जयपुर।

अजमेर में साल 1987 से 1992 के दौरान समाज विशेष का एक पूरा गैंग यहां के सोफ़िया गर्ल्स स्कूल में पढ़ने वाली लड़कियों से अलग अलग फार्म हाउस पर बुलाकर उनके साथ बलात्कार करता था और उन लड़कियों की फोटो खींचकर उनके सहारे से और लड़कियों को बुलाया जाता था।

दिल दहलाने वाले इस देशव्यापी कांड़ की कई बरसों तक लड़कियों के घरवालों को भी भनक नहीं लगी। इस कांड़ में बलात्कार की पीड़ित गर्ल्स में आईएएस, आईपीएस की लड़कियों भी थीं, जिनके माता—पिता बड़े ओहदे पर बैठे थे। यह गैंग लड़कियों को बुलाकर उनके साथ न केवल रेप करती थी, बल्कि उनकी अश्लील फोटो खींचकर रखती थी।

बाद में जब उनके मन में दूसरी लड़कियों को बुलाने की इच्छा होती थी, तब उनके सहारे से उन्हीं को ब्लैकमेल कर दूसरी सहेलियों को बुलाते और उनके साथ भी ऐसे ही रेप कर फोटो खींच लेते थे।

जिस कलर लैब पर फोटो की रील धुलवाया करते थे, उस दुकानदार ने भी सभी की फोटोज की एक—एक अतिरिक्त कॉपियां रखी लीं और वह भी उसी गैंग में शामिल होकर रेप करने लगा।

सबसे पहले एक महात्वाकांक्षी लड़की के द्वारा यह कहानी शुरू हुई। वह खुद ब्लैकमेल हुई तो फिर दूसरी लड़की, तीसरी लड़की, चौथी, पांचवीं… और ऐसे करके 100 से भी ज्यादा लड़कियों के साथ हुई यह कांड़ कारित किया गया। ये सभी रेप की गईं लड़कियां किसी गरीब या बेबस परिवारों से नहीं थीं, बल्कि अजमेर जिले के जाने-माने बड़े और पैसे वाले घरों से आने वाली थीं। यहां का सोफ़िया न केवल राज्य के, बल्कि देश के जाने-माने निजी स्कूलों में से एक है।

जब इस कांड़ का भांड़ा फूटा तो सामने आया कि कई लड़कियों ने आत्महत्या कर ली। जिन लड़कियों को गवाह बनाया गया, उनमें से अधिकांश मुकर गईं और केवल 2 ही लड़कियां कोर्ट में गवाह देने के लिए तैयार हुईं।

उस केस से जुड़े रहे रिटायर एक अधिकारी ने बताया कि यह सब काफी पहले से पता चल गया था, लेकिन रेपिस्ट मुश्लिम समुदाय के थे और लड़कियां हिंदू थीं, जिसके चलते साम्प्रदायिक दंगों के चलते सरकार ने भी कोई कदम नहीं उठाया।

अलग अलग फार्म हाउसों पर किया जाता था रेप

सबसे पहला मामला फारूक चिश्ती नाम के एक आदमी का है। वह यहां की दरगाह से जुड़ा हुआ था। उसने सबसे पहले सोफ़िया स्कूल की एक लड़की को अपने जाल में फंसाया। उसने एक फार्म हाउस पर ले जाकर उसका रेप किया और उस लड़की की अश्लील फोटो खींच ली।

इसके बाद फारूख चिश्ती ने इस फोटो से ब्लैकमेल कर उस लड़की के द्वारा और लड़कियां बुलाईं। वह लड़की और उसके बाद पीड़ा झेलने वाली लड़कियां डर कर के मारे दूसरी लड़कियों को भी बुलाने लगीं। फारूख उन लड़कियों को दोस्तों के फार्म हाउस पर ले जाने लगा।

उसने न केवल खुद कई बार कई लड़कियों से रेप किया, बल्कि अपने दोस्तों को भी रेप करने के लिए बुलाने लगा। एक लड़की से शुरू हुई यह कहानी दूसरी, तीसरी, चौथी होते हुए 100 से उपर निकल गई।

