जयपुर।

हरियाणा के बरवाला कांड में सजा काट रहे कबीरपंथी सन्त रामपाल के भले ही लोग लाख विरोधी हों, लेकिन उनके बनाए हुए नियम इतने शानदार हैं कि जो भी अपनाता है उसका जीवन ही बदल जाता है।

सन्त रामपाल इन दिनों हिसार जेल में हैं, किन्तु उनके अनुयायियों के द्वारा कबीरदास की दी हुई शिक्षा को देश ही नहीं विदेश में भी प्रचारित कर रहे हैं। समाचार पत्रों और टीवी चैनलों के माध्यम से देशभर के लोगों सन्त रामपाल को लेकर लगे तमाम आरोप देखे हैं, लेकिन उनके द्वारा फैलाया गया ज्ञान दुनिया के कई लोगों की जिंदगी में रोशनी ला रहा है।

संत रामपाल के द्वारा अपने अनुयायियों को दी गई शिक्षा इतनी सरल और नियम इतने कठोर हैं कि हर आदमी उनको ने तो अपना सकता और ना ही उन पर कायम रह सकता, लेकिन जिसने भी इन नियमों की पालना की है, उसका जीवन पूरी तरह बदल गया है।

नशे से दूरी, बिना दहेज की शादी, मूर्ति पूरा से मुक्ति, जाति-धर्म की तमाम बंदिशों से दूरी, मांस, मदिरा पान, बीड़ी, सिगरेट से दूर, व्यभिचार से कोसों दूर समेत 21 नियम की जो भी आजीवन पालन करता है, उसका जीवन सफल होने की सन्त रामपाल गारंटी देते हैं। ये हैं नियम-

-पूर्ण गुरू से भक्ति लें। वेद, गीता, पुराण, कुरान, बाइबल इत्यादि शास्त्रों का ज्ञान बताने वाला ही पूर्ण गुरू बताया गया है।

-नशीली वस्तुओं का सेवन निषेध। हुक्का, शराब, बीयर, तंबाकू, बीड़ी, सिगरेट, गुटखा, मांस, अंडा, सुलफा, अफीम, गांजा और अन्य नशीली चीजों का सेवन तो दूर रहा, किसी को नशीली वस्तु लाकर भी नहीं देनी है।

-तीर्थ स्थल, जैसे गंगा स्नान, मक्का-मदीना की यात्रा व्यर्थ। किसी प्रकार का कोई व्रत नहीं रखना है। कोई तीर्थ यात्रा नहीं करनी, ना कोई गंगा स्नान करना, या किसी अन्य धार्मिक स्थल पर स्नान आर्थिक व दर्शनार्थ जाना। किसी मंदिर में धाम में पूजा, भक्ति के भाव से नहीं जाना। इस मंदिर में भगवान है, इस तरह के भाव से न जाना।

-पितृ पूजा निषेध। किसी प्रकार की पितर पूजा, श्राद्ध निकालना आदि कुछ नहीं करना। भगवान श्री कृष्ण ने भी इन पितरों की, भूतों की पूजा करने से साफ मना किया है। गीता के अध्याय नंबर 9 के श्लोक नंबर 25 में कहा गया है।

-गुरू आज्ञा का पालन करना। गुरु की आज्ञा के बिना घर में किसी भी प्रकार का धार्मिक अनुष्ठान नहीं करवाना चाहिए। दोहा:- कबीर गुरु बिन माला फेरते, गुरु बिन देते दान, गुरु बिन दोनों निष्फल है, पूछो वेद पुराण।

-माता मसानी (समाधि) पूजा निषेध। खेत में बनी मंडी, किसी खेड़ी आदि की या किसी अन्य देवता की समाधि नहीं पूजनी चाहिए। समाधि चाहे किसी की भी हो, बिल्कुल नहीं पूछनी चाहिए। यहां तक कि तीनों गुणों (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) की पूजा भी नहीं करनी चाहिए। केवल गुरुजी के बताए अनुसार ही करना चाहिए।

-संकट मोचन एक ही हैं। कर्म का कष्ट (संकट) होने पर कोई अन्य इष्ट देवता की या माता मसानी आदि की पूजा कभी नहीं करनी चाहिए। ना किसी प्रकार की बुझा पड़वानी चाहिए।

