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jaipur
सन 1980 से लेकर 2018 के विधानसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री बनने की लड़ाई, प्रदेश मंत्रीमंडल का गठन करने और विभागों का बंटवारा करने में सफलतापूवर्क जादूगरी दिखाने वाले प्रदेश के मुखिया अशोक गहलोत के द्वारा जादू दिखाने का एक बार फिर वक्त आ रहा है।

साल 2014 से दिसंबर 2018 तक प्रदेशाध्यक्ष नहीं होने के बावजूद, पीसीसी चीफ सचिन पायलट के बजाए चुनाव में कम मेहनत करने के बाद भी सीएम बने और अब उसी जादूगरी से लोकसभा चुनाव में अपने बेटे वैभव गहलोत को टिकट दिलाने में कामयाब हुए।

हर सियासी मोर्चे पर अपने सियासी जादू का पचरम लहराने वाले राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की 23 मई के बाद जादूगरी की असली अग्नि परीक्षा होने वाली है।

अशोक गहलोत ने अपने बेटे वैभव गहलोत को टिकट दिलाकर भले ही लोकसभा का चुनाव लड़वा दिया हो, लेकिन जिस तरह की रिपोर्ट सामने आ रही है, उससे कतई नहीं लगता है कि गहलोत इस चुनाव में अपना राजनीतिक वैभव बचा पाएंगे।

बहरहाल, अशोक गहलोत और उनके डिप्टी, यानी सचिन पायलट राजस्थान से बाहर जहां पर सात​वें चरण का मतदान बाकी है, वहां पर पार्टी के लिए दम ठोकने में लगे हुए हैं। पार्टी ने दोनों नेताओं को स्टार प्रचारक बनाया है, तो निश्चित तौर पर प्रचार करना भी पड़ेगा।

आपको याद होगा कि 29 अप्रैल को राजस्थान में हुए पहले चरण के मतदान तक अशोक गहलोत ने जोधपुर में अपने बेटे वैभव के प्रचार में जान लगा दी थी।

कहा जाता है कि गहलोत ने राजस्थान में कुल 138 रैलियां की थीं, जिनमें से आधी से ज्यादा अकेले जोधपुर में कर डाली। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अशोक गहलोत अपने बेटे को जिताने के लिए कितना दम लगा रहे थे।

फिलहाल परिणाम 23 मई को आएगा, तब तक सभी प्रत्याशियों की धड़कने उपर नीचे हो रही है।

लेकिन इससे बड़ी बात यह है कि हर चुनाव में, अपने राजनीतिक जीवन की हर परीक्षा में सफल होने वाले राजस्थान के ये सियासी जादूगर अब क्या कमाल कर पाएंगे।

चुनाव परिणाम में यदि गहलोत के बेटे को जीत मिलती है, तो पक्के तौर पर कहा जा सकता है कि उनकी जादूगरी का एक बार फिर डंका बजने वाला है, लेकिन अगर ऐसा नहीं होता है और गजेंद्र सिंह शेखावत को जीत मिलती है, तो फिर गहलोत के लिए अपना बचा हुआ करीब साढे चार साल का मुख्यमंत्री कार्याकाल पूरा कर पाना भी आसान नहीं होगा।

यह भी उल्लेखनीय है कि प्रदेश में लोकसभा चुनाव से पहले राज्य के पूर्व गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया ने दावा किया था कि 23 मई के बाद अशोक गहलोत को कभी भी इस्तीफा देना पड़ सकता है।

कटारिया ने किस आधार पर यह बात कही, यह वही भलीभांती जानते हैं, लेकिन इतना तय है कि कांग्रेस पार्टी में कुछ तो है जो ठीक नहीं चल रहा है।

अब दूसरी तरफ की बात करते हैं। यदि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपने बेटे को जिताने में कामयाब हो गए और बाकी राजस्थान में कांग्रेस पिछड जाती है तो कांग्रेस पार्टी में ही मौजूद उनके विरोधियों को उनके खिलाफ बोलने का मौका मिल जाएगा, जिसके परिणाम के तौर उनसे मुख्यमंत्री की सीट छिनने तक की नौबत आ सकती है।

फिलहाल नतीजों का इंतजार किया जा रहा है, जिसके बाद तय होगा कि सियासत में हर मोर्चे पर अपनी जादूगरी दिखाने वाले अशोक गहलोत जादू को चला पाते हैं, या अपने विरोधियों के जादू उलझ जाते हैं।

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