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सरकारी अस्पतालों का विशाल और सुदृढ़ ढांचा कल खुले प्राइवेट अस्पतालों से यूं ही नहीं पिछड़ा है, उसके लिए सरकारी नाकामी और निजी क्षेत्र का योगदान तो है ही, साथ ही सरकारी डॉक्टरों व अस्पतालों में कार्यरत कर्मचारियों का सबसे ज्यादा योगदान है।

पहले ही डॉक्टरों और कर्मचारियों की तादात कम होने के कारण हॉस्पिटल बर्बादी की कगार पर हैं, ऊपर से कर्मचारियों के निकम्मेपन ने रही सही कसर भी पूरी कर रखी है।

सरकारी डॉक्टर और कर्मचारी ऐसे पनपाते हैं प्राइवेट अस्पताल...गवर्नमेंट भी पंगु है ही 1

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राजस्थान में बीजेपी की वसुंधरा राजे सरकार के वक्त 2015 में शुरू की गई ‘भामाशाह स्वास्थ्य बीमा योजना’ के कारण न केवल प्राइवेट अस्पतालों को जीवनदान मिला, बल्कि स्वास्थ्य विभाग के माध्यम से अब तक के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए।

अभी तक यह योजना जिंदा है, लेकिन संभवतः लोकसभा चुनाव के बाद इसको लेकर कोई फैसला लिया जा सकता है, अथवा पुरानी सरकार की भांति योजना को आधिकारिक तौर पर बन्द नहीं कर गर्त में डाला जा सकता है।

बहरहाल, शुरू होने से लेकर अब तक इस योजना पर सरकार 2500 करोड़ से ज्यादा खर्च कर चुकी है। इसके चलते निजी अस्पतालों के द्वारा किये जाने वाले ऑपरेशन की तादात में बेतहाशा वृद्धि हुई।

ऐसे डुबो रहे हैं सरकारी अस्पतालों को

बात यदि डॉक्टरों और कर्मचारियों की कार्यप्रणाली की करें तो इस मामले में बहुत साफ है कि अधिकांश दवाखाने अब निजी हॉस्पिटल से पिछड़ चुके हैं। दो दिन पहले ही मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने जयपुर के प्रताप नगर में नवनिर्मित 500 बेड के सरकारी अस्पताल का उद्घाटन किया है।

लेकिन उसी दिन सीएम गहलोत ने सीतापुरा में महात्मा गांधी अस्पताल में अत्याधुनिक कैंसर सेंटर का भी शुभारंभ किया था। महात्मा गांधी अस्पताल के तरफ से अखबारों में इस उद्घाटन के लिए बड़े-बड़े विज्ञापन दिए गए थे, जबकि सरकार ने प्रताप नगर में खुले नए आरयूएचएस अस्पताल के लिए सिंगल विज्ञापन देकर प्रचार नहीं अपनी नियत बताई।

मजेदार बात यह भी है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने महात्मा गांधी अस्पताल के कैंसर सेंटर के उद्घाटन कार्यक्रम में करीब 2 घंटे से ज्यादा का समय बिताया। उसके बाद आरयूएचएस के अस्पताल के उद्घाटन में बमुश्किल करीब 1 घंटे तक रहे। मुख्यमंत्री की कार्यशैली से साफ पता चलता है कि उनका ध्यान किस तरफ अधिक था।

डॉक्टर और कर्मचारी किस तरह से मरीजों को निराश करके प्राइवेट अस्पतालों में जाने के लिए मजबूर करते हैं

अलबत्ता तो सरकारी अस्पतालों में पर्ची कटवाने के लिए कम से कम आधे से एक घंटा खड़ा रहना पड़ता है। उसके बाद इतना ही वक्त डॉक्टर के कक्ष के बाहर, वहां से दवाई लिखवाने के बाद मुख्यमंत्री निशुल्क दवा केंद्रों पर लगी कतारों में वक्त बिताना पड़ता है। कुल मिलाकर एक मरीज को अस्पताल से दवाई लेकर वापस घर पहुंचने में आधा दिन खर्च करना ही पड़ता है।

