जयपुर।

कहा जाता है कि माता-पिता बच्चे को जन्म देते हैं, लेकिन दुनिया की सभी चीजें सीखने जीवन में आगे बढ़ने और जीवन को सही तरीके से जीने के लिए जिस व्यक्ति के द्वारा सीख दी जाती है, वह गुरु होता है।

इसलिए गुरु को माता-पिता से भी ऊंचा स्थान दिया गया है। आषाढ़ पूर्णिमा के दिन गुरु पूर्णिमा मनाई जाती है।

इसके पीछे अनेक तथ्य हैं, लेकिन सबसे बड़ा तथ्य जो सनातन धर्म में लिखा है, वह यह है कि आषाढ़ पूर्णिमा के दिन जब चंद्रमा बादलों के बीच से रोशनी बिखेरता है तो उसको गुरु की रोशनी की संज्ञा दी जाती है।

जिस तरह चंद्रमा गुरु का रूप है और अपनी रोशनी 4 बादलों के बीच से हम तक रोशनी पहुंचता है, उसी प्रकार एक गुरु अपने शिष्य के जीवन में रोशनी डालता है।

गुरु पूर्णिमा के दिन लोग अपने गुरु का पूजन करते हैं। हालांकि सभी धर्मों में गुरु की महिमा है, किंतु गुरु शब्द का चलन हिंदू बौद्ध और जैन धर्म में है। इस्लाम धर्म में पीर और ईसाई धर्म में मास्टर कहा जाता है।

गुरु का महत्व सनातन धर्म में सबसे अधिक है और इसी में गुरु का ध्यान शिरोधार्य कहा गया है। गुरु व्यक्ति के माता-पिता भी हो सकते हैं, अध्ययन करवाने वाला गुरु भी हो सकता है।

गुरु बड़ा भाई भी हो सकता है, परिवार का कोई सदस्य भी हो सकता है, जो व्यक्ति के चरित्र निर्माण जीवन निर्माण और जीने की कला सिखाता है, वही गुरु होता है।

सनातन इतिहास में गुरु द्रोणाचार्य, गुरु कृपाचार्य, गुरु शंकराचार्य, गुरु वेद व्यास गुरु चाणक्य समेत अनेक ऐसे उदाहरण हैं जिन्होंने अपने शिष्य गढ़ने में इतिहास रचा है।