Jaipur

जम्मू-कश्मीर में सैनिकों और पाक समर्थित आतंकवादियों में जारी जंग के बीच राजस्थान में हजारों सैनिक न्याय के इंतजार में दर-दर की ठोकरे खा रहे हैं।

देश की सेवा करने के बाद अपने लिए न्याय पाने के लिए 10 से ज्यादा सैनिक दुनिया छोड़ चुके हैं, लेकिन उनको कहीं से राहत नहीं मिल रही है।

मामला आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल, यानी एएफटी (AFT) के द्वारा सैनिकों और उनके परिजनों को न्याय दिलाने में नाकाम साबित होने का है।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 3 अप्रैल 2019 तक न्याय के लिए भटकते हुए ही 10 पूर्व सैनिक न्याय के इंतजार में दुनिया से अलविदा हो चुके हैं।

जानकारी के अनुसार पिछले साढे 3 साल से न्यायिक और प्रशासनिक सदस्य नहीं होने के कारण लगभग 4500 मामले अटके हुए हैं।

ये सभी मामले पूर्व सैनिकों के आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल (AFT) में हैं, जो वेतन भत्तों में भेदभाव से संबंधित हैं।

बताया जा रहा है कि आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल में हर महीने करीब 90 से लेकर 100 मामले दायर होते हैं, किंतु इसमें सदस्यों की नियुक्ति नहीं होने के चलते ट्रिब्यूनल केवल सर्किट बेंच के दम पर ही चल रहा है।

गंभीर बात यह है कि सर्किट बेंच में 1 महीने में केवल 5 दिन सुनवाई होती है, जो सैनिकों से संबंधित इतने बड़े पैमाने पर केस देखते हुए बेहद कम है।

इस प्रकरण को लेकर आर्मी ट्रिब्यूनल आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल के रजिस्ट्रार विश्वनाथ केटी कहते हैं कि लंबित केसों की सुनवाई और फैसलों के लिए प्रयास लगातार किए जा रहे हैं।

अभी एएफटी में न्यायिक और प्रशासनिक पदों पर नियुक्ति नहीं होने के कारण सर्किट बेंच के समक्ष ही ज्यादा से ज्यादा केशों को सूचीबद्ध करवाया जा रहा है, इन सभी पदों पर नियुक्ति का कार्य केंद्र सरकार व विधि मंत्रालय का है।

यह हैं कुछ उदाहरण, जो दिल दहलाने वाले हैं

पहला मामला-

पूर्व सैनिकों से संबंधित केस की बात की जाए तो चैताराम ने द्वितीय विश्व युद्ध लड़ा था। उनको चोट के कारण 26 अगस्त 1944 को सेना से सेवा मुक्त कर दिया गया।

सेना ने उनको निःशक्तता पेंशन दी गई। बाद में मेडिकल बोर्ड ने उनकी निःशक्तता पेंशन कर दी और उनका मूल वेतन अटक गया।

इसके बाद 1 मई 1980 को जेताराम का निधन हो गया। उनकी पत्नी पतासी देवी ने फैमिली पेंशन मांगी, किंतु न्याय मिलने से पहले ही 2018 में 20 दिसंबर को पतासी देवी भी दुनिया को अलविदा कह गई।

दूसरा मामला-

इसी तरह से होशियार सिंह ने साल 1971 की भारत-पाकिस्तान की जंग लड़ी, जिसमें गोली लगने के कारण वह निशक्त हो गये। 12 साल बाद उनको बिना पेंशन ही सेना ने डिस्चार्ज कर दिया।

होशियार सिंह को पेंशन नहीं मिलने के कारण सितंबर 2011 में आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल में केस दायर किया गया, किंतु इससे पहले कि उनकी सुनवाई हो पाती, 19 दिसंबर 2017 में दुनिया छोड़कर चले गए।

तीसरा मामला-

ठीक इसी तरह से भारतीय सेना से रिटायर हुए शायर सिंह ने भी पेंशन का हक लेने के लिए साल 2010 में आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल में वाद दायर किया। शायर सिंह को यहां से न्याय तो नहीं मिला, लेकिन वह खुद ही दुनिया से चले गए।

चौथा मामला-

इतना ही नहीं साल 1965 के युद्ध में भाग लेने वाले भारतीय सेना के सिपाही सुल्तान राम की पेंशन का मामला लगातार 6 साल से हाई कोर्ट में चला।

वहां से भी सुल्तान राम को वर्ष 2010 में आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल में ट्रांसफर कर दिया गया। उनको न्याय की उम्मीद थी, लेकिन साल 2016 में पेंशन शुरू होने से पहले ही सुल्तान राम ने भी दुनिया छोड़ दी।