चुनावों के समय अक्सर राजनीतिक बिसातें बिछाई जाती है। विरोधियों को धूल चटाने के लिए चालें चली जाती हैं, लेकिन राजस्थान में अब चुनावों के बाद बिसात बिछाई जा रही है और यह सिर्फ पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को साइड लाइन करने के लिए किया जा रहा है।

मोदी और शाह ने अपनी चालें चलनी शुरू कर दी हैं। मोहरे इस तरह से बिठाए जा रहे हैं कि राजे चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रही हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को साल 2018 में पार्टी अध्यक्ष चुनाव के वक्त आंखें दिखाकर गजेंद्र सिंह शेखावत को अध्यक्ष बनाने से रोकने में कामयाब रहीं पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का राजस्थान में राजनीतिक केरियर समाप्त होने की कगार पर है।

जिस तरह से मोदी—शाह की जोड़ी ने राज्य में नियुक्तियां की हैं, उससे साफ है कि वसुंधरा राजे के लिए आगे की राजनीतिक पारी खेलना बेहद कठिन है। लोकसभा चुनाव के वक्त टिकट बंटवारे से लेकर चुनाव के बाद मंत्री पदों पर सांसदों का सलेक्शन इस बात को साबित करता है कि वसुंधरा के सभी सियासी हथियार अब दम तोड़ चुके हैं।

सबसे पहले लोकसभा चुनाव के वक्त टिकट बंटवारे में वसुंधरा राजे के नहीं चाहने के बाद भी जोधपुर से गजेंद्र सिंह शेखावत, बीकानेर से अर्जुनराम मेघवाल, कोटा से ओम बिड़ला, जयपुर ग्रामीण से राज्यवर्धन राठौड़ को टिकट दे दिया गया, जबकि नागौर में वसुंधरा राजे के धुर विरोधी माने जाने वाले खींवसर विधायक हनुमान बेनीवाल के साथ गठबंधन कर उनको एक और सियासी चोट पहुंचाई।

इसके बाद जब प्रदेश की सभी 25 सीटें भाजपा जीत गई, तब मोदी और शाह ने अपनी मर्जी से गजेंद्र सिंह शेखावत को कैबिनेट मंत्री बनाया गया, बल्कि अर्जुनराम मेघवाल को दूसरी बार और कैलाश चौधरी, जो कि संघ के नजदीकी हैं को भी मंत्री बनाया गया।

इतना ही नहीं, राज्य में वसुंधरा के विरोधी माने जाने वाले कोटा सांसद ओम बिड़ला को लोकसभा अध्यक्ष बनाकर राजे पर ब्रह्मास्त्र चला दिया गया।

अब राज्य में एक और काम है जो वसुंधरा राजे को परेशान करने वाला है। शाह ने राज्य में सदस्यता अभियान का प्रभारी राजे के ही विरोधी सतीश पूनिया को बनाकर अंतिम चोट भी कर दी।

ऐसा लग रहा कि राज्य में वसुंधरा राजे को घेरने के लिए मोदी शाह ने ऐसी बिसात बिछाई है, जिससे बाहर निकलकर मर्जी से राजनीति करना राजे के लिए असंभव ही है।

उनके सबसे करीबी माने जाने वाले यूनुस खान को टोंक में हारने के बाद ठंडे बस्ते में डाल दिया है, तो अशोक परनामी को भी पार्टी ने एक तरह से बाहर का रास्ता दिखा रखा है।

पार्टी सूत्रों का मानना है कि राजे की जिद के कारण ही भाजपा राजस्थान में विधानसभा चुनाव हारी, राज्य की आवाम भाजपा का विरोधी नहीं थी, बल्कि राजे का विरोध कर रही थी। इसका सबूत विधानसभा में भाजपा की हार और केवल तीन महीनें बाद ही लोकसभा में सभी 25 सीटों पर जीत है।

माना जा रहा है कि यदि विधानसभा चुनाव से पहले भी केंद्रीय संगठन की चलती तो राज्य में फिर से भाजपा की सरकार बनती। राजे के तीखे तेवरों से परेशान होकर ही अब केंद्र ने राजस्थान पर विशेष फोकस कर रखा है।

वसुंधरा को भाजपा का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाने के लिए कोई भी जिम्मेदारी नहीं देना इस बात को पुख्ता करता है कि पूर्व मुख्यमंत्री राजे को अब सभी दायित्वों से मुक्त कर उनके पर कतर दिए गए हैं।

बताया तो यहां तक जा रहा है कि जिम्मेदारी लेने के लिए खुद वसुंधरा राजे दिल्ली और जयपुर के बीच दौड़ लगा रहीं हैं, किंतु उनको मोदी और शाह की जोड़ी मिलने का भी समय नहीं ​दे रही है।