Narendra Modi varansi
Narendra Modi varansi

आज हमारे भारत को स्वतंत्र हुए 72 वर्ष से ज्यादा का समय हो गया। भारत पुरातनकालीन विश्व में सर्वमान्य गुरु के रूप में पहचाना जाता था। उसने 200 वर्ष के की गुलामी के पश्चात जब एक बार पुनः 1947 में अपने वजूद को प्राप्त किया, तब तत्कालीन नीति निर्धारकों और प्रशासकों का यह दायित्व बनता था कि वे निजी हितों की वरीयताकरण छोड़कर राष्ट्र सर्वोपरि की अवधारणा को महत्व देते।

सही मायने में राष्ट्र के लिए आहुति देने वालों और पथ प्रदर्शकों के वैचारिक मार्ग को आगे बढ़ाते, लेकिन हुआ इसके विपरीत, निजी हित परिवारवाद और अहम तथा स्वार्थ ने राष्ट्रवाद को केवल भाषण का हिस्सा बना दिया तथा उसके विकास का मार्ग अवरुद्ध कर अपनी स्वतरक्की का मार्ग प्रशस्त किया।

देश की युवा शक्ति की बात हमेशा की जाती रही और युवा को केवल उपभोग का संसाधन मानकर प्रयोग किया गया। उसके वैचारिक मानसिक और आर्थिक विकास को शब्दावली से बाहर माना गया।

आज भी जब भारतीय लोकतंत्र का प्रमुख महोत्सव आम चुनाव 2019 आ रहा है, तब एक बार फिर इसी युवा शक्ति को मोहरे के रूप में प्रयोग करने का दृश्यावलोकन शुरू हो गया है।

कुछ लोग सभाओं में ताल ठोक कर कहते हैं कि हम उदारीकरण लाए और हमने युवा चेतना को जगाया, लेकिन हकीकत यह है कि उदारीकरण ने भी युवा चेतना को नींद की गोली ही दी।

निवेश और ग्रोथ के मकड़जाल में युवाओं को ऐसा उलझाया कि आज का युवा सुख-समृद्धि की प्राप्ति में सामाजिक और राजनीतिक जिम्मेदारियों से विमुख होता जा रहा है। बैंक बैलेंस, चमचमाती गाड़ी और किसी बहुमंजिली इमारत में दो कमरे का घर खरीदना ही आज के युवाओं का सपना रह गया है।

गांधी परिवार के युवा अगर एक दिन किसी दलित-पिछड़े के घर सो गए तो मीडिया में कई-कई दिनों तक चर्चा और परिचर्चा होती है। क्या कोई देखता है उन युवाओं को भी जो रोजाना सर्दी, गर्मी और बारिश के झंझावात खेतों और खलिहानों में झेलते हैं, वो बड़ी मुश्किल से मीडिया की पसंद बनते हैं।

पिछले बीस वर्षों में भारतीय समाज और राजनीति में महत्वपूर्ण बदलाव आए हैं। एक तरफ जहां दलित-पिछड़े, मजदूर और महिला आंदोलन तेज हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ स्फूर्त प्रभाव रखने वाले आर्थिक परिवर्तनों ने युवा पीढ़ी को नई चुनौतियों से रूबरू भी किया है।

भारत में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक बदलाव के संदर्भ में 1980 के दशक को एक विभाजक रेखा के रूप में देखा जा सकता है। क्योंकि इसी दशक में भारत में क्षेत्रीय राजनीति और पिछड़ी जातियों में पहली बार बड़े पैमाने पर उभार परिलक्षित हुआ, और मण्डल-आयोग ने भारतीय राजनीति को नयी पहचान दी।

लेकिन राजनीति के इस नए रंग-ढ़ंग ने युवाओं के सपनों को धूल-धूसरित ही किया। धन-बल, छल और परिवारवाद तथा निजी स्वार्थ के बढ़ते प्रभाव ने क्षेत्रीय ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी बाधा ही पैदा करी।

बड़े पैमाने पर अपराधीकरण और अवसरवाद ने स्वच्छ छवि के व्यक्तियों का मनोबल तोड़ा। शायद यह महत्वपूर्ण कारण है कि उस दौर में शिक्षित और जागरूक युवाओं में देश और समाज के लिए कुछ साकारात्मक कर गुजरने का हौसला टूटता जा रहा था।

सक्षम और समर्पित युवा उस समय भी सरकार की तरफ देखता था लेकिन अपने निजी हितों में व्यस्त शासकीय शक्तियां राष्ट्रवाद से परे नजर आती थी।

आज जब एक बार पुनः वैश्विक स्तर पर भारत के महत्व को समझा जाने लगा है, तब बरसों से सोए हुए इन परिवारवादी, अवसरवादी राजनीतिज्ञों को भी राष्ट्रवाद याद आने लगा है। चुनाव आते ही एक बार पुनः युवा को मोहरा बनाने की कवायद शुरू हो चुकी है।

भारत की उन्नति यदि चाहते हैं तो यह भी याद रखिये कि अगर बच्चे देश का भविष्य होते हैं तो युवा उस भविष्य को स्थायित्व प्रदान करने वाले ऊर्जावान स्रोत होते हैं।