दूसरी तरफ प्राइवेट अस्पतालों में न कतारें होती है, ना पर्ची कटवाने का बड़ा झंझट। यहां पर मरीज या परिजन जाकर पर्ची कटवाते हैं, उसके लिए लाइन में नहीं लगना होता है। पर्ची कटने के बाद डॉक्टर के पास कतारें नहीं होती है और दवा लेने में अधिकतम 5 मिनट का वक्त लगता है।

कुल मिलाकर देखा जाए तो जहां सरकारी अस्पताल में एक मरीज को दिखाने के लिए आधा दिन खर्च करना पड़ रहा है, वहीं निजी अस्पताल में अधिकतम आधे घंटे के भीतर रोगी को दवाई मिल चुकी होती है।

मुफ्त दवा और फ्री जांच की सुविधा के अलावा कुछ भी नहीं

यह बात सही है कि सरकारी अस्पतालों में मुख्यमंत्री निशुल्क दवा योजना और मुख्यमंत्री निशुल्क जांच योजना का मरीजों को बड़ा फायदा मिलता है, लेकिन इस फायदे को किताब नुकसान होता है जब एक मरीज अपना आधा दिन खर्च करके दवा लेने में कामयाब हो पाता है।

अमीर और मध्यम वर्ग लगातार प्राइवेट अस्पतालों की तरफ रुख करने लगे हैं

आज भी प्रदेश में गरीबों की संख्या बड़ी मात्रा में है, लेकिन मध्यम वर्ग सबसे बड़ा तबका है। धनी लोगों की संख्या कम होने के बावजूद वह अपना बड़ा रोल अदा करते हैं।

धीरे धीरे ट्रेंड स्थापित होता जा रहा है कि सरकारी अस्पतालों में केवल गरीब आदमी दवाई लेने जाता है, मध्यम वर्ग और अमीरों को पूरी तरह से निजी अस्पतालों की तरफ मोड़ दिया गया है। इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार है सरकारी अस्पतालों के डॉक्टर, कर्मचारी और खुद राज्य सरकार की भारी लापरवाही।

धरा रह गया डॉ समित शर्मा का दावा

करीब ढाई महीने पहले राजस्थान में सरकार बदली तो लोगों को सिस्टम बदलने की संभावना नजर आने लगी थी। शुरुआत में सरकार ने अधिकारियों को अपने मन मुताबिक स्थानांतरित किया। कुछ अधिकारियों ने अपना जोश दिखाते हुए शुरू शुरू में अपने-अपने विभागों में जमकर काम किया।

लेकिन 3 महीने का वक्त भी पूरी तरह नहीं निकला है कि अधिकांश अधिकारी पुराने ढर्रे पर आ गए हैं। अब लोगों को कोई उम्मीद नहीं है, लोग और सिस्टम से लड़कर काम करवाने लगे हैं। हालांकि, इसका दुष्प्रभाव भी कभी कभी झगड़ों के रूप में सामने आता है।

National Health Mission (NHM) के निदेशक बनाए गए डॉ समित शर्मा ने शुरू शुरू में सरकारी अस्पतालों में खुले दवा केंद्रों पर औचक निरीक्षण करते हुए कर्मचारियों को हिदायत दी। उनकी हिदायत का और सख्ती का असर यह हुआ कि कर्मचारी समय पर आने लगी और समय पूरा होने के बाद ही अस्पताल छोड़ कर जाने लगे।

दवा केंद्रों पर दवाइयों की संख्या में भी इजाफा हुआ। उससे पहले जहां 10 से 20% दवाइयां उपलब्ध रहती थी, वह 80 से 90 तक पहुंच गई। कुछ दवा केंद्रों पर तो दवाइयां 100% भी हो गई।

लेकिन डॉक्टर सुमित शर्मा के साथ भी वही हुआ। बमुश्किल 3 महीने के अंतराल में ऐसा लगता है कि एनएचएम के निदेशक डॉ समित शर्मा ने भी डॉक्टरों और कर्मचारियों के सामने हथियार डाल दिए हैं।

उनकी तरफ से अब ने कोई एक्शन अखबारों की सुर्खियां बन रहे हैं, और ना ही मरीजों को मौके पर उनकी सख्ती का असर नजर आ रहा है। दवा केंद्रों पर बैठे सरकारी कर्मचारी मरीजों के साथ इस तरह का व्यवहार कर रहे हैं, जैसे खुद की जेब से मरीजों को दवाइयां दान कर रहे हो।

सरकार के एक वरिष्ठ चिकित्सक ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि जब सरकार ही खुद सरकारी अस्पतालों को चलाने की इच्छा नहीं रखती है, तो चंद डॉक्टर और कर्मचारी कैसे इतने बड़े बड़े सिस्टम को सुधार सकते हैं?

