-हनुमान बेनीवाल के सामने अब क्या चुनौतियां हैं ?

मुख्यधारा के मीडिया का एक ख़ास तरह का चेहरा है, जिसे हमें पहचानना चाहिए। राजस्थान में मीडिया के फोकस में अब तक बीजेपी और वसुंधरा थे और अब सरकार बदलते ही कांग्रेस और गहलोत-पायलट फोकस में हैं।

यह मीडिया का मनुवादी, जातिवादी चेहरा है,जो सिर्फ़ बीजेपी-कांग्रेस को पसंद करता है लेकिन बीजेपी-कांग्रेस के बाहर के नायक-नायिकाओं को पसंद नहीं करता। देश भर का यहीं हाल है, राजस्थान भी अपवाद नहीं है।

खै़र, हम बात कर रहे हैं, राजस्थान विधानसभा चुनाव से ठीक एक महीने पहले अपनी राजनीतिक पार्टी- राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी बनाने वाले हनुमान बेनीवाल की।

हनुमान बेनीवाल पिछले एक दशक से अपने विद्रोही तेवरों, जनसंघर्षों और ज़िद्द के कारण राजस्थान की राजनीति में एक किवदंती बने हुए हैं।

उनपर हमेशा कम लिखा गया, कम बोला गया और मुख्यधारा की मीडिया ने उनके किरदार को हमेशा एक जाति तक सीमित करने का षड़यंत्र किया।

लेकिन हनुमान बेनीवाल की रालोपा ने 2018 के विधानसभा चुनाव में तीन सीटें जीत ली, उनकी पार्टी ने 57 सीटों पर चुनाव लड़ा था।

उनकी पार्टी के चार प्रत्याशी ऐसे रहें जिन्होंने 50000 से ज्यादा वोट हासिल किए, 14 प्रत्याशी ऐसे रहे जिनका वोट शेयर प्रति सीट 25000 से ज्यादा रहा।

रालोपा ने कुल वोटों का पहली ही बार में 2.4 फिसदी हिस्सा, यानी 8 लाख 32 हजार 852 वोट हासिल किए।

कुल मिलाकर हनुमान बेनीवाल राजस्थान में बहुत कम समय में बीजेपी-कांग्रेस के बाहर स्वतंत्र रूप से एक मजबूत ताकत बनकर उभरे हैं।

मीडिया या कुछ ख़ास समुदाय के लोग उन्हें एक जाति विशेष के नेता के तौर पर पेश करने का षड़यंत्र करते रहें, लेकिन इस बात का लोहा सबने माना कि जब हनुमान बेनीवाल ने अपने दल से टिकटों का बंटवारा किया तो सबसे ज्यादा टिकटें अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को दी।

बावरी, रैबारी और देवासी जेैसे हाशिए के समुदायों को भी उन्होंने टिकटें दी। उन्होंने सामान्य सीटों पर उदाराम मेघवाल जैसे संघर्षशील लोगों को मैदान में उतारा और चुनाव के वक्त उन्हें जितवाने के लिए पूरी मेहनत की।

पूरे मारवाड़ में उन्होंने बीजेपी-कांग्रेस की राजनीति को गड़बड़ा दिया है, अब वे मारवाड़ में एक बड़ी ताकत हैं। उनके पास अपना वोट बैंक हैं, लोग उन्हें एक जाति का नेता नहीं बल्कि सब समुदायों का नेता मानते हैं।

रालोपा को मिली तीन सीटों में से दो सीट मेड़ता और भोपालगढ़ की रिजर्व सीट हैं, दलितों-मेघवालों और समाज के कमजोर समुदाय ने हनुमान बेनीवाल पर भरोसा जताया है।

किसानों और नौज़वानों में हनुमान बेनीवाल की जो धाकड़ अपील हैं, उससे सब वाक़ीफ हैं, हनुमान बेनीवाल ने यह सब ऐसे ही नहीं बल्कि पिछले बीस साल के सार्वजनिक जीवन में की गई बेशुमार मेहनत से कमाया है।

हनुमान बेनीवाल की उपलब्धियों की बात करने के बाद सवाल उठता है कि हनुमान बेनीवाल के सामने चुनौतियां का है?

