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जयपुर
राजस्थान में सरकार गठित हुये अभी महज 10 महीनें ही गुजरे हैं कि अगली सरकार या अगले मुख्यमंत्री के नाम पर चर्चा जोरों पर चल रही है। राजस्थान के लोकतांत्रिक इतिहास में संभवत: ऐसा पहली बार हो रहा है कि बहुमत में होने के बाद भी राज्य में मुख्यमंत्री या सरकार बदलने की चर्चा चल रही है।

आज हम इसी को लेकर आपको बतायेंगे कि ऐसे क्या कारण हैं, जो इस पर चर्चा हो रही है। इसके साथ ही यह भी बतायेंगे कि कौन है, जो वर्तमान मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बाद राज्य की बागडोर संभाल सकता है। इतना ही नहीं, उसके कारण भी आपको बतायेंगे। तो आप खबर को अंत तक पढिये और तय कीजिये की हमारे विशलेषण में कितना दम है….

सबसे पहले बात करते हैं कांग्रेस पार्टी के अंतर्कलह की। राज्य में साल 2013 के दौरान जब अशोक गहलोत सत्ता से बेदखल हो गये और कांग्रेस को इतिहास की सबसे बुरी हार का सामना करना पड़ा, तो कांग्रेस पार्टी ने पूर्व केंद्रीय मंत्री सचिन पायलट जैसे युवा को पुन: सत्ता प्राप्ति का जिम्मा सौंपा।

कहा जाता है कि पायलट को टारगेट दिया गया था कि अगर 2018 में कांग्रेस को सत्ता दिलाने में कामयाब होते हैं तो उनको मुख्यमंत्री बना दिया जायेगा। इसके बाद पायलट ने संगठन को पुन: अपने मुताबिक सांचे में ढाला और लग गये कांग्रेस को फिर से सत्ता दिलाने के लिये।

राज्य में तीन बार उप चुनाव हुये और तीनों में कांग्रेस पार्टी का प्रदर्शन सराहनीय रहा। सबसे पहले तीन विधानसभा सीटों पर चुनाव हुये तो कांग्रेस को पायलट ने 2 सीटों पर जीत दिलाने में कामयाबी पाई। इसके बाद दो लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज कर वसुंधरा राजे सरकार की चूलें हिलाकर रख दी। महज धौलपुर की विधानसभा सीट कांग्रेस नहीं जीत पाई। देखा जाये तो पायलट ने कांग्रेस को औसत से ज्यादा सीटों पर जीत दिलाई।

अब बारी आई 2018 के विधानसभा चुनाव की। यहां पर चुनाव से पहले ही हमेशा की भांति अशोक गहलोत ने अपनी चतुराई दिखाते हुये मीडिया के माध्यम से केंद्रीय आलाकमान तक यह बात पहुंचानी शुरू कर दी कि मुख्यमत्री के तौर पर जनता उनको ही पंसद करतीण् हैं।

दूसरी तरफ वसुंधरा सरकार के खिलाफ गुस्सा भरा था तो बीजेपी नेताओं द्वारा वसुंधरा राजे को मुख्यमंत्री पद से नहीं हटाये जाने से यह रोष और बढ़ गया। इसपर भाजपा ने वसुंधरा राजे को फिर मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया।

‘मोदी तुझसे बैर नहीं, वसुंधरा तेरी खैर नहीं’ का नारा बुलंद हुआ। सचिन पायलट के नाम राज्य के सभी गुर्जर एक तरफा वोटिंग करने के बेकरार थे। ऐसे समय में कांग्रेस में दो धडे हो गये, जिसका भाजपा वसुंधरा राजे के कारण फायदा उठाने में नाकाम रही।

खैर, जनता ने अपना फैसला सुनाया और भाजपा 163 से सीधे 73 सीट पर आ गई। सचिन पायलट के नेतृत्व में कांग्रेस ने शानदार जीत हासिल कर 21 से 100 सीट पर जीत हासिल की।

अब बारी सचिन पायलट के मुख्यमंत्री बनने की थी, लेकिन जैसा 1998 और 2008 में कर चुके थे, वैसे ही अशोक गहलोत ने एक फिर अपनी चतुराई का परिचय दिया। उन्होंने कांग्रेस आलाकमान को यह संदेश समझाने में कामयाबी हासिल कर ली, कि राजस्थान को वही संभाल सकते हैं।

कहा जाता है कि जब—जब राज्य में कांग्रेस की सत्ता आती है तो सोनिया गांधी के अध्यक्षा बनने के बाद गहलोत यह संदेश देने में सफल होते हैं कि राज्य में जातिवाद हावी है और ऐसी स्थिति में केवल वही सत्ता को सुचारू ढंग से चला सकते हैं। ऐसे में सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी को गहलोत ने अपने पाले में कर लिया। अध्यक्ष होने के बाद भी राहुल गांधी अपने मित्र और राज्य के अध्यक्ष सचिन पायलट को मुख्यमंत्री नहीं बना पाये।

अब बात करते हैं वर्तमान परिस्थियों के बाद होने वाले बदलाव की। आज की तारीख में राज्य दो शक्तियों में बंटा हुआ नजर आ रहा है। एक धड़े में अशोक गहलोत और सीपी जोशी समेत उनकी पूरी मंडली है, तो दूसरे धड़े में हनुमान बेनीवाल, भाजपा के अध्यक्ष सतीश पूनिया और खुद सचिन पायलट नजर आ रहे हैं।

