barmer murder
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क्या हो रहा है? क्यो हो रहा है यह सब?
इस क्षेत्र की घटनाएं तो रोजमर्रा की खबर बन चुकी है, लेकिन अब कुछ नया किया है युवाओं ने, ऐसा लग रहा है कि अब युवा जाग चुका है, यह मानना पड़ेगा।

पहले आत्महत्या टांके या फांसी के फंदे के द्वारा सुनी है, लेकिन आज देशी कट्टे से की है। यह सब रंगरैलियां और फोटो देखकर लगता है कि यह सब कई दिनों से चल रहा है।

यह सब उन परिवार के लोगों से मिली-जुली का था या परिवार की अनदेखी या परिवार के परवरिश और संस्कारों की कमी के चलते यह सब हुआ या विद्यालय के वातावरण में कोई कमी?

आखिर इनके प्रेम-प्रसंग के कौनसे कारण बने होंगे।
इन्हें देखकर यह लगता है कि इनकी उम्र कुछ ज्यादा नहीं रही होगी, लगभग 18—19 वर्ष के आसपास,
लेकिन इतनी उम्र इतनी बड़ी घटना को अंजाम देना और वो भी हथियार के साथ?

हथियार कहा से उपलब्ध होते है….

यह सवाल खड़ा करता है पुलिस प्रशासन और इन बच्चों के माता-पिता पर, जिनको आजीवन कारावास में डाला जाए, ताकि आगे से वे ऐसी घटना को अनदेखी ना करें।

अगर हथियार उपलब्ध आसान है तो फिर कल कोई किसी को बीच चौराहे पर खड़ा करके मार सकता है,
आज चेतने की जरूरत है।

आत्महत्या एक डरावना शब्द। एक शब्द, जो आंखों के सामने मौत का भयावह मंजर खड़ा कर देता है। कहने को इसके अर्थ मनचाही मौत से जुड़ते हैं, लेकिन सच यह है कि यह एक अनचाही और अनपेक्षित मौत की दर्दनाक स्थिति है।

एक हंसते-खेलते जीवन का त्रासद अंत। फांसी, ज़हर, आग और नदी जैसे कितने ही नए-पुराने तरीके मौत को गले लगाने के लिए आजमाएं जा रहे हैं।

एक पूरा जीवन जो इस धरा पर आने में सतरंगी सपनों से लेकर 9 माह का खूबसूरत समय लेता है, वह अचानक अपनों को रोता-बिलखता छोड़कर चल देता है। इन्हें देखकर हमें कोई ग़म नहीं है, क्योंकि ऐसे लोगों अन्त निश्चित है।

लेकिन हमें चिंता और गम इस बात का है कि आज समाज की पंचायत को इस ओर कदम बढ़ाना आवश्यक है। बढते अपराधियों और दो नंबरियों के जाल को खत्म करने की आवश्यकता है।

मैं या आप लिखकर काम खत्म कर देते हैं, लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि इस ओर कदम बढ़ाया जाए….
तभी सार्थक पहल होगी।

रावताराम पचार ईशरोल
मोहन लाल सारण
( नोट— ये लेखक के निजी विचार हैं।
)