अलग अलग फार्म पर ले जाकर फारूख और उसके दोस्तों के द्वारा ऐसे करके सोफिया स्कूल की सौ से ज्यादा लड़कियों के साथ रेप किया गया। अपने घरवालों के सामने ही लकड़ियां फार्म हाउसों पर जातीं थीं। बताते हैं कि लड़कियों को लेने के लिए बाकायदा गाड़ियां आती थीं और वापस छोड़कर भी जातीं थीं।

लड़कियों की बलात्कार के समय फोटो खींच ली जाती थीं, और उसके बाद उन्हें डरा-धमकाकर दूसरी लड़कियों को भी रेप करने के लिए बुलाया जाता था। कहा तो यह भी जाता है कि सोफिया स्कूल की पीड़ित इन लड़कियों के साथ बलात्कार करने वालों में नेता, कई सरकारी अधिकारी भी शामिल थे।

कांड़ का मास्टरमाइंड कांग्रेस यूथ लीडर

इस पूरे महाकांड़ के मुख्य आरोपी फारूक चिस्ती, नफीस चिस्ती, अनवर चिस्ती नाम के तीन जने थे। ये तीनों ही युवक कांग्रेस के नेता थे। फारूक चिश्ती तो यहां जिलाध्यक्ष की पोस्ट पर था। इन तीनों आरोपियों की पहुंच अजमेर दरगाह के खादिमों तक भी थी।

दरगाह के खादिमों तक पहुंच का ही कारण था कि बलात्कार करने वालों के खिलाफ कुछ नहीं हो पा रहा था। उनके पास न केवल राजनैतिक और धार्मिक ताकत थी, बल्कि पैसे की भी कमी नहीं थी। इस रेप कांड़ में शिकार हुईं अधिकांश लड़कियां हिंदू थीं। मामला सामने आ गया, लेकिन तब पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों को लगा कि मामले का खुलासा हो गया तो ‘हिन्दू-मुस्लिम’ दंगे हो सकते हैं।

इस तरह से मामला और आगे बढ़ गया और आगे चलकर इस महाकांड़ में और लोग जुड़ते गए। इसमें कुल 18 आरोप शामिल हो गए थे। इन रेपिस्टों में रील लैब का वह मालिक भी शमिल हो गया जो नेगटिव से फोटो बनाने का काम करता था।

बोलने वालों को जान जाने की धमकी

देश के सबसे बड़े रेप कांड में से एक इस मामले में बहुत बड़ा बवाल हो गया था। लेकिन आरोपियों की पहुंच ऐसी थी कि इस प्रकरण को लेकर जो भी केस लड़ने के लिए आता, उसी को धमका दिया जाता था।

अजमेर मुहल्ला समूह नामक एक NGO ने जब इस केस की लड़ाई लड़ने की शुरूआत की, तो उसको भी जान से मारने की धमकी मिली। जिसके कारण एनजीओ के कार्यकर्ता भी पीछे हट गए।

बताया जाता है कि इस मामले में कम्युनिस्ट विचारधारा के एक वकील पारसम शर्मा, जो कि इस केस को लड़ रहे थे, उनको भी केस बंद करने की धमकियां मिलती थीं। खास बात यह है कि पीड़ित लड़कियों के घरवालों ने भी सामने आने से इनकार कर दिया था।

कई लड़कियां आत्महत्या कर मर गईं

फारूख चिश्ती और उसके साथियों ने जिन स्कूली लड़कियों के फोटो खींचकर उनका रेप किया था। उनमें से कई लड़कियों ने परेशान होकर सुसाइड ही कर लिया था। इनमें से एक साथ 6-7 लड़कियां मर गईं थीं। इस हाई प्रोफाइल केस में न तो समाज आगे आ रहा था ओर नही ही उनके परिवार वाले हिम्मत दिखा पा रहे थे। इसके कारण तनाव में आकर कई लड़कियों ने सुसाइड का कदम उठाया था। अजमेर की सबसे प्रतिष्ठित प्राइवेट स्कूल की लड़कियों का एक साथ सुसाइड करना बहुत अजीब हो गया था। जिसके चलते यह केस खुलने में मददगार साबित हुआ।

