नई दिल्ली।
भारत में राजनीति कुछ भी करवा सकती है। दुश्मन को दोस्त और दोस्त को दुश्मन बना सकती है। स्थाई दोस्त को स्थाई दुश्मन और स्थाई दुश्मन को दोस्त बनते इसी राजनीति में देखा जा सकता है।

साल 1995 के दौरान, जब सपा और बसपा का गठबंधन टूटा तो उसके साथ मर्यादाएं भी टूटीं। बसपा की सुप्रीमो मायावती को सपा के कथित गुंड़ों ने नौच ड़ाला। कहानी इतनी भयावह थी कि बताने वालों के भी रौंगटे खड़े हो गए।

इससे पहले 1994 में सपा और बसपा ने मिलकर राज्य में सरकार बनाई थी। दोनों के बीच ढाई ढाई साल तक सीएम रखने की सहमति बनी थी, लेकिन एक साल बाद ही मायावती ने दोखा देकर सरकार से अलग हो गईं।

इससे समाजवादी पार्टी के समर्थकों ने गेस्ट हाउस में जो गुंडई की, वह करीब तीन दशक बाद भी बसपा की सुप्रीमो मायावती भूल नहीं पाईं। हाल ही में गठबंधन का ऐलान करने के ​मौके पर भी मायावती ने उसका जिक्र कर अपने घाव दिखाने का प्रयास किया।

बहरहाल, आज मैनपुरी में धुर विरोधी मायावती और मुलायम सिंह यादव 25 साल बाद मंच साझा कर रहे हैं। बसपा और सपा ने दावा किया है कि इस रैली में लाखों लोग एकत्रित होंगे। लेकिन इतनी संख्या के लिए मैदान है ही नहीं।

फिलहाल लोगों के लिए कोतुहल की बात यह है कि जब मायावती और मुलायम सिंह एक मंच पर होंगे तो दोनों की नजरें कैसी रहेंगी? प्रचार होगा, या गेस्ट हाउस कांड़ की भी चर्चा होगी?