जयपुर।
राजनीति का अखाड़ा वैसे तो दुश्मनों और दोस्तों के लिये कोई नई जगह नहीं है, जहां पर जीत—हार का सिलसिला चलता रहता है, किंतु कुछ राजनेता ऐसे होते हैं, जिनको हराने के लिये शायद ईश्वर ने किसी को भेजा ही नहीं होता है।

जी हां! ऐसे ही एक राजनेता भारत की राजनीति में हैं, जिनका नाम है नरेंद्र मोदी। लोग नरेंद्र मोदी को गुजरात का मुख्यमंत्री और भारत के प्रधानमंत्री के तौर पर जानते हैं, किंतु इन दो पदों की राह में उन्होंने कितने कांटे हटाये होंगे, यह बात उनसे और उनके करीबियों से ज्यादा कोई नहीं जातना।

वैसे तो मोदी और शाह का साथ साल 1983 का है, जब शाह कॉलेज के स्टूडेंट थे और मोदी आरएसएस में काम करते थे। लेकिन दोनों की दोस्ती कब प्रगाढ़ हो गई, यह शायद उनको भी पता नहीं चला। जब नरेंद्र मोदी को 90 के दशक में भाजपा में संगठन नेतृत्व को मौका मिला, तो उन्होंने इसको भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

1982 में बनी भाजपा का जब चमकने का समय था, तब 1991 के वक्त नरेंद्र मोदी देश के कई अन्य राज्यों के प्रभारी के तौर पर काम कर रहे थे। उन्होंने हरियाणा, हिमाचल प्रदेश समेत कई राज्य में चुनाव प्रबंधन का काम बखूबी किया था।

लेकिन दुश्मन कभी किसी को छोड़ते नहीं हैं। इसी दौरान गुजरात की राजनीति में चमकता हुआ नाम था केशुभाई पटेल। पटेल तब गुजरात की राजनीति में ऐसा सितारा थे, जो भाजपा को अपने इर्द गिर्द रखते थे।

केशुभाई पटेल 14 मार्च 1995 से 21 अक्टूबर 1995 तक एक शॉर्ट टर्म के ​लिये गुजरात के मुख्यमंत्री बने। तब वहां पर कांग्रेस का पतन शुरू हो चुका था। इसके बाद 4 मार्च 1998 को पटेल फिर से गुजरात के मुख्यमंत्री बने, लेकिन 2 अक्टूबर 2001 को उनपर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों, खराब स्वास्थ्य और भुज में आये विनाशकारी भूकंप के बाद उनको इस्तीफा देना पड़ा।

यही वक्त था, जब राजनीतिक तौर पर परिपक्व हो चुके नरेंद्र मोदी को मुख्यधारा में आना था। भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव के पद पर काम कर रहे नरेंद्र मोदी के नाम पर पार्टी ने सहमति दे दी। इसके बाद मोदी 2001 से लगातार 2014 में तब तक मुख्यमंत्री रहे, जब वह प्रधानमंत्री बने।

हालांकि, इससे पहले 1995 से ही नरेंद्र मोदी और केशुभाई पटेल के बीच राजनीति टकराव शुरू हो गया था, लेकिन मोदी का कद तब काफी छोटा था, इसलिये केशुभाई ने उनको ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन मोदी ने जो ठान लिया था, उसमें प्रकृति ने भी उनका साथ दिया।

2 अक्टुबर 2001 को केशुभाई को भुज भुकंप के वक्त मैनेजमेंट सही नहीं होने के कारण खराब स्वास्थ्य का बहाना बनाकर सत्ता छोड़नी पड़ी। लेकिन केशुभाई ने मोदी का विरोध नहीं छोड़ा। वह लगातार मोदी को घेरने का मौका नहीं छोड़ते थे। यह काम उन्होंने विपक्ष के साथ मिलकर 2002 के गोधरा दंगों के वक्त भी बखूबी किया, किंतु विधि को कुछ और ही मंजूर था।

