पुत्रमोह में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे नहीं छोड़ पाईं झालरापाटन!

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जयपुर।

जैसे कि पहले ही उम्मीद थी, मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे फिर से झालरापाटन से टिकट लेने में कामयाब हुई हैं।

निवर्तमान विधायक किरोड़ी लाल मीणा के बीजेपी का दामन थामने और राज्यसभा सांसद बनने के बाद पिछले कुछ दिनों से उनके लालसोट से चुनाव लड़ने के लिए कार्यकर्ता मांग कर रहे थे।

लेकिन भाजपा सूत्रों का कहना है कि पुत्रमोह के चलते उन्होंने लगातार चौथी बार झालरापाटन चुना है।

झालावाड़ जिले से राजे के पुत्र दुष्यंत सिंह लगातार दूसरी बार सांसद हैं। उनको केंद्रीय मंत्री बनाने की खूब कोशिशें हुईं, लेकिन मोदी के द्वारा नकार दिया गया।

जिसके चलते मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे दुष्यंत सिंह को राजस्थान की राजनीति में स्थापित करना चाहती हैं।

एक तरफ मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे झालरापाटन से अपना नामांकन पत्र दाखिल कर चुकी है।

दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी ने भी बीजेपी के कद्दावर नेता रहे जसवंत सिंह के बेटे मानवेंद्र सिंह को उनके सामने टिकट देकर मुकाबला रोचक बना दिया है।

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राजस्थान सरकार में आईपीएस पंकज चौधरी की पत्नी मुकुल चौधरी पहले से ही निर्दलीय चुनाव लड़ने का ऐलान किया, लेकिन वह मानवेन्द्र सिंह का समर्थन कर चुकी हैं।

ऐसे में न केवल मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के लिए झालरापाटन का चुनाव आसान होगा, बल्कि मानवेंद्र सिंह की मुश्किलें कम होती नजर आ रही हैं।

झालरापाटन से ही आईपीएस पंकज चौधरी की पत्नी मुकुल चौधरी सीधे वसुंधरा राजे को चुनौती देकर मैदान में कूद चुकी हैं। हालांकि, उनको भी कांग्रेस के टिकट की उम्मीद थी।

ऐसा लग रहा है कि अपने पुत्र की सीट पक्की करने के लिए वसुंधरा राजे ने किसी कार्यकर्ता की नहीं सुनी और फिर से झालरापाटन विधानसभा क्षेत्र चुना है।

लालसोट के अलावा धौलपुर के एक अन्य विधानसभा सीट से भी मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को चुनाव लड़ाई जाने की चर्चाएं जोरों पर थी।

लेकिन अंततः उन्होंने अपने पुरानी सीट को ही तवज्जो दी बीते दिनों मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने कहा था कि राजस्थान में उनकी डोली आई है और यहां से अब उनकी अर्थी की जाएगी।

वसुंधरा राजे के द्वारा लगातार चौथी बार झालरापाटन से चुनाव लड़ने की बात को लेकर चुटकी लेते हुए सचिन पायलट कहते हैं कि अगर एक बार वसुंधरा राजे अपनी सीट छोड़कर दूसरी जगह से चुनाव लड़े तो उनको पता चले कि किस तरह चुनाव लड़ा जाता है और कैसे विधायक बना जाता है।

झालरापाटन विधानसभा क्षेत्र झालावाड़ जिले में आता है इसलिए जल मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे वहां से विधायक बनती है तो ऐसे में लोकसभा चुनाव के दौरान अपने बेटे दुष्यंत सिंह को न केवल अपने दम पर टिकट दिलाने के लिए पैरवी कर सकती है, बल्कि साथ ही साथ पार्टी के लिए यह सीट निकालने की गारंटी भी दे सकती हैं।

नाम नहीं बताने की शर्त पर भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश प्रभारी कहते हैं कि बीते दिनों कोर कमेटी की बैठक में भी मुख्यमंत्री की सीट बदलने की चर्चाएं हुई थी, लेकिन उन्होंने साफ इंकार कर दिया।

शुक्रवार को मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने झालरापाटन में अपना नामांकन पत्र दाखिल करने के बाद कहा कि इस जिले से उनका 30 साल पुराना रिश्ता है जो मरने के बाद ही टूटेगा उन्होंने कहा कि यहां पर मेरा विधायक और जनता का रिश्ता नहीं है, मेरा यहां पर मां बेटे, भाई बहन और बाप बेटी का रिश्ता है।

इससे पहले संभावना यह भी जताई जा रही थी, कि वसुंधरा राजे झालरापाटन के साथ लालसोट से भी चुनाव लड़ सकती हैं लेकिन उन्होंने लालसोट से राज्यसभा सांसद किरोड़ी लाल मीणा की पत्नी और निवर्तमान विधायक गोलमा देवी को टिकट दे दिया।

बता दें कि झालरापाटन के अलावा झालावाड़ जिले में खानपुर मनोहर थाना और डग विधान सभा क्षेत्र आते हैं।

इनमें खानपुर और झालरापाटन जनरल सीटें हैं, जबकि मनोहर थाना और डग रिजर्व सीट हैं। इतिहास गवाह है की झालावाड़ लोकसभा सीट से मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे अपने पीहर, यानी ग्वालियर से अधिक दूर नहीं है, जिसके चलते उनको यहां पर स्थानीय माना जाता है।

मध्य प्रदेश की सीमा से लगते झालावाड़ जिले की स्थापना आजादी के बाद हुई, लेकिन झालावाड़ रियासत की स्थापना राजपूत राजा झाला ने 18वीं शताब्दी में की थी।

झालरापाटन से विधायक मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे यहां से 2003, 2008 और 2013 में विधायक बन चुकी हैं। राजे 1989 से 2003 तक, लगातार 5 बार झालावाड़ से सांसद रही हैं।

हालांकि जाति आंकड़ों पर गौर करें तो झालरापाटन में राजपूत अधिक संख्या में नहीं है, लेकिन फिर भी वसुंधरा राजे कि राजनीतिक कद को देखते हुए उनके पक्ष में वोट होना बेहद आसान है।

यह है वोटर्स का जातीय समीकरण-

1 डांगी 32700
2 मुस्लिम 42000
3 ब्राह्मण 27000
4 नागर धाकड़ 24300
5 गुर्जर 20000 ( करीब)
6 पाटीदार 16000
7 राजपूत 14800
8 राठोर 9000
9 जैन 7000
10 वेशय 12000
11 एससी 42000
12 एसटी 65000