जयपुर।

मतदान के परिणाम से पहले ही कांग्रेस पार्टी आपस में उलझ गई है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और अध्यक्ष सचिन पायलट के बीच दो साल से जारी मुख्यमंत्री की उम्मीदवारी की कलह सतह पर आ चुकी है।

इसकी शरुआत शहर अध्यक्ष प्रताप सिंह खाचरियावास ने अशोक गहलोत के बयान पर पलटवार कर किया तो खुद गहलोत ने उनके बयान को सही बताकर मामले को ठंडा करने की कोशिश की।

लेकिन शाम होते-होते नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी के द्वारा इस मामले में खुद को शामिल कर फिर से विवाद को हवा दे दी गई। डूडी ने किसान की कोख से पैदा हुए को मुख्यमंत्री बनाने की बात कहकर खुद को रेस में शामिल कर दिया।

डूडी के द्वारा विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहते जनता के लिए मौजूदा सरकार से लड़ने और यह जिम्मेदारी पूरी मेहनत, तन्मयता से निभाने की बात कहते हुए खुद को मुख्यमंत्री की रेस में बताने से कांग्रेस पार्टी में हलचल पैदा हो गई है।

रामेश्वर डूडी के इस बयान के बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर दो धड़ों में बंटी कांग्रेस पार्टी तीन जगह बंटी हुई नजर आ रही है। टीवी चैनल को बयान देकर रामेश्वर डूडी ने आलाकमान तक अपनी बात पहुंचा दी है। अब देखना होगा कि कांग्रेस पार्टी अशोक गहलोत और सचिन पायलट के अलावा रामेश्वर डूडी के नाम पर विचार करती है या नहीं।

बताते चलें कि राजस्थान में कांग्रेस पार्टी के द्वारा 1998 में किसान मुख्यमंत्री के नाम पर चुनाव लड़ा जा चुका है। तब सत्ता में आने के बावजूद पार्टी ने किसान परिवार में जन्मे परसराम मदेरणा को मुख्यमंत्री नहीं बना कर जादूगर लक्ष्मण के बेटे अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री की सत्ता सौंप दी थी।

पार्टी में एक बार फिर रामेश्वर डूडी के नाम से किसान मुख्यमंत्री और जाट मुख्यमंत्री के बाद उठ चुकी है। अब देखना यह भी दिलचस्प होगा कि उनके नाम पर राज्य के किसान तबके से आए हुए कितने विधायक एकराय हो पाते हैं।

इधर, पांच साल से जनता के लिए लड़ते हुए कांग्रेस पार्टी को संभालने वाले अध्यक्ष सचिन पायलट का गुट पूरी तरह से मुख्यमंत्री के लिए लॉबिंग करने में लगा है।

सचिन पायलट खुद अब ने अभी तक मुख्यमंत्री की दावेदारी को लेकर कोई बयान नहीं दिया है, लेकिन उनके गुट के माने जाने वाले प्रताप सिंह खाचरियावास के द्वारा अशोक गहलोत के बयान को काटना इस बात का संकेत है कि पायलट खेमा पूरी तरह से सक्रिय हो चुका है।

देखने वाली बात यह भी है कि राजस्थान में 2013 के दौरान चुनाव हार कर 21 सीटों पर सिमटी कांग्रेस को 5 साल तक संघर्ष कर फिर से फाइट में लाने वाले अध्यक्ष सचिन पायलट को दरकिनार कर पार्टी अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री की सत्ता कैसे सौंपती है।

दोनों के सामने है दो बार के मुख्यमंत्री, राष्ट्रीय महासचिव और संगठन महामंत्री अशोक गहलोत। अशोक गहलोत को राजस्थान में राजनीति का जादूगर कहा जाता है। यह काम उन्होंने 1998 और 2008 के दौरान बखूबी किया भी है।

लेकिन 1998 में मुख्यमंत्री बनने के बाद कांग्रेस पार्टी 2003 में अशोक गहलोत के नेतृत्व में बुरी तरह से चुनाव हार चुकी है। उसके बाद 2013 में फिर से अशोक गहलोत का नेतृत्व होने के बावजूद पार्टी इतिहास की सबसे कम केवल 21 सीटों पर सिमट कर रह गई थी।

अशोक गहलोत को पिछले 2 साल के दौरान राहुल गांधी का सबसे करीबी नेता माना जाने लगा है, लेकिन केंद्रीय मंत्री होते हुए सचिन पायलट और उम्र के लिहाज से राहुल गांधी के समकक्ष होने के कारण पायलट का कद राहुल गांधी की नजर में अशोक गहलोत से ज्यादा सूटेबल बताया जाता है।

इधर, तीसरा गुट बनकर उभरे नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी 5 साल से राजस्थान में सरकार के साथ विधानसभा में लोहा ले रहे हैं। वह एक बार सांसद रह चुके हैं, जबकि दूसरी बार विधायक बन रहे हैं।

कांग्रेस पार्टी में जाट समाज में आज उनके अलावा दूसरा कोई बड़ा चेहरा नहीं है, जिसके चलते पार्टी को किसान मुख्यमंत्री और जाट मुख्यमंत्री के तौर पर आगे किया जा सकता है। इसकी भी पूरी संभावना बताई जा रही है, लेकिन अशोक गहलोत और सचिन पायलट दोनों के बीच विवाद होने पर ही रामेश्वर डूडी की दावेदारी मजबूत हो पाएगी।

वैसे आमतौर पर कांग्रेस पार्टी के द्वारा राजस्थान में उसी व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है जो आलाकमान, यानी कि गांधी परिवार के सबसे करीब होता है।

किंतु बार-बार राजस्थान में किसानों के मुख्यमंत्री की मांग के बीच रामेश्वर डूडी को दरकिनार करना पार्टी के लिए बेहद कठिन होगा। खासकर 2019 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए पार्टी इस पर फैसला सोच समझकर ही कर पाएगी।