रामगोपाल जाट

—11वीं में थे तब कॉलेज खुलवाई, कालका ट्रेन को रुकवाया और बाढ़ आई तो देश के सबसे बड़े नेता का हाथ पकड़ जवाब मांग लिया था, राहुल गांधी को विधानसभा में ही गोली मारने की मांग भी कर दी थी।

1990 में भैंरूसिंह शेखावत दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। उससे पहले वह 1977 में बन चुके थे, किंतु तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जब एक के बाद एक गैर कांग्रेसी सरकारों को उखाड़ फैंकने का फैसला किया तो शेखावत की सरकार भी बहुमत में होने के बावजूद गिरा दी गई।

खैर! बात 1990 के बाद की हो रही है। भैंरूसिंह शेखावत मुख्यमंत्री थे। सुबह जब मुख्यमंत्री उठकर मुश्किल से चाय ही पी रहे थे, कि बाहर से संदेश आया कि कोई दर्जनों स्कूली बच्चे आवास के बाहर धरने पर बैठ गये हैं।

भैंरूसिंह शेखावत खुद बाहर आये, क्योंकि एकीकृत राजस्थान के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ कि स्कूल के छात्र मुख्यमंत्री कार्यालय के बाहर तो दूर, आम जगह ही धरना नहीं दे पाते थे।

सीएम शेखावत आवास से बाहर आये, तो देखा कि वास्तव में स्कूली बच्चे अपनी मांग को लेकर धरने पर बैठे थे। शेखावत ने उनमें एक गंहुआ रंग से बच्चे से इसका कारण पूछा, जो कि उनका नेतृत्वकर्ता नजर आ रहा था।

वह खड़ा हुआ और धारा प्रवाह बेखौफ बोलने लगा। एक बारगी तो मुख्यमंत्री भी सकपका गये कि कोई बच्चा कैसे इतनी मुखरता से बोल सकता है, किंतु शेखावत मजें हुये नेता थे, उन्होंने पूरी तन्मयता से उस बच्चे की बात सुनी। बच्चे की मांग सुनकर सीएम सन्न रह गये कि कोई बच्चा ऐसी मांग कैसे कर सकता है?

फिर मुख्यमंत्री ने बच्चे का नाम और कक्षा पूछी, तो वह बिलकुल ही दंग रह गये। एक महज 11वीं कक्षा का बच्चा कॉलेज की मांग कर रहा था। बिलकुल सही पढ़ा आपने! यह बच्चा मुख्यमंत्री से अपने क्षेत्र में कॉलेज खुलवाने की मांग ही कर रहा था।

जब कोई बच्चा 11वीं कक्षा में होता है, तब वह ठीक से राजधानी जयपुर तक जाने की सोच भी नहीं पाता है। खासकर तब, जब उसका ठिकाना राजधानी से सैकड़ों किलोमीटर दूर, सुदूर पाकिस्तान की बॉर्डर पर हो।

किंतु यह वह लड़का था, जिसने न केवल राजधानी में पहुंचकर मुख्यमंत्री के बंगले के बाहर धरना दिया, बल्कि अपने दर्जनों साथियों के साथ मुख्यमंत्री से मिलकर अपनी ऐसी मांग भी मनवा ली, जिसकी कल्पना आज विवि के छात्रसंघ अध्यक्ष भी नहीं कर पाते हैं।

तत्काल प्रभाव से मुख्यमंत्री शेखावत ने अपने साथ खड़े सचिव से एक कागज में लिखवा लिया कि जब भी प्रदेश के किसी हिस्से में नई कॉलेज खोलने की प्रक्रिया शुरू हो, तो सबसे पहली कॉलेज उनके यहां पर ही खोली जाये।

आज इस बात पर विश्वास करना थोड़ा कठिन है, किंतु सच है! वह बालक था, आज के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार में कृषि राज्यमंत्री कैलाश चौधरी। और उनके द्वारा तब मुख्यमंत्री आवास के बाहर दिये गये उस धरने के बाद महज कुछ ही दिनों में (1991) बालोतरा में MOOLCHAND BHAGWANDAS RANGWALA GOVERNMENT P.G. COLLEGE, BALOTRA के नाम से कॉलेज खोल दी गई।

यह पहला मौका था, तब कैलाश चौधरी का नाम जयपुर पहुंचा था। इसके बाद कैलाश चौधरी का उनके इलाके में हर बच्चा नाम जान गया। उन्होंने उसी कॉलेज में पढ़कर अपनी स्नातक पूरी की।

फिर काॅलेज शिक्षा के समय अखिल भारतीय विधार्थी परिषद से जुड़े और संघ से तृतीय वर्ष शिक्षा भी गृहण की। कैलाश चौधरी ने भारतीय जनता युवा मोर्चा में भी कार्य किया।

जब प्रो. सांवरलाल जाट 2013 में कैबिनेट मंत्री बन गए तो उनकी जगह भाजपा किसान मोर्चा के प्रदेशाध्यक्ष का दायित्व भी कैलाश चौधरी को ही दिया गया, जो आज तक बखूबी निभा रहे हैं

1996 में कैलाश चौधरी ने इसी कॉलेज से अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी की और राजनीति में अपने कदम बढ़ा दिये। किंतु 1998 में पहली बार वार्ड पंच के चुनाव में हार गये।

हार नहीं मानने के आदी कैलाश चौधरी ने साल 2004 में जिला परिषद का चुनाव लड़ा और जीत गये। अब वह भाजपा की मुख्य धारा में शामिल हो गये थे। तो जिले में भाजपा के सभी कार्यक्रमों में शामिल होने लगे।