गुलाम भारत की हम बात करें तो वीर सावरकर, भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, राजगुरू और सुखदेव जैसे मातृभक्तों ने मातृभूमि को आज़ाद कराने के लिए न सिर्फ त्याग और बलिदान का प्रतिमान स्थापित किया बल्कि लोकतंत्र के स्थायित्व के लिए एक वैचारिक विकल्प भी दिया।

आज के परिप्रेक्ष्य में भारतीय युवा शक्ति को एक बार पुनः अपने अंतर्मन को खंगाल कर मातृभूमि के बारे में सोचना होगा। आज विवेकानंद हर युवा में समाहित करना होगा, तभी सही मायने में भारत विश्व गुरु का अपना ताज पुनः प्राप्त कर पाएगा और इस पवित्र धरा से संबंध रखने का गौरव हर भारतीय को महसूस हो पाएगा।

युवा ही हमारे भारत का भविष्य हैं। जनसंख्या के सबसे गतिशील खंड का प्रतिनिधित्व करते हैं। युवा और उनके कार्य राष्ट्र के विकास में योगदान देते हैं। यदि हमारे देश के युवा गंभीरता से देश के विकास के लिए काम करना शुरू कर दें तो वे राष्ट्र के महत्वपूर्ण तत्व बन सकते हैं और विकास में योगदान दे सकते हैं।

अब अगर हम दृष्टिपात करें तो पाएंगे कि विगत शासकों के कार्यकाल के दौरान हमारे देश का युवा 2G स्कैम, कोल स्कैम, कॉमनवेल्थ गेम्स स्कैम ,जैसे अनेकों शब्दों से आहत होकर त्रस्त था और इन्हीं कारणों से नरेंद्र मोदी ने साधारण और कर्मशील की छवि के साथ भारत की कमान संभाली।

वर्तमान सरकार पर भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगा और वैश्विक स्तर पर भारतीय छवि को एक निखरता हुआ स्वरूप देने का प्रयास भी सकारात्मक रूप लेता नजर आया।

आज यह सबसे महत्वपूर्ण है की देश की कमान उसे सभंलायी जाए जो निजी हितों को और परिवारवाद को वरीयता ना देकर राष्ट्र हित के लिए सोचे।

अब प्रश्न यह उठता है कि राष्ट्र क्या है तो अपने अंतर्मन में झांक कर अगर हम देखेंगे तो जवाब भी मिलेगा की राष्ट्र केवल भूमि का टुकड़ा नहीं है, बल्कि सही मायने में राष्ट्र का अर्थ उस भूमि पर निवास करने वाले सभी नागरिकों का जीवन और सम्मान है।

अतः लोकसभा चुनाव जैसे महत्वपूर्ण अवसर पर भारतीय युवाओं को यह भी सोचना होगा कि हमारा कमांडर वह बने, जो निजी स्वार्थों से ऊपर हो केवल भारत माता के लिए सोचता हूं और जब हम इस बारे में पूरा आकलन स्वयमेव करेंगे तो अंतर्मन कह देगा की क्या करना है।

एक समय था जब भारतीय प्रधानमंत्री के ऑफिस पीएमओ को ऑटो पायलट मोड से संचालित माना जाता था वर्तमान में जरूर नरेंद्र मोदी पीएमओ में निश्चिंतता लेकर आए हैं।

मुझे याद है और आपको भी याद होगा कि पूर्ववर्ती सरकार के समय जब अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से मिलने वाशिंगटन डीसी रवाना हो चुके पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अनुपस्थिति में राहुल गांधी ने पत्रकारों के सामने एक अध्यादेश का मसौदा फाड़ दिया था।

आम जनता के हितार्थ अनेक प्रक्रियाओं के सरलीकरण का कार्य वर्तमान सरकार ने किया जो वाकई में सराहने योग्य है। ज़रूरी दस्तावेज़ों के स्वयं अटेस्ट करने को प्रक्रिया सरलीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।

पासपोर्ट, परिचय पत्र, लाइसेंस, राशन कार्ड के आवेदन के अलावा कई महत्वपूर्ण कामों जैसे स्कूलों और विश्वविद्यालयों में दाखिले के लिए पहले किसी राजपत्रित अधिकारी के हस्ताक्षर की ज़रूरत होती थी, यानि उसे अटेस्ट करवाना पड़ता था।

अब इसे बंद कर दिया गया है और लोग खुद अपने दस्तावेज़ों को अटेस्ट कर सकते हैं। इससे ज़िंदगी आसान हो गई है। बाकी वैश्विक स्तर पर और देश की सुरक्षा के स्तर पर अब तक रही सरकारों के कार्यों का विश्लेषण हर जिम्मेदार वोटर स्वयं निष्पक्ष होकर करेगा तब ही हमारे भारत को विश्व गुरु की पदवी पुनः प्राप्त हो सकेगी।

बस इतना ही कहकर अपनी लेखनी को विराम देना चाहूंगा, क्योंकि इस देश का हर जिम्मेदार नागरिक सतर्क है और राष्ट्रवाद का अर्थ समझता है।
‘जय मां भारती।’

लेखक
डॉ. आलोक भारद्वाज
स्वतंत्र विश्लेषक
(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

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