dogs in jaipur
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जयपुर।
स्मार्ट सिटी की ओर कदम बढ़ा रहे जयपुर में आवारा पशुओं का प्रबंधन भगवान भरोसे हो रहा है। शहर में कुत्तों के आतंक के बाद पशुधन शाखा की पड़ताल की गई तो सामने आया कि यहां मैन पावर तो है ही नहीं।

शहर में लाखों की संख्या में पशु हैं, लेकिन उन्हें पकड़ने के लिए मात्र तीन-चार बुजुर्ग कर्मचारी हैं, जो भी आने वाले दिनों में रिटायर हो जाएंगे।

ऐसे में कुछ समय बाद इस शाखा में सिर्फ आदेश देने वाले अधिकारी ही बचेंगे, आदेशों की पालना करने वाले कर्मचारी नहीं रहेंगे।

निगम सूत्रों का कहना है कि वर्ष 2009-10 तक इस शाखा में 50 से अधिक स्थायी कर्मचारियों की मौजूदगी थी, जो शहर में कुत्ते, सूअर, बंदर, बिल्ली, गाय, सांप, नेवला, चमगादड़ व अन्य जानवरों को पकड़ने का काम करते थे।

बाद में इनमें से कुछ रिटायर हो गए और कुछ को अन्य शाखाओं में लगा दिया गया और यह काम संविदा पर लगे कर्मचारियों से कराया जाने लगा। करीब डेढ़ वर्ष पूर्व निगम ने संविदा पर कर्मचारी रखना भी बंद कर दिया।

ऐसे में अब इस शाखा में कर्मचारियों का बेहद टोटा हो गया है। कर्मचारियों के नहीं होने पर यह सभी कार्य अब ठेकेदारों के माध्यम से कराया जा रहा है और ठेकेदारों का काम जगजाहिर है कि वह शहर में गायों तक को नहीं पकड़ पा रहे हैं तो फिर बंदरों और कुत्तों को कैसे पकड़ेंंगे।

सर्वे का अभाव
पशुधन शाखा में काम कर चुके पूर्व कर्मचारियों का कहना है कि उन्हें याद नहीं है कि कभी निगम ने अपने स्तर पर शहरों में रहने वाले पशुओं के व्यवहार और आदतों, आक्रामकता पर कोई सर्वे कराया हो।

केंद्र सरकार की योजना के तहत शहरों में पाए जाने वाले कुत्तों का बधियाकरण तो कर दिया जाता है, लेकिन बधियाकरण के बाद उनके व्यवहार पर कोई सर्वे नहीं कराया गया है।

देखने में आता है कि जिन कुत्तों का बधियाकरण कर दिया जाता है, वह कुत्ते बधियाकरण के बाद अन्य के बनिस्पत ज्यादा मोटे और आलसी हो जाते हैं। ऐसे कुत्ते एक झुंड में रहने लगते हैं और अक्सर एक ही स्थान पर पड़े रहते हैं।

ऐसे में जब उन्हें छेड़ा जाता है तो कुत्तों का यह पूरा झुंड एकसाथ छेड़ने वाले पर हमला कर देता है। शहर में कुत्तों के काटने की घटनाएं अचानक बढ़ी है, ऐसे में जरूरी है कि निगम अपने स्तर पर कुत्तों के व्यवहार और आक्रामकता पर सर्वे कराए और उसी के अनुसार पशु प्रबंधन के लिए अपनी आगे की रणनीति बनाए।