साल 2003 में उन्होंने टिकट मांगा, किंतु तब उनको पार्टी ने टिकट नहीं दिया और कैलाश चौधरी संगठन में काम करने लगे। पांच साल बाद 2008 में उनको बायतु विधानसभा क्षेत्र से टिकट मिला, ​​लेकिन किस्मत ने साथ नहीं दिया और चुनाव हार गये।

इससे पहले 2006 में बाड़मेर का कवास क्षेत्र विश्व के नक्शे पर आ गया था। यहां पर आई जोरदार बाढ़ के कारण पूरे कवास क्षेत्र में पानी भर गया। कई लोगों की जान चली गई और जानवरों की लाशें बाढ़ के पानी पर तैरने लगीं।

बात राज्य सरकार ही नहीं, बल्कि केंद्र सरकार तक पहुंच चुकी थी। तब पीएम मनमोहन सिंह थे, लेकिन सत्ता की चाबी यूपीए की चैयरपर्सन सोनिया गांधी के पास थी।

सोनिया गांधी ने बाढ़ का हाल जानने के लिए बाड़मेर का दौरा किया। इस दौरान एक युवक सोनिया गांधी को ज्ञापन देने का बहाना कर उनके पास पहुंच गया। युवक ने न केवल सोनिया को ज्ञापन दिया, बल्कि केंद्र सरकार से उचित सहायता नहीं मिलने को लेकर नाराजगी दिखाते हुए उनका हाथ पकड़कर जवाब मांगा।

सोनिया गांधी की सुरक्षा में मुस्तैद एसपीजी के जवानों ने युवक को दबौच लिया और स्थानीय थाना पुलिस के हवाले कर दिया। यह वही कैलाश चौधरी थे। अब सिलसिला शुरू हुआ कैलाश चौधरी के धरनों, प्रदर्शन और अनशन का दौर।

कई कई दिनों तक धरना देना, अनशन करना और जेल जाने का अनवरत सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा था। साल 2008 से 2013 की प्रदेश कांग्रेस सरकार ने उनको हिस्ट्रीशीटर बना दिया।

इसके बाद एक और कामयाबी यह रही कि कैलाश चौधरी को जनता का भरपूर समर्थन मिलने लगा। बालोतरा से गुजरने वाली कालका एक्सप्रेस नहीं रुकती थी। उन्होंने एक बड़ा आंदोलन किया और रेल मंत्रालय को यहां पर गाड़ी रोकने को मजबूर कर दिया। आज कालका एक्सप्रेस यहां रुककर जाती है।

धुन के पक्के कैलाश चौधरी ने 2008 की हार के बाद भी हार नहीं मानी और सारी बाधाओं को पार करते हुये साल 2013 के विधानसभा का टिकट फिर से पाने में कामयाबी हासिल की।

इस बार ​कैलाश चौधरी बायतु से जीत गये। भले ही कैलाश चौधरी इस बार चुनाव जीत गये हों, किंतु इसकी उनको बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। इसके बाद कैलाश चौधरी को डायबटीज जैसी गंभीर बीमारी ने घेर लिया और उनका खाना ही बंद हो गया।

वो बताते हैं कि आज उनको खाना खाये पूरे 6 साल से ज्यादा का समय हो गया है। उनका हरिद्वार में यहां स्थित एक आश्रम में प्राकृतिक उपचार से इलाज चल रहा है। हर माह उनको वहां पर जाना होता है।

सदन में उनके कार्यकाल की बात करें तो जब जेएनयू विवि का मामला उठा, तब सदन में सदस्य के तौर पर बोलते हुए कैलाश चौधरी ने कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी के द्वारा जेएनयू के कथित तौर पर देशद्रोही छात्रों का पक्ष लेने के लिए गोली मारने की मांग कर दी।

कैलाश चौधरी की इस मांग पर न केवल सदन में जोरदार हंगामा हुआ, बल्कि उनकी देशभर में विपक्ष के द्वारा आलोचना की गई। मगर उन्होंने इसकी भी कोई परवाह नहीं की।

इसके बाद राज्य में सत्ता विरोधी लहर और कांग्रेस के द्वारा किसानों की सम्पूर्ण कर्जमाफी के वादे के चक्कर में आये राज्य के किसानों ने कांग्रेस को सत्ता दे दी। इसी में कैलाश चौधरी भी बायतु से 2018 का विधानसभा चुनाव हार गये।

किस्मत ने कैलाश चौधरी का एक बार फिर साथ दिया और साल 2019 में मई माह में सम्पन्न हुये लोकसभा चुनाव में जैसलमेर—बाड़मेर से लोकसभा का टिकट मिल गया।

लेकिन चुनाव जीतना इतना आसान नहीं था। उनके सामने थे कांग्रेस के उम्मीदवार मानवेंद्र सिंह। जैसलमेर में मानवेंद्र सिंह के परिवार की बड़ी इज्जत बताई जाती है। किंतु कैलाश चौधरी ने न तो हार मानी और ही जीतने की उम्मीद छोड़ी।

उन्होंने अपने क्षेत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली करवा दी। देश में मोदी लहर और कैलाश चौधरी की मेहनत ने उनकी किस्मत का ताला खोला। कैलाश चौधरी ने बड़ी जीत हासिल कर संसद का टिकट कटवा लिया।

इससे भी बढ़कर कैलाश चौधरी के दिन तब फिरे, जब मोदी के मंत्रिमंड़ल में गठन के दौरान उनको मंत्री पद की शपथ लेने का न्योता आया। कैलाश चौधरी आज देश के कृषि राज्यमंत्री हैं और अब राजस्थान ही नहीं, बल्कि पूरे देश में उनके नाम की पहचान है।