देखने में तो यह गठजोड़ कुछ बैमेल सा है, लेकिन राजनीति ऐसी ही होती है। इसमें जो होता है, वह दिखता नहीं है और जो दिखता है, वह होता नहीं है। यही कारण है कि कांग्रेस के अध्यक्ष और प्रदेश के उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के साथ हनुमान बेनीवाल हैं, जबकि कभी धुर विरोधी रहे सीपी जोशी गहलोत के साथ चले गये हैं।

इधर, भाजपा ने सतीश पूनिया जैसे जमीनी कार्यकर्ता को अध्यक्ष बनाकर साफ कर दिया है कि अब वसुंधरा राजे का युग चला गया है। उनके साथ हनुमान बेनीवाल हैं, तो आरएसएस का बैस उनको मजबूती प्रदान करता है।

बात करते हैं अगले मुख्यमंत्री की। हालांकि, अभी तक तो किसी तरह से सत्ता परिवर्तन की गुंजाइश दिखाई नहीं दे रही है, लेकिन सत्ता का चरित्र किसी से छुपा नहीं है। ऐसे में सचिन पायलट की आगे की रणनीति पर सबकुछ निर्भर करता है।

10 महीनें बीते हैं और सत्ता परिवर्तन की बात हो रही है तो फिर 2023 में मुख्यमंत्री के दावेदारों की बात भी करनी लाजमी है। राजस्थान में 1993 में जारी ट्रेंड के मुताबिक देखा जाये तो सत्ता भाजपा की आने वाली है। कांग्रेस सत्ता से बाहर होगी, तो ऐसे में अशोक गहलोत के नाम पर चर्चा करना बैकार है।

यदि कोई बड़ा सियासी बदलाव नहीं होता है तो सचिन पायलट भी इस रेस से स्वत: ही बाहर हो जाते हैं। अब रहते हैं सतीश पूनिया, हनुमान बेनीवाल के साथ केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत और सबसे अंत में वसुंधरा राजे की भी क्षणभर संभावना। हालांकि, जो संकेत नजर आ रहे हैं उससे साफ है कि वसुंधरा राजे की उम्मीद करीब—करीब खत्म हो चुकी है।

अब बात करते हैं हनुमान बेनीवाल की। साल 2018 के दिसंबर महीनें में पार्टी बनाई, 57 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और 3 विधायक जिताने में सफल रहे। इसके बाद मई में हुये लोकसभा चुनाव के वक्त दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी, भाजपा को झुकाने में कामयाब रहे और नागौर से सांसद बने। अब राज्य की दो विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हो रहे हैं और बेनीवाल ने भाजपा से बराबरी पर गठबंधन करने में कामयाबी हासिल की है।

ऐसे हालात में नजर आ रहा है कि 2023 में भाजपा और रालोपा के बीच गठबंधन होने की पूरी संभावना है। यदि ऐसा होता है तो रालोपा पश्चिमी राजस्थान की सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी, जहां पर जीत की संभावना अधिक होगी। उम्मीद होगी कि रालोपा को भाजपा कम से कम 10 प्रतिशत सीटें, यानी 20 सीटें गठबधंन के तहत देगी, जो हनुमान बेनीवाल की बड़ी कामयाबी होगी।

सतीश पूनिया फिलहाल 3 साल के लिये भाजपा अध्यक्ष बने हैं। लेकिन तीन साल में अगर उनका नेतृत्व ठीक रहता है और पार्टी को फिर से सत्ता की तरफ ले जाने में कामयाब रहते हैं तो 2023 में पार्टी उनको मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बना सकती है।

परिणाम के बाद ही साफ होगा कि सीटों के बंटवारे के बाद भाजपा और रालोपा में दमदार कौन है और उसी आधार पर यह तय होगा कि मुख्यमंत्री की कुर्सी किसके हिस्से आयेगी। इस बीच केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को जिक्र करना भी जरूरी है। लगभग सतीश पूनिया जितना ही राजनीति अनुभव और उम्र के धनी शेखावत भी आरएसएस की पृष्ठभूमि से आते हैं।

इस लिहाज से देखा जाये तो सतीश पूनिया और गजेंद्र सिंह का कद बराबर होता है, लेकिन केंद्रीय केबिनेट मंत्री होने के कारण सत्ता में शेखावत बड़े होते हैं। इसी तरह से राज्य के भाजपा अध्यक्ष होने के करण सतीश पूनिया संगठन में उनसे बड़े हैं। कहने के मतलब यह है कि सतीश पूनिया और गजेंद्र सिंह शेखावत का कद करीब—करीब बराबर का होता है।

अब दोनों के पास समय है पूरे 4 साल का। दोनों अपना अपना दम दिखाने यात्रा पर निकल पड़े हैं और दोनों ही पार्टी के अनुशासित कार्यकर्ता हैं। ऐसे में जो भी नेता खुद को राजनीतिक तौर पर और संगठन के तौर साबित कर देगा, वही 2023 में मुख्यमंत्री पद का दावेदार हो सकता है।