-अनावश्यक दान नहीं करना चाहिए। किसी भी व्यक्ति को अनावश्यक दान नहीं देना चाहिए। ऐसे जरूरतमंद व्यक्ति को खाना खिला दो, चाय, दूध, लस्सी, पानी आदि पिला दें। भिक्षा में किसी को पैसे नहीं देने चाहिए।

-झूठा खाना निषेध है। ऐसे व्यक्ति का झूठा खाना नहीं खाना चाहिए जो शराब, मांस, तंबाकू, अंडा, बीयर, अफीम, गांजा आदि का सेवन करता हो।

-सत्यलोक गमन के बाद क्रिया कर्म निषेध। परिवार में किसी की मौत होने चिता में अग्नि कोई भी दे सकता है। घर का या अन्य कोई भी व्यक्ति अग्नि प्रज्वलित करते समय मंगलाचरण बोल दें। उसके फूल आदि कुछ नहीं उठाने चाहिए। उस स्थान को साफ करना अनिवार्य है, अन्य कोई भी क्रिया कर्म निषेध है।

-बच्चों के जन्म पर शास्त्र विरुद्ध पूजा निषेध। बच्चे के जन्म पर कोई छठी आदि नहीं मनानी चाहिए। सूतक के कारण प्रतिदिन की तरह करने वाली पूजा, भक्ति, आरती, ज्योति जगाना आदि बंद नहीं करनी चाहिए।

-देई धाम पर बाल उतरवाना निषेध। बच्चे के किसी देई धाम पर बाल उतरवाने नहीं जाना है जब बाल बड़े हो गए कटवा कर फेंक दो।

-नाम जाप सुख। नाम उपदेश को केवल दुख निवारण की दृष्टि कौन से नहीं लेना चाहिए, बल्कि आत्म कल्याण के लिए लेना चाहिए। फिर सुमिरन से सर्व सुख अपने आप आ जाते हैं।

-व्यभिचार निषेध। पराई स्त्री को मां, बेटी, बहन की दृष्टि से देखना चाहिए। व्यभिचार महापाप है।

-निंदा सुनना और करना निषेध। अपने गुरु के निंदा भूल कर भी नहीं करनी चाहिए, न ही सुननी चाहिए। सुनने से अभिप्राय यह है कि कोई आपकी गुरुजी के बारे में मिथ्या बातें करें तो उनसे लड़ना नहीं है। बल्कि यह समझाना चाहिए कि यह बिना विचारे बोल रहा है, अर्थात झूठ कह रहा है।

-गुरू दर्श की महिमा। सत्संग में समय मिलते ही जाना चाहिए। कोशिश करनी चाहिए कि सत्संग में जाते वक्त किसी तरह का कोई भी नखरा नहीं दिखाएं, बल्कि सत्संग में ठीक उसी तरह जाना चाहिए जैसे एक बीमार व्यक्ति कितने भी पैसे वाला और कितने अभी उच्च पद पर बैठा हुआ हो, लेकिन डॉक्टर के पास जाते वक्त केवल रोग मुक्त होने की सोच रखता है।

-गुरू महिमा। जब भी किसी गुरु के पास जाएं याद सत्संग में जाए तो सबसे पहले अपने गुरु को दंडवत प्रणाम करना चाहिए। उसके बाद वहां रखी गई तस्वीरें और ग्रंथ को लंबवत होकर प्रणाम करना चाहिए।

-मांस भक्षण निषेध। अंडे, मांस भक्षण व जीव हिंसा नहीं करनी चाहिए। यह महापाप होता है।

-गुरू द्रोही का सम्पर्क निषेध। यदि कोई भक्त गुरू से द्रव करता है तो वह महा पाप का भागी हो जाता है। यदि किसी को मार्ग अच्छा न लगे तो अपना गुरु बदल सकता है। यदि वह पूर्व गुरु के साथ बैर वे निंदा करता है तो वह गुरु द्रोही कहलाता है। ऐसे व्यक्ति से भक्ति चर्चा करने में उपदेशी को दोष लगता है, उसकी भक्ति समाप्त हो जाती है।

-जुआ खेलना निषेध। किसी भी शिष्य को जुआ, ताश इत्यादि खेल कभी नहीं खेलने चाहिए।

-नाच गाना निषेध है। किसी भी प्रकार के खुशी के अवसर पर नाचना, अश्लील गाने गाना भक्ति भाव के विरुद्ध है।

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