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जयपुर।

राजस्थान में विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ ही सियासत के नुमाइंदे पौने पांच करोड़ मतदाताओं को रिझाने के लिए अपनी हकिकत के अनुरूप इधर—उधर फुदकना शुरू कर चुके हैं। कोई नया दल बना रहा है, कोई घर वापसी कर रहा है, कोई जातिवाद को भुनाने की कोशिश में है, कोई अपना कद दिखाकर आकर्षित कर रहा है।

जातिवाद, क्षेत्रवाद, आरक्षण, वर्ग विभेद, किसान और बेरोजगार युवाओं के सहारे डेढ साल के दौरान राजस्थान में कई बार उठापटक हो चुकी है। इस उठापटक का चरम इन दिनों चल रहा है।

वर्तमान सरकार के कार्यकाल में सबसे पहले इसकी शुरुआत हनुमान बेनीवाल ने की थी। बेनीवाल वैसे तो पांच साल से सरकार और कांग्रेस पार्टी, दोनों के खिलाफ रहे हैं, लेकिन दो साल में उनके द्वारा चार ऐतिहासिक रैलियों ने दिखा दिया है कि वो अब राजस्थान की राजनीति में बड़ा चेहरा बन चुके हैं।

तिवाड़ी, किरोड़ी, बेनीवाल, मानवेंद्र, रामपाल जाट की सियासी फुदक का प्रदेश चुनाव पर यह होगा असर— 1

युवाओं को रोजगार, किसानों की बिजली माफी, अन्नदाता को कर्जमाफी समेत अनेक समस्याएं और गांव—गरीब की राजनीति कर बेनीवाल कम से कम पश्चिमी राजस्थान समेत एक तिहाई प्रदेश में युवा और किसान वर्ग के बीच लोकप्रियता हो चुके हैं।

इसी का नतीजा है कि नागौर, जोधपुर, बाड़मेर और सीकर से रैली का जो सिलसिला शुरू हुआ था, वह अब 29 अक्टूबर को जयपुर में उनकी नई राजनीतिक पार्टी के उदय के साथ समाप्त होने की कगार पर है। इससे पहले बेनीवाल 2006 तक बीजेपी का ही अंग थे।

उनके साथ ही सरकार के लिए विधानसभा में आलोचक रहकर हमेशा परेशानी का कारण बनने वाले सांगानेर से बीजेपी विधायक ने तब भाजपा के लिए बड़ी समस्या खड़ी कर दी, जब उन्होंने अपनी पार्टी छोड़कर नए सियासी दल का गठन कर लिया।

हालांकि, इसकी शुरुआत उन्होंने दीन दयाल वाहिनी नामक संगठन को फिर से जिंदा करने के साथ ही कर दी थी। सरकार के साथ पूरे पांच साल पटरी नहीं बैठने के बाद आखिर उन्होंने अपनी सियासी जननी को हमेशा—हमेशा के लिए अलविदा कह दिया।

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उसके बाद से ही तिवाड़ी लगातार राजस्थान में दौरे कर अपनी पार्टी का प्रचार कर रहे हैं। वो सरकार के खिलाफ आलोचना का झंड़ा खड़ा करने का हर संभव प्रयास करते रहे हैं।

फिलहाल तिवाड़ी और उनकी पार्टी, भारत वाहिनी को जमीनी स्तर पर अधिक सफलता मिलती नजर नहीं आ रही है। जो कार्यकर्ता उनके साथ हैं, वो या तो ब्राह्मण समाज, भाजपा, या कांग्रेस से नाराज होकर नया विकल्प ढूंढ़ने वाले लोग हैं।

किरोडीलाल मीणा 2003 से 2008 वाली वसुंधरा राजे सरकार में ही कैबिनेट मंत्री हुआ करते थे। गुर्जर आरक्षण के दौरान सीएम राजे से पटरी नहीं बैठने के बाद साल 2009 में किरोड़ीलाल मीणा बीजेपी से अलग हो गए थे।

9 साल बाद फिर से भाजपा में लौटे मीणा यूं तो राज्यसभा सांसद हैं, लेकिन पूर्वी राजस्थान और खासकर मीणा समाज के आज भी सर्वमान्य तौर पर सबसे बड़े लीडर माने जाते हैं।

पार्टी को किरोडी से कितना फायदा मिलेगा, यह तो समय ही बताएगा, लेकिन फिलहाल कांग्रेस पार्टी इसलिए राहत की सांस ले रही है, क्योंकि उनके कारण कांग्रेस को 2013 में बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी।

एक दिन पहले ही आरक्षण को लेकर अपना बयान देने के कारण यकायक सुर्खियों में आए मीणा ने इस बात के संकेत दे दिए हैं कि उनकी राजस्थान में न तो पकड़ कमजोर हुई है, न ही दूर जाने वाले हैं।

अपने पिता और पूर्व केंद्रीय मंत्री जसवंत सिंह को बीजेपी द्वारा लोकसभा का टिकट नहीं देकर साइड लाइन करने के बाद भाजपा से बगावत करने वाले शिव विधायक मानवेंद्र सिंह एक दिन पहले ही कांग्रेस का हाथ थामे हैं।