-हनुमान बेनीवाल के सामने विचारधारा, विजन, संगठन निर्माण और टीम की चुनौती है। किसी भी राजनैतिक दल की अपनी एक विचारधारा होती है, जिसके बलबूते वह दुनिया को या लोगों को यह बताता है कि यह हमारी विचारधारा है और हम इसलिए बीजेपी-कांग्रेस से अलग हैं।

अब तक हनुमान बेनीवाल और उनकी टीम उस विचारधारा का निर्माण नहीं कर पाए हैं, जिससे की जनता में साफ-साफ संदेश जाए की रालोपा की विचारधारा क्या है ? सभी राजनैतिक दल इतिहास से प्ररेणा लेते हैं और अपने पोस्टरों और नारों में महापुरूषों को जगह देते हैं और लोगों को बताते हैं कि हम इन महापुरूषों के सपनों का देश और समाज बनाना चाहते हैं।

-लेकिन हनुमान बेनीवाल की पार्टी रालोपा के पोस्टरों पर अब तक इतिहास के महापुरूष गायब हैं, जिन पर की वह चलना चाहती हैं ?

-कुल मिलाकर रालोपा की विचारधारा अब तक साफ़ नहीं है, ऐसी परिस्तिथियों में जनता में कन्फयूजन और दुविधा बढ़ती है और वे मन बनाते हैं, लेकिन अंत में कहीं और सेट हो जाते हैं।

-हनुमान बेनीवाल के पास विजन की कमी है, वे जीवन में क्या करना चाहते हैं, राजनीति में वे अपने आप को कहां देखते हैं और उनका रोडमैप क्या है ?

-वे अपने समर्थकों तक अपना विजन नहीं पहुंचा पा रहे हैं, जिससे की जनता और समर्थक भविष्य को देख कर उनसे जुड़ें।

-रालोपा संगठन निर्माण के मामले में अभी एकदम जीरो है, यह वक्त की कमी की वजह से भी हो सकता है, लेकिन सिर्फ़ जयपुर से और कुछ चंद लोगों के भरोसे कोई राजनैतिक दल नहीं चलता।

-राज्य से लेकर गांव स्तर तक हर राजनैतिक दल का संगठन ही उसे कामयाब बनता है, रालोपा को सब काम छोड़कर तुरंत प्रभाव से संगठन निर्माण का काम करना चाहिए, जिससे की लोकसभा, पंचायत और नगरपालिका चुनावों की तैयारी अभी से की जा सकें,

-हनुमान बेनीवाल की कोर टीम अभी बेहद छोटी और उसमें विविधता की कमी है। बेनीवाल को अपनी कोट टीम को बड़ा करना चाहिए।

-भरोसेमंद लोगों को अपने साथ लेकर लोकतांत्रिक तरीके से पार्टी का हर फैसला करना चाहिए, जिससे की नीचे तक यह संदेश जाए की रालोपा सच में लोकतांत्रिक पार्टी है।

-रालोपा की कोर टीम में समाज के सभी तबकों से लोगों को जगह मिलनी चाहिए। बुजुर्गों के अनुभव और युवाओं के जोश का संतुलन होना चाहिए। प्रदेश भर के नए टैलेंट को कोर टीम में शामिल करके उन्हें नई जिम्मेदारीयां देनी चाहिए।

-बेनीवाल को बीजेपी-कांग्रेस के बाहर के राजनैतिक दलों को एकजुट करने का काम तुरंत प्रभाव से करना चाहिए क्योंकि जब देश में बीजेपी और कांग्रेस जैसी पार्टियां बिना गठबंधन के नहीं चल सकती।

-तो फिर रालोपा को भी राजस्थान में समान विचारधारा वाले लोगों को एकजुट करना चाहिए, जिससे कि बीजेपी-कांग्रेस के बाहर के वोट बैंक को एकजुट किया जा सकें और सत्ता तक पहुंचा जा सकें।

-जितेंद्र महला

(नोट-यह लेखक के निजी विचार हैं)

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