कभी मोदी को सत्ता और संगठन से मिटाने की कसमें खाने वाले केशुभाई पटेल भले ही अपनी अलग पार्टी बनाकर गुजरात में चुनाव लड़ने का दंभ भरते हों, लेकिन उनका करियर मोदी की चपेट में आने के बाद पूरी तरह से नेस्तानाबूद हो गया।

मोदी के एक अन्य अनन्य मित्र रहे आरएसएस के बड़े कद्दावर नेता संजय जोशी ​थे। मोदी और जोशी के बीच बेहद मित्रवत रिस्ते थे। लेकिन जाने किस कारण से मोदी ओर संजय जोशी के बीच दूरियां बनी, कि जो व्यक्ति कभी सुरेश भय्याजी जोशी से भी कम नहीं था, वह रसातल में चला गया।

मोदी के राजनीतिक गुरू कहलाने वाले लालकृष्ण आडवाणी आज अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर दिन काट रहे हैं। भले ही आडवाणी ने साल 2002 के गुजराज दंगों के वक्त मोदी का साथ दिया हो, लेकिन जब 2013 में मोदी को पीएम पद का उम्मीदवार बनाने की बारी आई तो आडवाणी ही पहला नाम था, जो विरोध में मुखरता से उतरा था।

आडवाणी के आज हालात क्या हैं, यह किसी से छिपे नहीं हैं। कभी उप प्रधानमंत्री पद पर पहुंचे और कभी भाजपा में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार रहे आडवाणी न कहीं पर राज्यपाल बन सके और न ही राष्ट्रपति पद पर पहुंच सके।

शंकर सिंह वाघेला भी ऐसा ही नाम था। कहते हैं कि शंकर सिंह वाघेला वो नेता थे, जो मोदी को कमर के नीचे मार सकते थे। यानी मित्रता इतनी गहरी थी कि दोनों बहुत अनन्य मित्र थे। फिर वाघेला ने पहले भाजपा में और कांग्रेस में रहकर मोदी को खूब कोसा। लेकिन मोदी विरोध में आखिरकार उनका करियर भी अस्त हो गया।

विश्व हिंदू परिषद के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रवीण भाई तोगडिया और मोदी की दोस्ती जग जाहिर है। तोगड़िया मोदी के बेहद करीब थे। उनको भी मोदी के ​लिये बिसात तैयार करने वाला माना जाता है। किंतु जैसे ही तोगड़िया दुश्मन बने तो उनका भी पद ही नहीं, सितारा भी उनसे दूर चला गया।

यशवंत सिन्हा, जो अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में वित्त मंत्री रह चुके थे। वह ऐसे कद्दावर नेता थे, जिसने 2014 में मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही ​बगावत शुरू कर दी। नतीजा यह निकला कि जो कभी भाजपा की धुरी हुआ करते थे, वह हमेशा के लिये जमींदोज हो गये। आज उनको पूछने वाला कोई नहीं है।

शत्रुघन सिन्हा भी ऐसा ही नाम है। कभी बिहार भाजपा का बड़ा चेहरा रहे सिन्हा भी यशवंत सिन्हा की तरह ही मोदी का शिकार हो गये। उन्होंने ने भी मंत्री नहीं बनने की कसक में मोदी से पंगा लिया और आखिरकार 2019 के चुनाव में पार्टी से ही बाहर हो गये।

नवजोत सिंह सिद्दू भी ऐसा ही नाम है, जो मोदी का शिकार होने वालों में गिना जायेगा। 2014 से 2019 की मोदी सरकार के वक्त सांसद रहे सिद्दू ने भी खुद को बड़ा करने के चक्कर में मिटा लिया। कांग्रेस में भी गये, लेकिन जो हस्र हुआ है, वह सबके सामने है।

उदित राज भी सासंद थे। लेकिन मोदी और शाह के खिलाफ बोलने वाले उदित राज को न केवल 2019 को टिकट गंवाना पड़ा, बल्कि कांग्रेस से टिकट लेकर भी हार गये। यह ऐसे लोग थे, जो भाजपा में मोदी का विरोध करने वाले थे।

