hanuman beniwal jyoti mirdha nagaur
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दिनेश कड़वा@नागौर।
लोकसभा चुनाव 2019 को लेकर चुनाव प्रचार का पहला चरण आज 91 सीटों पर मतदान के रुप में चल रहा है। इधर, सियासी दलों ने अपने घोड़े मैदान में छोड़ रखे हैं, जो अपने अपने दम पर प्रचार में जुटे हुए हैं।

राजस्थान के नागौर लोकसभा क्षेत्र में इस बार कांग्रेस की तरफ से पूर्व सांसद और पिछला चुनाव हारी हुईं डॉ. ज्योति मिर्धा चुनावी मैदान में हैं, तो बीजेपी ने यह सीट गठबंधन के तहत आरएलपी के लिए छोड़ी है। जिसपर बीजेपी-आरएलपी, यानी एनडीए के प्रत्याशी के रूप में हनुमान बेनीवाल मैदान में हैं।
https://youtu.be/uZElJ2SK8x0

गणितीय रूप से पिछले चुनाव का विश्लेषण किया जाए तो बीजेपी के विजेता वर्तमान सांसद सीआर चौधरी को 4 लाख, 15 हजार के करीब वोट मिले थे। दूसरे नंबर पर रहीं ज्योति मिर्धा को 3 लाख, 39 हजार के लगभग वोट हासिल हुए।

यहां पर निर्दलीय के तौर पर चुनाव लड़ने वाले तीसरे नंबर पर रहे हनुमान बेनीवाल को 1 लाख, 59 हजार वोट मिले थे। अगर इसे गठबंधन के रूप में जोड़ा जाए तो 5.74 लाख वोटों के साथ हनुमान बेनीवाल की एकतरफा जीत नजर आ रही है।

मगर इसको बदले स्वरूप और बदले जातीय समीकरण के हिसाब से विश्लेषण करें, तो समीकरण गड़बड़ाते नजर आ रहे हैं। नागौर में बीजेपी के कोर वोटबैंक का महत्वपूर्ण हिस्सा राजपूत समुदाय है, जो हनुमान बेनीवाल की राजनीतिक शुरुआत उनकी खिलाफत करता हुआ बताया जाता रहा है।

बेनीवाल की सियासी शुरूआत में जो समीकरण थे, उनका इजहार पूर्व मंत्री के बेटे ने अपनी फेसबुक पोस्ट के माध्यम से किया है। दूसरा महत्वपूर्ण कारक सीआर चौधरी गुट और यूनुस खान गुट भी है।

बताया जाता है कि सीआर चौधरी का टिकट काटने में इस गठबंधन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पूरे 10 साल यूनुस खान की खिलाफत हनुमान बेनीवाल ने की है।

ऐसे में यह उम्मीद करना कि सीआर चौधरी और यूनुस खान अपने बीजेपी समर्थक वोटों को हनुमान बेनीवाल के पक्ष में शिफ्ट करवाएंगे, ये बात भी बेमानी सी लगती है।

यहां कुछ लोगों द्वारा यह भी कहा जा रहा है कि एससी/एसटी और माइनॉरिटी के वोट एकतरफा मोदी ब्रांड के खिलाफ जाने की पूर्ण संभावना है। लेकिन साथ ही बेनीवाल के एससी एसटी और अल्पसंख्यकों में पैठ को बड़ा फायदा एनडीए के लिए मान रहे हैं।

हनुमान बेनीवाल ने जो राजनीति बीजेपी-कांग्रेस की खिलाफत करके शुरू की थी, वो इस गठबंधन के बाद ध्वस्त होती नजर आ रही है। इस बार जो कांग्रेस समर्थक जाट हनुमान बेनीवाल के पीछे चले थे, संभवत: वो वापिस लौटते नजर आ सकते हैं।

यहां पर बहुसंख्यक—जाट समुदाय 50:50 के अनुपात में विभाजित होता नजर आ रहा है। ज्योति मिर्धा के खिलाफ वंशवाद का फैक्टर एक कारक नजर आता है, किंतु आम मतदाता के बजाय राजनीतिक चाहत रखने वाले लोगों के लिए यह महत्वपूर्ण कारक होता है।

बहरहाल, खुद ज्योति मिर्धा भी अपने दादा के नाम पर वोट मांग रही हैं। हर सभा में उनके द्वारा दादा के नाम पर वोट देने की अपील की जा रही है, मतलब साफ है कि उनके पास खुद के कार्यकाल की कोई उपलब्धि नहीं है, जो गिना सकें।

नागौर में 8 विधानसभा में से 5 पर कांग्रेस, 2 पर भाजपा और एक पर आरएलपी खुद हनुमान बेनीवाल विधायक हैं। इन विधायकों पर भी दबाव रहेगा कि अपने क्षेत्र से अपनी पार्टी को जितवाएं।

कुल मिलाकर देखा जाए तो हनुमान बेनीवाल जीत की स्थिति में तभी आ पाएंगे, जब बीजेपी के वोट इनको पूरी तरह से शिफ्ट हो जाएं। हालांकि इस बात की संभावना कम नजर आ रही है।

मीडिया भले ही नागौर सीट को सबसे हॉट बता रहा हो, मगर नागौर के आम मतदाता खामोशी के साथ अपना रुख तय कर रहे हैं। रैलियों और जुलूसों से परे समीकरण तय हो रहे हैं, मानस तय हो रहा है, जिसका नतीजा जरूर हॉट हो सकता है।

नागौर में कुल मतदाता 24 लाख 9 हजार 237,

पुरुष मतदाता 12 लाख 53 हजार 72। महिला मतदाता 11 लाख 56 हजार 162। 18-19 वर्ष के कुल मतदाता 62 हजार 843। 40 वर्ष से कम आयु के मतदाता नागौर जिले में 12 लाख 46 हजार 681 हैं, जो एक बड़ा वोट बैंक है और यह बेनीवाल के पक्ष में नजर आ रहा है।

नागौर लोकसभा क्षेत्र में देखा जाए तो यहां पर कुल 12 लाख 46 हजार 681 youth मतदाता हैं, जिनमें एनडीए के उम्मीदवार हनुमान बेनीवाल और कांग्रेस की ज्योति मिर्धा के साथ ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भी बड़ी मात्रा में फैन हैं।

इस दौरान यदि युवा मतदाताओं ने देशहित को तवज्जो दी तो उमीदवार के तौर पर मोदी को इनका वोट जा सकता है। खैर! सबकुछ अभी भविष्य के गर्भ में छिपा हुआ है, और नागौर लोकसभा सीट पूरे राजस्थान में जोधपुर से भी ज्यादा चर्चित बन गई है।

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