यह राज खोलने वाली केवल दो लड़कियां सामने आईं

राजस्थान पुलिस और तमाम महिला संगठनों की पूरी कोशिशों के बाद भी पीड़ित लड़कियां और उनके परिवार वाले केस के लिए आगे नहीं आ रहे थे। गैंग के लोगों के देश के बड़े नेताओं से रिश्ते थे, जिसके चलते किसी ने मुंह नहीं खोला। किसी  NGO की गहन पड़ताल के बाद फोटोज के द्वारा 30 लड़कियों की पहचान हुईं। जिनसे जाकर बातकर आगे आने को कहा गया, किंतु समाज में होने वाली बदनामी के ड़र से अधिकांश परिवारों ने इनकार कर दिया।

इन 30 में से केवल 12 लड़कियां ही केस दर्ज करने को तैयार हुईं। इसका पता चलने पर आरोपियों की ओर से मिलने वाली धमकियों के चलते उनमें से भी 10 लड़कियों ने खुद को मामले से अलग कर लिया। बची हुइ केवल 2 लड़कियों ने केस किया। जिन्होंने कांड़ में शामिल 16 जनों को पहचाना। उनमें से 11 आरोपियों को पुलिस ने पकड़ा, बाकि रसूख में बच निकले।

शुरुआत से लेकर अंतिम जानकारी 

सबसे पहले 1992 में पूरे कांड़ का भांडा फूटा। पीड़ित लड़कियों से आरोपियों की पहचान करवाने के बाद 8 जनों को गिरफ्तार किया।
इसके बाद साल 1994 में पुरुषोत्तम नामक एक आरोपी ने जमानत पर छूटने के बाद आत्महत्या कर ली।
इस केस का पहला फैसला 6 साल बाद साल 1998 में अजमेर जिला न्यायालय द्वारा सभी 8 जनों को उम्र कैद के तौर पर सामने आया।

इसी सजा के परिणामस्वरूप आरोपी फारूक चिस्ती ने अपना मानसिक संतुलन खो दिया, हालांकि बताया जाता है कि उसको झूठी रिपोर्ट के आधार पर मेंटल घोषित करवाया गया था, जिसके कारण उसकी ट्रायल नहीं चली।
इसके बाद जिला अदालत ने 4 जनों की सजा कम कर उन्हें 10 साल की सजा में जेल भेज दिया।
उनकी सजा कम होने बाद राजस्थान सरकार नें शीर्ष कोर्ट में इस 10 साल की सजा को कम करार देते हुए उसके खिलाफ अपील कर दी।

साथ ही जेल में बंद 4 आरोपियों ने 10 साल की सजा को भी सुप्रीम कोर्ट चुनौती दे दी।
शीर्ष कोर्ट ने राजस्थान सरकार और चारों आरोपियों की फाइल ख़ारिज कर सजा को बरकरार रखा।

इस मामले के एक अन्य आरोपी सलीम नफीस को 19 साल बाद साल 2012 में पकड़ा गया। बाद में वह भी जमानत पर छुट गया, उसके बाद उसके बारे में कोई जानकारी नहीं है।

खास बात यह है कि तमाम रेपिस्ट्स कहां हैं और बाद में पकड़ा गया सलीम कहां है, फारूक चिश्ती की मानसिक स्थिति ठीक हुई या नहीं, इस बारे में कोई जवाब नहीं मिल रहा है। अजमेर रेप कांड़ पर लिखी गई अनुराधा मारवाह की एक किताब, जिसका नाम ‘डर्टी पिक्चर’ है, जिसको अनुराधा ने पूरे केस का अध्ययन करने के बाद​ लिखा है।

इस किताब में रियलिटी और संवेदनाओं को शामिल कर लिखा गया है। कहानी एक महात्वाकांक्षी लड़की की है, जो कुछ राजनीतिक लोगों के चक्कर में आ जाती है। उसमें आगे आगे अजमेर रेप कांड़ की तमाम कड़ियां शामिल की गई हैं।