Lalkrishna adwani narendra modi
Lalkrishna adwani narendra modi

New delhi

भाजपा से पहले जनसंघ। साल 1982 में पहला चुनाव लड़ा। पार्टी को केवल 2 लोकसभा सीटों पर संतोष करना पड़ा।

साल 1992 के दौरान बीजेपी नेता मुरली मनोहर जोशी और खुद मोदी जैसे उभरते हुए लीडर्स ने कन्याकुमारी से कश्मीर की यात्राएं कीं। दोनों ने कश्मीर के लालचौक पर तिरंगा फहराया। यह बीजेपी के दम दिखाने का वक्त था।

पार्टी नेता लालकृष्ण आडवाणी ने 1992 में अयोध्या यात्रा की। अयोध्या कांड हुआ। कई नेता जेल गए। अब भाजपा का युग शुरू हो चुका था। पार्टी ने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में पहली बार बीजेपी ने 1996 में 13 दिन की सरकार बनाई।

इसके बाद 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी ने ही 13 महीनों की सरकार बनाई, लेकिन एक वोट से सरकार गिर गई। साल 1998 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की 182 सीटें आईं। वाजपेयी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने।

2004 और 2009 का चुनाव बीजेपी के लौहपुरुष, यानी लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार तय कर उनके नेतृत्व में लड़ा गया, लेकिन पार्टी सत्ता हासिल नहीं कर पाई। शायद यह आडवाणी का चरम समय था।

साल 2014, भाजपा ने देश में पहली बार गैर कांग्रेसी पूर्ण बहुमत से सरकार बनाई। वह भी जरूरी 272 के मुकाबले पूरे 282 सांसदों के साथ। गठबंधन को मिलाकर 336 सीट। तब बीजेपी के संस्थापक सदस्य लालकृष्ण आडवाणी 85 साल के हो चुके थे।

लगभग उनके युग का अंत हो चुका था। संसद में उनकी उपस्थिति ही विपक्ष को बेचैन करने के लिए काफी थी, ऊपर से उन्हीं के सियासी शिष्य और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जो एक बार बोलने के लिए उठते थे, तो कांग्रेस के आज़ाद भारत के कार्यकाल पर पानी फेर देते थे।

क्रेडिट लेने की बातें आईं तो मोदी ने क्रेडिट तो दिया, लेकिन ऐसा दिया कि कांग्रेस न स्वीकार कर पाई, और न ही इनकार। संसद में कांग्रेस को मोदी ने खूब कोसा, बल्कि पानी पी पीकर कोसा। शायद कांग्रेस ने मोदी को मौके भी खूब दिए।

वर्ष 2002 में जब गुजरात दंगों की आग में झुलसा तो तत्कालीन प्रधानमंत्री और बीजेपी के कद्दावर नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने वहां के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को राजधर्म का पालन करने की हिदायत दी थी।

कहा जाता है कि तब वाजपेयी ने तो पार्टी अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी को गुजरात में नरेंद्र मोदी की जगह मुख्यमंत्री बदलने की सलाह दी थी, लेकिन आडवाणी ने ही मोदी को सपोर्ट करते हुए कंटीन्यू करने का आदेश सुनाया।

ऐसा नहीं है कि आडवाणी को गुजरात के दंगों का पता नहीं था, बल्कि हर पल की रिपोर्ट उनको भेजी जा रही थी। बावजूद इसके आडवाणी ने मोदी को आशीर्वाद दिया।

दंगें शांत हुए और उसके बाद आजतक गुजरात शांत ही है। साल 2009 का वक्त था, जब मोदी लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री का कार्यकाल पूरा कर रहे थे। केंद्र में यूपीए की सरकार बन चुकी थी।

एक साल पहले ही यूपीए की पहली सरकार ने देश के किसानों का 73000 करोड़ रुपये का कर्जा माफ किया था। लेकिन इसके बाद एक तरफ जहां आडवाणी की उम्र 80 पार कर चुकी थी, तो दूसरी ओर कांग्रेस वाली यूपीए सरकार के नेताओं के घोटाले सिर चढ़कर बोल रहे थे।

गुजरात के मुख्यमंत्री को दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश, अमेरिका ने वीजा देने से मना कर दिया। उसी वक्त मोदी ने अप्रवासी भारतीय सम्मेलन के जरिए दुनिया को अपनी ताकत का अहसास करवा दिया।

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के विरोध के कारण टाटा समूह को अपनी बहुप्रतीक्षित कार ‘लखटकिया’ को बनाने का कारखाना बंगाल से गुजरात के आणंद में स्थापित करना पड़ा।

ऐसे मौके को कारोबारी दिमाग वाले मोदी ने खूब प्रचारित किया। जितना फायदा लखटकिया से टाटा समूह को हुआ, उससे कई गुणा लाभ मोदी को हुआ।

उसके बाद पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार तो बनी, लेकिन आज लाख कोशिशों के बाद भी बंगाल की धरती एक तरह से कारोबारियों के लिए मुफीद जगह नहीं बन पाई है।

वर्ष 2011 का समय आया, तो गुजरात में चुनाव ने मोदी को एक ब्रांड नेता बना दिया। अब मोदी के पास खुद को बड़ा नेता साबित करने के लिए केवल यूपीए की सरकार की नाकामियों को उजागर करना और अपने 3 कार्यकाल का बखान करने का वक्त शुरू हो चुका था।

महज दो साल में मोदी ऐसा ब्रांड बना कि पूरे देश में जैसे उनके मुकाबले का कोई बचा ही नहीं। इसपर कांग्रेसी नेताओं के बयानों ने घी का तड़का लगाया। खुद यूपीए चैयरपर्सन सोनिया गांधी ने मोदी को “मौत का सौदागर” कहकर उनका पीएम बनने का रास्ता साफ किया।

2013 कि अंत में चली मोदी की आंधी ने जो काम राजस्थान में बीजेपी 163 सीटें दिलाने का किया, उस तूफान ने मई 2014 आते-आते भाजपा को 1982 की 2 सीटों के मुकाबले 282 सीटों पर ला दिया।

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