मोदी के हर फैसले में साथ रहने वाले इजराइल पर संकट, किंतु साथ क्यों नहीं दे रहा है भारत?

Modi Benjamin

New Delhi.

इजराइल और फिलिस्तीन (Israel Palestine Conflict) या कहें कि इजराइल व हमास के बीच युद्ध को 10 दिन पूरे हो चुके हैं। हमास की ओर से अबतक 3150 राकेट दागे गये, जिनमें से 90 फीसदी को इजराइल के आयरन डोम के द्वारा हवा में ही मार गिराया गया है, लेकिन बचे हुये 10 प्रतिशत राकेट के कारण इजराइल के करीब एक दर्जन नागरिकों की मौत हो गई। इजराइल के द्वारा बदले में हमास को पूरी तरह से नेस्तनाबूत करने की कसम खाई गई है। इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का कहना है कि हम बार बार झगड़ा नहीं चाहते हैं और इस बार हमास का सफाया करके ही दम लेंगे।

बता दें 1948 में फिलिस्तीन में से ही 44 फीसदी जमीन देकर यहूदियों के लिये इजराइल नाम से नया देश बनाया गया था। तब फिलिस्तीन के पास 48 प्रतिशत और 8 फीसदी जेरूसलम की जमीन पर यूएनओ का कंट्रोल रखा गया था। किंतु 1949, 1967, 1993, 2014 के युद्धों में इजराइल ने फिलिस्तीन का तकरीबन खत्म ही कर दिया है। आज की तारीख में फिलिस्तीन के पास केवल 12 फीसदी भूमि बची है, जबकि गाजा पट्टी 365 वर्ग किलोमीटर जमीन पर हमास का शासन है, जिसको इजराइल व अमेरिका के द्वारा आतंकी संगठन कहा जाता है। फिलिस्तीन के पास खुद की कोई सेना नहीं है, यही हमास फिलिस्तीन के लिये युद्ध करता है।

यह बात सही है कि 35 एकड़ जमीन के लिये हुये इस विवाद में कहीं ना कहीं इजराइल के सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को जिम्मेदार माना जा रहा है, जो जेरूसलम में है और उसपर यहूदियों, मुसलमानों और क्रिश्चयन समुदाय के द्वारा अपना अपना हक जताया जाता रहा है। यही वह जमीन है, जिसको मुसलमान मक्का व मदीना के बाद तीसरे नंबर की सबसे पवित्र जगह बताते हैं तो यहूदियों के अनुसार ज्यूस का जन्म इसी जगह हुआ था। सबके अपने अपने तर्क हैं, लेकिन इजराइल व फिलिस्तीन की इस लड़ाई में दुनिया के तकरीबन सभी 57 मुस्लिम देश जहां हमास के साथ हैं तो अमेरिका, ब्रिटेन समेत सारा यूरोपीय परिषद इजराइल का साथ दे रहा है।

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इजराइल के द्वारा 25 देशों की सूची जारी की गई है जो हमास के खिलाफ उसकी कार्रवाई का समर्थन कर रहे हैं, किंतु आश्चर्य की बात यह है कि इस सूची में भारत का नाम नहीं है। पीएम मोदी लगातार इजराइल को अपना मित्र देश बताते रहे हैं, लेकिन मोदी सरकार ने अपने मित्र इजराइल का समर्थन नहीं किया है। इसको लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। आइये जानते हैं ऐसा क्यों है कि हमेशा भारत के साथ संकट में खड़ा रहने वाला इजराइल आज मोदी के लिये कम महत्व का हो गया है?

धारा 370, राम मंदिर, नागरिकता संशोधन कानून, तीन कृषि कानूनों से लेकर मोदी सरकार के हर फैसले पर अगर किसी देश का सबसे पहले समर्थन मिलता है तो वह है इजराइल। इजराइल के साथ भारत का व्यापार हालांकि अधिक नहीं है। इजराइल से भारत सालाना करीब 100 करोड़ डॉलर के सैन्य हथियार आयात करता है, जबकि दोनों देशों के बीच करीब 600 करोड़ डॉलर का व्यापार है।

अमेरिका, इटली, ब्रिटेन समेत दुनिया के जिन 25 देशों ने इजराइल का साथ दिया है, उनमें भारत नहीं होने के पीछे अपने अपने तर्क हैं, लेकिन जिसकी तरफ कम ही लोगों का ध्यान जाता है, वह है 57 मुस्लिम देश, जिनमें से अधिकांश ने फिलिस्तीन के साथ खड़ा होने का निर्णय लिया है। पाकिस्तान जैसा कंगाल देश भी जहां तुर्की के साथ मिलकर हमास को जायज ठहराता है, वहीं भारत जैसे मित्र राष्ट्र का इजराइल का साथ नहीं मिलना लोगों को अखरता है। भारत में भी बड़े पैमाने पर लोगों ने सोशल मीडिया के माध्यम से इजराइल के साथ खड़े रहना बताया है।

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भारत और इरान के बीच हर साल बहुत बड़ा व्यापार होता है। इरान ही वह देश है जो हमास को हथियार बेचता है। भारत चीन का प्रतिवर्ष 25 हजार करोड़ का निर्यात और 96 हजार करोड़ का तेल आयात करता है। अरब देशों में तुर्की के साथ भारत का 10 अरब डॉलर का कारोबार है, जिसमें से 1.5 अरब डॉलर का आयात और करीब 8.5 अरब डॉलर का सामान निर्यात है। अन्य देशों में संयुक्त अरब अमीरात के साथ भारत का 100 अरब डॉलर का कारोबार है, जबकि 96 लाख की आबादी वाले इस देश में 30 लाख भारतीय काम करते हैं। सउदी अरब से हर साल भारत 250 बिलियन डॉलर का आयात करता है, जो अधिकांश तेल ही है। इसी तरह से ओमान के साथ भारत का 5.93 अरब डॉलर का कारोबार होता है।

कुल मिलाकर देखा जाये तो भले ही भारत के साथ हर फैसले में इजराइल खड़ा रहता हो, लेकिन भारत का बड़ा कारोबार अरब देशों के साथ है और सबसे गंभीर बात यह है कि भारत की तेल आपूर्ति में से करीब 65 फीसदी यही अरब देश करते हैं। अगर आज ही भारत इनको नाराज कर दे तो देश में भारी तेल संकट खड़ा हो सकता है और पहले ही 100 रुपये लीटर पेट्रोल पर ​पेट फाड़कर चिल्ला रहे विपक्ष को एक बड़ा मुद्दा मिल सकता है।

इसके साथ ही भारत को नैतिक रुप से भी अरब देशों का समर्थन चाहिये, क्योंकि भारत की बड़ी जमीन पाकिस्तान और चीन के द्वारा दबाई हुई है। पाकिस्तान ने भारत की 13297 वर्ग किलोमीटर जमीन हथिया रखी है, जिसको पीओके कहते हैं। इसी तरह से 43180 वर्ग किलोमीटर अक्साई चीन के रूप में चीन ने भी भारत की जमीन हड़प रखी है। इन जमीनों को छुड़ाने के लिये भारत कभी भी विस्तारवादी देशों को समर्थन नहीं दे सकता है।

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यदि भारत के द्वारा विस्तारवादी इजराइल का समर्थन किया जाता है तो स्वत: ही पाकिस्तान और चीन को भारत के खिलाफ यूएनओ में जाने का अवसर मिल जायेगा। ऐसे में भारत भले ही गुप्त रुप से इजराइल के साथ हो, लेकिन मोदी सरकार खुलकर इजराइल की इस कार्रवाई का समर्थन नहीं कर सकती है।