बाड़मेर समेत राजपूत समुदाय में उनकी पकड़ बताई जा रही है। बाड़मेर में ही नहीं पश्चिमी राजस्थान में उनके पिता जसवंत सिंह बड़े नेता रहे हैं। कभी केंद्र सरकार में दो नंबर की पॉजिशन रखने वाले सिंह फिलहाल कौमा में हैं।

उनके स्वाभिमान को चौट पहुंचाने की बात करते हुए बीते दिनों मानवेंद्र सिंह बाड़मेर में बड़ी रैली कर चुके हैं। आने वाले कुछ दिनों में बाड़मेर में ही कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ धन्यवाद रैली करने वाले मानवेंद्र सिंह हमेशा शांत स्वभाव के माने जाते हैं।

कई मुद्दों को लेकर बीजेपी से कथित तौर पर नाराजगी के चलते राजपूत समुदाय के मानवेंद्र सिंह के साथ कांग्रेस में जाने के चर्चे तो खूब हैं, लेकिन सियासी लोग याद भी दिला रहे हैं कि 2014 के लोकसभा चुनाव में उनके पिता बाड़मेर से हार चुके हैं।

रामपाल जाट किसान नेता के तौर पर अपनी पहचान बनाने में कामयाब हुए हैं। उनके द्वारा एक दिन पहले आम आदमी पार्टी का दामन थामना दिल्ली मीडिया तक सुर्खियां बटोरने में कामयाब रहा है।

कभी वसुंधरा राजे के करीबी माने जाने वाले जाट गुर्जर आंदोलन के दौरान बड़ी भूमिका निभा चुके हैं। किसान वर्ग में उनका नाम भी है, लेकिन जन नेता के तौर पर उनकी पहचान नहीं बन पाई है।

देखना यह भी दिलचस्प होगा कि आप के साथ जाट की पटरी कैसी रहती है, क्योंकि अन्य पार्टियों की तरह ही आम आदमी पार्टी पर भी कथनी—करनी में अंतर के आरोप लगते रहे हैं।

इससे नुकसान किसको होगा, फायदा कौन उठाएगा?

तिवाड़ी का जाना, बेनीवाल का दोनों पार्टियों से दूरी बनाना, मीणा की घर वापसी, मानवेंद्र का कांग्रेस में घर बनाना और जाट का आप की झाडू से नाता जोड़ना नए राजनीतिक समीकरण जरूर हैं, लेकिन इससे फायदा किसको होगा?

तिवाड़ी के पास खुद का कोई वोट बैंक नहीं है। कुछ मात्रा में ब्राह्मण समाज के वोटों के अलावा, सरकार के कार्यों की आलोचना के कारण लोगों का सहयोग और नई पार्टी से उम्मीदें पाले लोग उनको समर्थन करेंगे।

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ब्राह्मणों को बीजेपी का वोट माना जाता है, जबकि एंटी इंकंबेंसी के चलते मिलने वाला फायदा उनको मिल सकता है, मगर इससे कांग्रेस को वोट जरूर कटेगा।

बेनीवाल किसान वर्ग और युवा वर्ग में बड़ा चेहरा बन चुके हैं। सरकार की आलोचना करना ही बेनीवाल का वोट पॉवर है। जाट समाज में लीडरशिप की कमी का भी फायदा बेनीवाल उठाने में कामयाब रहे हैं।

फिछले कुछ समय से उनके द्वारा मेघवाल, मीणा, मुसलमान और किसान वर्ग की बात करना रैलियों में भीड़ के रुप में दिखने लगा है। फिर भी उनको मिलने वाला वोट काफी हद तक कांग्रेस के खाते से ही जाएगा।

किरोडीलाल मीणा के साथ मीणा वोटर्स का जाना बताया जाता है, लेकिन मीणा समाज में भी उनके प्रति नाराजगी बताई जा रही है। हालांकि, किरोडीलाल मीणा से कांग्रेस को फायदा भी हो सकता है, और नुकसान भी।

मानवेंद्र सिंह के साथ निश्चित तौर पर बड़े पैमाने पर राजपूत समुदाय बीजेपी से छिटकेगा। इसके साथ ही सिंधी—मुसलमान भी बाड़मेर में उनके साथ हैं। लेकिन राजपूत नेता के तौर पर उनको प्रोजेक्ट करना जाट समाज को नाराज कर रहा है।

ऐसे में राजपूत समाज का जितना वोट मानवेंद्र सिंह के साथ कांग्रेस को जा रहा है, उससे ज्यादा कांग्रेस पार्टी से पश्चिमी राजस्थान में जाट मतदाता बीजेपी या बेनीवाल की तरफ मुड सकता है।

रामपाल जाट से आप को फायदा किसानों के रुप में हो सकता है, उनको जाट नेता के तौर अभी कोई पहचान नहीं मिली है। ऐसे में कहा जा सकता है कि पक्के तौर पर जाट कांग्रेस के लिए वोट काटने वाले साबित होंगे।

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