सरकार के सामने जताई है।

उनका मानना है कि गलियारे को चीन जानबूझकर बदल रहा है, ताकि इसका फायदा पंजाब प्रांत को मिल सके। यह गलियारे की रूपरेखा बदलने से और बनने से पाकिस्तान के राजनेता भी चिंतित हैं। हाल ही में एक राजनीतिज्ञ नहीं संसद में चेतावनी देते हुए कहा था कि चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा मुख्य रूप से ईस्ट इंडिया कंपनी का ही एक रूप है।

इस योजना के माध्यम से सीनेट की स्थाई समिति के अध्यक्ष ताहिर ने बताया कि गलियारे के लिए पाकिस्तान द्वारा चीन में बड़े पैमाने पर निवेश किया जा रहा है, और इससे पाकिस्तान कर्ज के बोझ तले दब चुका है। उन्होंने बताया कि चीन अपनी आर्थिक नीति के तहत पाकिस्तान में बिजली की दरें निर्धारित करेगा और उसके बाद धीरे-धीरे पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर अपना कब्जा जमाने का कार्य शुरु कर देगा।

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इसी को लेकर चिंता जाहिर करते हुए स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान के गवर्नर ने भी कहा है कि 46 बिलियन डॉलर का कर्ज बहुत बड़ा होता है, इसकी इक्विटी और इसके पारदर्शी होने के लिए पाकिस्तान की सरकार को कदम उठाना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी इस आर्थिक गलियारे के संभावित नेगेटिव इफेक्ट के बारे में आगाह किया है।

एक आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक इस गलियारे के माध्यम से चीन के द्वारा इस निवेश से पाकिस्तान के सकल घरेलू उत्पाद 15% तक बढ़ाकर 274 बिलियन डॉलर तक पहुंच जाएगा, जो कि पाकिस्तान को आर्थिक तौर पर गुलाम बनाने के लिए बड़ी भूमिका निभाएगा।

हालांकि, इस गलियारे के कारण पाकिस्तान में सुस्त पड़ी अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा। इसके साथ ही साथ उसका ऊर्जा संकट पर खत्म होगा। बताया जा रहा है कि सीपीईसी के द्वारा कुल 10500 मेगावाट की दूसरी ऊर्जा परियोजनाएं शुरू होगी। इस परियोजना का काम तेज गति से चल रहा है, ताकि इसे समय पर पूरा किया जा सके।

थार मरुस्थल में भी 6600 मेगावाट की 10 अन्य परियोजनाओं को विकसित किया जाएगा, ताकि पाकिस्तान के दूरदराज के इलाकों में ऊर्जा की आपूर्ति की जा सके। कुल मिलाकर देखा जाए तो यह परियोजना एक तरफ जा भारत को नुकसान पहुंचा रही है, वहीं दूसरी तरफ से पाकिस्तान को पूरी तरह से चीन के कब्जे में करने के लिए काफी साबित होगी।

एक और विचारणीय बात यह है कि जब भारत में धारा 370 हटा दी थी, तब कहा था कि जब कश्मीर की बात की जाती है, तो इसका मतलब यह है कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर भी उसी का हिस्सा है। भारत के गृह मंत्री अमित शाह ने जोर देकर कहा था कि कश्मीर का मतलब पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर पर ही उसी का पार्ट है। ऐसे में चीन भड़का हुआ है।

असल बात यह है कि चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारे की शुरुआत पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से ही होती है और इसका पहला गांव ऐसी जगह पर है, जहां पर भारत कभी भी कब्जा कर सकता है। चीन को इस बात का डर हमेशा सताता रहता है जिसके कारण वह भारत में अस्थिरता पैदा करने का काम कर रहा है। नागरिकता संशोधन कानून के बाद उपजे विवाद को किसी के रूप में देखा जा रहा है।