रामगोपाल जाट

भाजपा और कांग्रेस के पास अब राजस्थान में दो एसपी हैं। जी, नहीं! ये कोई सुपरडेन्ट ऑफ पुलिस (superintendent of police) नहीं हैं, बल्कि जिन दो नेताओं को भाजपा और कांग्रेस की राजस्थान में संगठन की सत्ता मिली है, उन दोनों नेताओं का शॉर्ट फॉर्म में नाम है।

भाजपा के सतीश पूनिया और कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट हैं। दोनों ही दोनों प्रमुख दलों के कप्तान हैं।

हालांकि, दोनों ही नेताओं के नाम और सरनेम अंग्रेजी के समान शब्दों से शुरू होते हैं, किन्तु संगठन में काम करने के अनुभव और सत्ता संभालने का अनुभव में काफी अंतर है।

सतीश पूनिया जहां संगठन के बेहतर नेतृत्वकर्ता हैं, तो सचिन पायलट के पास केंद्रीय मंत्री और राज्य में उप मुख्यमंत्री का का वजन है।

सतीश पूनिया जहां 1992 से भाजपा में विभिन्न पदों पर रहते हुए प्रदेशाध्यक्ष के पद तक पहुंचे हैं, वहीं सचिन पायलट को उनके पिता राजेश पायलट के निधन के बाद सत्ता में सीधी भागीदारी मिलने के कारण लंबे समय तक संगठन संभालने का अनुभव नहीं है।

सतीश पूनिया ने जहां लगातार हारने के बाद अनुभव की भट्टी में खुद को तपाया है, तो सचिन पायलट को केवल 2014 की मोदी लहर में अजमेर से लोकसभा चुनाव में हार मिली थी।

आज की बात करें तो सतीश पूनिया 54 साल के जीवन का अमूल्य अनुभव के साथ आमेर विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं, वहीं 42 साल के सचिन पायलट टोंक से विधायक हैं और उप मुख्यमंत्री के पद पर आसीन हैं।

सतीश पूनिया जहां चुरू की सादुलपुर तहसील के एक गांव से निकलकर राजस्थान विश्वविद्यालय में उच्च अध्ययन किया है, तो दूसरी तरफ सचिन पायलट विदेशों में अंग्रेजी भाषा में उच्च शिक्षित बताए जाते हैं।

यह तो हुई इन दोनों नेताओं की तुलनात्मक रूप से मोटी-मोटी जानकारी। अब बात करते हैं दोनों प्रमुख पार्टियों के मुखियाओं की चुनौतियों की बात।

भाजपा-कांग्रेस के दोनों एसपी एक ही तरह की समस्या से सामना कर रहे हैं या करने जा रहे हैं।

भाजपा के सतीश पूनिया को जहां VR-2 से निपटने की चुनौती है, तो दूसरी ओर कांग्रेस के सचिन पायलट को AG-3 से सामना करना पड़ रहा है।

सतीश पूनिया के सामने VR-2 की संभावित बड़ी चुनौती से निपटना और 2023 में रोकना है, वहीं सचिन पायलट के सामने AG-3 स3 मुकाबला करना पड़ रहा है।

दरअसल, भाजपा की कमान बीते करीब 17 साल से VR-2, यानी वसुंधरा राजे (2 बार की मुख्यमंत्री) के पास है।

दूसरी तरफ राज्य में कांग्रेस की राजनीति पिछले लगभग 21 साल से AG-3, यानी अशोक गहलोत (3 बार के मुख्यमंत्री) के इर्दगिर्द घूम रही है।

सचिन पायलट जहां बीते 6 साल से कांग्रेस के राज्य में कप्तान होने के बाद भी अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री बनने और हटाने में कामयाब नहीं हो पा रहे हैं।

वहीं, पहली बार अध्यक्ष बनकर भाजपा की कायापलट करने की सम्भनाएँ लिए सतीश पूनिया को राज्य भाजपा में बरगद का वृक्ष बनीं हुईं वसुंधरा राजे को साइड लाइन कर 2023 में सत्ता हासिल कर पाना जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा साबित होगी।

मज़ेदार बात यह है कि अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे को विरोधी दलों में होने के बाद भी एक-दूसरे का काफी करीबी माना जाता है।

तो उनके प्रतियोगी के रूप में सामने आए सचिन पायलट और सतीश पूनिया वैचारिक तौर पर भी एक-दूजे के पक्के प्रतिद्वंद्वी हैं। सतीश आरएसएस परिवार से हैं, तो सचिन जन्मजात कांग्रेसी हैं।

दिसम्बर 2018 के विधानसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री बनने और उसके बाद भी कई मोर्चों पर सचिन पायलट को मात दे अशोक गहलोत खुद को जादूगर साबित करते हुए दिखाई दे रहे हैं।

वहीं, हमेशा राजनीति में सतीश पूनिया की धुर विरोधी मानी जाने वाली वसुंधरा राजे से अध्यक्ष बनने के बाद आशीर्वाद लेकर पूनिया ने साबित कर दिया है कि वह पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को दिमागी घोड़ों से शिकस्त देने की तैयारी में हैं।

अब देखना दिलचस्प होगा कि 2023 तक सतीश पूनिया VR-2, यानी वसुंधरा राजे को सत्ता से दूर रख पाने में सफल होते हैं, या उससे पहले ही सचिन पायलट मुख्यमंत्री AG-3, यानी अशोक गहलोत को 2023 से पहले सत्ता से बेदखल कर खुद को पायलट साबित कर पाते हैं।