जयपुर।

राजस्थान में सरकार बदलने के साथ ही किसानों के लिए इस सीजन में सबसे जरूरी यूरिया खाद की किल्लत सिर चढ़कर बोल रही है।

राज्य के हाडोती इलाके में पढ़ने वाले सभी जिलों में यूरिया की भारी किल्लत के चलते किसानों और पुलिस के बीच कई बार झड़प हो चुकी है।

बीते 1 सप्ताह के दौरान राजस्थान में बूंदी, झालावाड़, कोटा, दोसा समेत कई जिलों में पुलिस के द्वारा किसानों को लाइनों में लगाकर यूरिया बांटने का काम किया जा रहा है।

इस बीच राजस्थान सरकार की पहल पर प्रदेश के सहकारिता विभाग के द्वारा केंद्र सरकार से यूरिया की डिमांड भेजी गई है। अगले 24 घंटे में राजस्थान को 33 हजार मैट्रिक टन यूरिया मिल जाएगा।

पूरे देश में जैविक खेती को बढ़ावा देने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयास के बावजूद राजस्थान में किसान पेस्टिसाइड का प्रयोग करने से बाज नहीं आ रहे हैं, जिसके चलते यह समस्याएं उत्पन्न हुई है।

जैविक खेती के विशेषज्ञ नृपेन सैनी का कहना है कि अगर प्रदेश के किसान ऑर्गेनिक फार्ममिंग को अपनाएं तो हर साल होने वाली यूरिया और डीएपी खाद की किल्लत स्वत ही खत्म हो जाएगी।

गौरतलब है कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने 2014 में देश में हर साल होने वाली यूरिया की किल्लत से निपटने के लिए यूरिया खाद को नीम कोटेड करने का फैसला किया था। जिसके बाद यह पहली बार है कि यूरिया की किल्लत को लेकर राजस्थान में किसानों को पुलिस की लाठियां खानी पड़ रही है।

नृपेन सैनी बताते हैं कि अगर जैविक खेती को अपनाया जाए तो 2 साल बाद ऐसे खेतों में यूरिया और डीएपी खाद से होने वाली पैदावार के मुकाबले अधिक उपज मिलेगी साथ ही शुद्ध अनाज-फल-सब्जी भी प्राप्त होगी।

कृषि विशेषज्ञ रामगोपाल शर्मा का कहना है कि राजस्थान सरकार ने केंद्र की पहल पर जैविक खेती को बढ़ावा देने का काम तो किया, लेकिन आवश्यकता के मुकाबले बेहद कम संसाधन और राज्य सरकार की उदासीनता के चलते ऑर्गेनिक फार्मिंग अभी भी काफी कम जगह पर की जा रही है।

लंबे समय से कृषि से जुड़ी पत्रकारिता करने वाले शरद शर्मा बताते हैं कि राज्य सरकारों की भारी उदासीनता के चलते आज भी जैविक खेती को बढ़ावा नहीं दिया जा सका है, इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यूरिया और डीएपी खाद बनाने वाली कंपनियों का मकड़जाल है।

जैविक खेती को लेकर लंबे समय से धरातल पर लाने का प्रयास करने वाले सुरेश चौधरी बताते हैं कि प्रदेश में राज्य सरकार के मंत्री और अधिकारी पूरे मन से कभी भी ऑर्गेनिक फार्मिंग के पक्ष में नजर नहीं आते हैं। यही कारण है कि बेहतर पैदावार और क्वालिटी की शुद्ध फल-सब्जी देने वाली यह कृषि तकनीक उम्मीद के मुकाबले पनप नहीं पा रही है।

इस मामले में अपनी स्पष्ट ही राय रखने वाले किसान कजोड़ मल कहते हैं कि जब तक राज्य सरकार अपने स्तर पर संसाधन मुहैया नहीं करवा पाएगी और जैविक खेती का उचित दिशा में प्रचार-प्रसार नहीं होगा, तब तक इसको चरम पर ले जाने का सपना साकार नहीं हो सकता।

वरिष्ठ पत्रकार शरद शर्मा का कहना है कि राज्य सरकार के कृषि-सहकारिता विभाग के मंत्री और अधिकारियों ने कभी भी जैविक खेती को पूर्ण मन से बढ़ाने का काम नहीं किया। उसी का परिणाम है कि आज भी राजस्थान में किसान और पुलिस आमने सामने खड़े हैं।

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