elephent riding in amer jaipur
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जयपुर।
पर्यटकों की जान जाए तो जाए, लेकिन पुरातत्व विभाग में बरसों से एक ही सीट पर जमे अधिकारियों की कुर्सी पक्की रहती है। ऐसा ही कुछ हुआ है आमेर महल में मार्च महीने में दो हथिनियों के बीच हुई टक्कर के मामले में।

इस हादसे के बाद पर्यटन सचिव ने मामले की जांच कराई थी, लेकिन पुरातत्व विभाग ने जांच में लीपापोती की और अपने अधिकारी को बचाते हुए सारा दोष वन विभाग के मत्थे मढ़ दिया है।

इस जांच के बाद पर्यटन विभाग पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं कि वह पर्यटकों की सुरक्षा के प्रति कितना जिम्मेदार है?

27 मार्च को आमेर महल में हाथी सवारी के दौरान हथिनी नंबर 44 एक अन्य हथिनी के साथ भिड़ गई थी।

इस घटना में होदे पर बैठे विदेशी पर्यटकों ने कूद कर जान बचाई थी और हाथी स्टैंड से लेकर महल के चौक तक पर्यटकों में हड़कंप मच गया था।

इस घटना के बाद पर्यटन विभाग की प्रमुख शासन सचिव श्रेया गुहा ने पुरातत्व विभाग से जांच रिपोर्ट मांगी थी। मामले में जांच अधिकारी पुरातत्व निदेशक मेघराज रत्नू को बनाया गया था।

पर्यटन विभाग के सूत्रों के अनुसार पुरातत्व विभाग करीब 20 दिन पहले यह रिपोर्ट पर्यटन को सौंप चुका है।

कहा जा रहा है कि पुरातत्व विभाग ने अपने अधिकारियों-कर्मचारियों को बचाने के लिए सारा दोष वन विभाग के मत्थे मढ़ दिया है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि महल में हाथियों का संचालन वन विभाग कराता है, इसलिए वन विभाग ही इस हादसे के लिए दोषी है, जबकि हकीकत यह है कि इसमें पुरातत्व अधिकारियों की मिलीभगत भी कम नहीं है।

इसीलिए घटना के बाद सबसे पहले पुरातत्व अधिकारियों पर ही मिलीभगत के आरोप लगे थे।
कहा जा रहा है कि 44 नंबर की हथिनी उग्र स्वभाव की थी।

पुरातत्व विभाग द्वारा संचालन के समय इस हथिनी का समय अलग से निर्धारित था। बाद में हाथियों का संचालन वन विभाग ने शुरू किया तो इस हथिनी को अन्य हथिनियों के साथ संचालित किया गया।

क्या उस समय पुरातत्व अधिकारियों और कर्मचारियों को इसका पता नहीं चला? उधर वन विभाग के सूत्रों का कहना है कि पुरातत्व विभाग ने जब उग्र स्वभाव वाली हथिनी को चिह्नित कर रखा था और उसका अलग से संचालन किया जा रहा था, तो इसकी जानकारी वन विभाग को क्यों नहीं दी गई?

पुरातत्व विभाग को इस हथिनी का अलग से संचालन के लिए वन विभाग को पत्र लिखना चाहिए था और पहले ही आगाह करना चाहिए था, लेकिन न जाने किस कारण से पुरातत्व अधिकारियों ने इसकी जानकारी वन विभाग को नहीं दी।

जांच से मुकर रहे अधिकारी
हाल यह है कि इतना बड़ा हादसा होने और पर्यटकों की सुरक्षा खतरे में पड़ने के बाद भी पुरातत्व अधिकारी मानने को तैयार नहीं है कि इस मामले में कोई जांच भी हुई है।

यह सब कुछ आमेर महल में बरसों से जमे अधिकारियों को बचाने की खातिर हो रहा है।

अधिकारियों की कुर्सी बचाने के लिए पर्यटकों की जान सांसत में डाली जा रही है।

किस चीज की जांच, जांच कोई थी ही नहीं। हथिनियां भिड़ी थी। आमेर महल के अधीक्षक ने इस मामले में वन विभाग को लिख कर दे दिया। वन विभाग ने इस हथिनी को रोटेशन से हटा दिया है।

मेघराज रत्नू, निदेशक पुरातत्व विभाग

आमेर महल में हाथियों का संचालन पुरातत्व विभाग और हाथी मालिकों की एसोसिएशन मिलकर करती है। हाथियों का रोटेशन और समय भी यही लोग तय करते हैं।

महल में हमारा कोई दखल नहीं है। वन विभाग तो सिर्फ हाथी गांव को संभालता है। पुरातत्व विभाग की ओर से अब 44 नंबर की हथिनी की शिकायत आई है।

शिकायत पर इस हथिनी को हमेशा के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया है।
सुदर्शन शर्मा, डीएफओ, वन विभाग

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