अब बात करते हैं भाजपा से बाहर की। भाजपा के बाहर 2019 के लोकसभा चुनाव के वक्त मोदी विरोध में 27 साल बाद गठबंधन करने वाले बुआ और बबुआ की जोड़ी के सपने अधूरे ही रह गये। उनको न तो मनमाफिक सफलता मिली और मोदी—शाह से उनकी दुश्मनी हुई जो अलग। इनके साथ ही अजीत सिंह के बेटे जयंत चौधरी की भी भ्रूण हत्या हो गई।

लालू प्रसाद यादव का भी यही हाल हुआ। कभी साल 2014 तक मोदी की मिमिकिरी करने वाले लालू यादव अपने जीवन के आखिरी वक्त को जेल में काट रहे हैं। कभी बिहारी की राजनीति में सितारे रहे लालू यादव के पास अब बिहार का एक कोना भी नहीं बचा है, साथ में उनके बेटे भी एक तरह से नालायक ही साबित हुये हैं।

वहीं के मुख्यमंत्री नितिश कुमार भले ही भाजपा से अलग होकर फिर भाजपा के साथ आ गये हों, लेकिन कभी मोदी के विकल्प के तौर पर खुद को पेश करने वाले नितिश कुमार की हालत यह है कि उनकी रैलियों में मोदी—मोदी होता है और उनको देखना ही पड़ता है।

ममता बनर्जी के सामने यदि कोई मोदी का नाम भी लेता है तो वह आग बबूला हो जाती हैं। स्थिति यह है कि अब लोग ममता को मोदी के नाम से ड़राने का काम भी करने लगे हैं। साल 2019 के चुनाव से पहले ममता बनर्जी ने भी पीएम बनने के सपने देखे थे।

ऐसा ही हाल चंद्रबाबू नायडू का है। 2014 में भाजपा के सहयोगी रहे चंद्रबाबू नायडू फिर अलग होकर विपक्षी दलों के बल पर खुद को पीएम समझ बैठे, लेकिन विपक्ष के पास न तो विजन था और न ही मोदी जैसे कद्दावर नेता से सामना करने की हिम्मत थी। नतीजा सबके सामने है।

इसी कड़ी में कांग्रेस के कपिल सिब्बल, दिग्विजय सिंह, मणिशंकर अयय्यर जैसे नेता भी हैं, तो पी चितंबरम भी हैं। इसी कड़ी में बहुत सारे नेता हैं। दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल भी इसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। वह दिल्ली की सभी 7 लोकसभा सीट गंवाने के बाद मोदी का अगला शिकार होने को हैं।

विपक्षियों में सबसे बुरी गत हुई है राहुल गांधी की। कभी 2012 के वक्त प्रधानमंत्री बनने की तरफ बढ़ रहे राहुल गांधी के लिये राजनीति एक बुरे सपने की तरह हो गई है। मोदी के नाम से राहुल रात को भी उठ बैठते होंगे। उनको अध्यक्ष भी बनाया गया, लेकिन जीवन में जितनी हार राहुल को मिली, उतनी शायद भारत की राजनीति में किसी को न मिली होगी।

हालात, यह हो गये हैं कि राहुल 2019 के लोकसभा चुनाव परिणाम के एक दिन पहले तक अपना मंत्रीमंडल बना चुके थे और रिजल्ट के बाद अध्यक्ष पद से भी दूर हो गये। आज उनकी मां को फिर से सामने आना पड़ा है। राहुल की राजनीति अस्त हो चुकी है।

अब बात करते हैं मोदी के दोस्तों की। मोदी के दोस्तों में वैसे तो बराक ओबामा से लेकर इजराइल के पीएम नेत्यानाहु भी हैं, लेकिन देश में उनके करीबियों में सबसे पहला और आखिरी नाम शायद अमित शाह का ही आता है। अमित शाह नरेंद्र मोदी के साथ 1983 से लेकर आजतक छाया कि तरह काम कर रहे हैं। यही कारण है कि वह बढ़ते बढ़ते आज देश के नंबर दो नेता बन चुके हैं।