amer fort jaipur rajasthan
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—जिस वरिष्ठ स्मारक निरीक्षक को पूरे प्रदेश में स्मारकों पर निरीक्षण करना था, वह आमेर में बरसों जमा रहा, रिटायरमेंट के बाद भी संविदा नियुक्ति पाकर आमेर में ही ले ली पोस्टिंग।
जयपुर।
ऊपर की कमाई के लिए दशकों से बदनाम अधिकारियों के कारनामे आमेर महल से गाहे बगाहे सामने आ ही जाते हैं। यहां पर हाथियों के नियम विरुद्ध संचालन में मिलीभगत उजागर होने और अन्य मामले उजागर होते जा रहे हैं।

ताजा मिली जानकारी के अनुसार विश्व विरासत स्थल के रूप में दर्ज हो चुका आमेर महल सिर्फ चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के भरोसे चल रहा है। यहां आसानी से अन्य कर्मचारी-अधिकारी लग नहीं पाते हैं। यदि कोई यहां लग भी गया तो उसे जल्द ही यहां से चलता कर दिया जाता है ताकि ऊपरी कमाई का खेल चलता रहे।

ऊपरी कमाई का खेल
ऊपरी कमाई के इस खेल में अधीक्षक, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के साथ-साथ विभाग के वरिष्ठ स्मारक निरीक्षक का भी नाम जुड़ रहा है। जानकारी के अनुसार आमेर महल में अधीक्षक पिछले करीब छह-सात सालों से यहां जमे हैं।

वहीं विभाग का वरिष्ठ स्मारक निरीक्षक गोवर्धन शर्मा भी लंबे समय से यहीं काम कर रहा है। हैरानी वाली बात तो यह है कि रिटायरमेंट के बाद इस निरीक्षक को संविदा पर फिर इसी पद पर ले लिया गया और उसे वापस आमेर बिठा दिया गया, जबकि उनका मूल काम कुछ अलग है।

क्या है निरीक्षक का काम
पुरातत्व विभाग में वरिष्ठ स्मारका निरीक्षक का एक पद मुख्यालय पर सृजित है। वरिष्ठ स्मारक निरीक्षक का काम हर वर्ष जयपुर से बाहर 20 स्मारकों का निरीक्षक करना और स्मारक की वर्तमान स्थिति की रिपोर्ट पेश करना है। इसी के साथ उन्हें प्रतिवर्ष कम से कम 10 स्मारकों का नियंत्रण क्षेत्र घोषित कराना है।

विभाग कह रहा सात सालों से पद खाली
स्मारकों के निरीक्षण के संबंध में पुरातत्व विभाग की घोर लापरवाही भी हैरान करने वाली है। विभाग का वरिष्ठ स्मारक निरीक्षक बरसों तक आराम से आमेर में बैठा अपनी नौकरी पकाता रहा, जबकि विभाग सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई सूचना में जानकारी दे रहा है कि स्मारक निरीक्षक का पद विगत सात वर्षों से खाली पड़ा है।

इस कारण से सात वर्षों में कोई निरीक्षण नहीं किया गया है, जबकि हकीकत यह है कि स्मारक निरीक्षक और वरिष्ठ स्मारक निरीक्षक के काम में कोई खास अंतर नहीं है। यदि स्मारक निरीक्षक नहीं था तो वरिष्ठ स्मारक निरीक्षक से प्रदेशभर के स्मारकों के निरीक्षण और नियंत्रण क्षेत्र घोषित क्यों नहीं कराए गए?

अब इसी निरीक्षक को सेवानिवृत्ति के बाद संविदा पर इसी पद पर वापस लगाया है, तो फिर उससे स्मारकों का निरीक्षण कराने के बजाए आमेर में क्यों बिठाया गया है।

विभागीय सूत्र बताते हैं कि इन्हीं कुछ चुनिंदा अधिकारियों और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के निर्देशन में ऊपरी कमाई का खेल चल रहा है और उच्चाधिकारी इस लिए चुप बैठे हैं कि मासिक उगाही का हिस्सा ऊपर तक पहुंचता है।

इन कामों में करते हैं मोटी कमाई
सूत्रों के अनुसार आमेर महल में सबसे जबरदस्त फर्जीवाड़ा तो टिकटों के मामले में है। चतुर्थ श्रीणी कर्मचारी टिकट विंडो संभालते हैं और टिकट चैक करने का काम भी इन्हीं के हाथों में है।

इसके अलावा हाथी सवारी, पार्किंग ठेके, संरक्षण-मरम्म्त कार्यों, लपकों को वरदहस्त, महल में संचालित हैण्डीक्राफ्ट दुकानों, चाय-पानी स्टालों, महल क्षेत्र में चल रहे रेस्टोरेंटों को अतिरिक्त सुविधाएं प्रदान करने में मोटी कमाई की जाती है।

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