उन्होंने बताया कि जब सरकारी सिस्टम बिगड़ता है तो ही प्राइवेट सिस्टम डिवेलप होता है। यही कारण है कि 1947 में खुला सवाई मानसिंह अस्पताल महज 17 साल पहले खोलें महात्मा गांधी अस्पताल से पिछड़ गया।

हृदय प्रत्यारोपण, किडनी transplant और लीवर ट्रांसप्लांट का रुतबा हासिल करने वाला 72 साल पुराना सवाई मानसिंह अस्पताल नहीं होकर केवल 17 साल शुरू हुआ महात्मा गांधी अस्पताल है, जिसके पीछे संचालक का मैनेजमेंट के साथ ही डॉक्टरों और कर्मचारियों की जवाबदेही है।

मजेदार बात यह है कि राजस्थान सरकार 72 साल में जहां एक सरकारी स्वास्थ्य विश्वविद्यालय स्थापित कर पाई, वहीं महात्मा गांधी अस्पताल जैसे प्राइवेट अस्पतालों ने अपने खुद के स्वास्थ्य विश्वविद्यालय स्थापित कर लिए।

इससे सरकार की नाकामी के साथ सरकारी डॉक्टरों और कर्मचारियों का नक्कारपन भी साबित होता है। इसके अलावा कभी कभी महात्मा गांधी अस्पताल के साथ मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की पार्टनरशिप के किस्से भी सुनाई देते रहते हैं।

आखिर क्या है कारण कि मुख्यमंत्री से लेकर सरकार के अधिकारी तक निजी अस्पतालों को वरीयता देते हैं

Private hospital को सबसे ज्यादा जिस चीज की जरूरत होती है, वह है प्रचार प्रसार। वैसे तो यह अस्पताल अपनी हैसियत के मुताबिक अखबारों और टीवी चैनलों में विज्ञापन देते हैं, लेकिन इनका प्रचार प्रसार तब ज्यादा प्रभावी और अधिक लोगों तक पहुंचने वाला होता है, जब मुख्यमंत्री, मंत्री और सरकारी कर्मचारी इनके द्वारा आयोजित किये जाने वाले कार्यक्रमों में शिरकत करते हैं।

लूट के अड्डे बन गए हैं प्राइवेट हॉस्पिटल

वैसे तो प्राइवेट हॉस्पिटलों के द्वारा मरीजों को लूटने के कई मामले सामने आते रहते हैं, लेकिन 2015 में राज्य सरकार के द्वारा शुरू की गई भामाशाह स्वास्थ्य योजना के बाद प्राइवेट अस्पतालों के द्वारा सरकारी पैसे की जबरदस्त लूट की गई।

प्राइवेट अस्पतालों ने मनमाफिक दरें लगाई और बेतहाशा ऑपरेशन कर डाले। एक सर्वे के मुताबिक इन 4 वर्षों में निजी अस्पतालों के ऑपरेशन करने की तादात में बड़े पैमाने पर बढ़ोतरी हुई है।

मरीजों के पास प्राइवेट हॉस्पिटल की तरफ रुख करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता है

दर्द से कराह रहे मरीज को सबसे पहले डॉक्टर से ही आस होती है, तो वह सरकारी अस्पताल की तरह दौड़ता है। लेकिन गवर्नमेंट हॉस्पिटल्स में सिस्टम की लाचारी के चलते मरीजों को निजी अस्पतालों की तरफ रुख करना पड़ रहा है।

सरकारी हॉस्पिटल्स में न केवल स्टाफ की भारी कमी है, बल्कि जो डॉक्टर और कर्मचारी कार्यरत हैं, उनमें से अधिकांश लापरवाही से काम करते हैं और अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड के रहते हैं। इसी का नतीजा है कि मरीज तेजी से सरकारी अस्पताल के बजाए प्राइवेट अस्पतालों की तरफ जाने लगे हैं।

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