जयपुर।
राजस्थान विश्वविद्यालय समेत राज्य के सभी विश्वविद्यालयों और राजकीय महाविद्यालयों में 27 अगस्त को होने वाले छात्रसंघ चुनाव के लिये भले ही दोनों प्रमुख संगठनों, एबीवीपी और एनएसयूआई ने अधिकांश संस्थानों में अपने पैनल घोषित कर दिये हों, लेकिन इसपर भी इनकी दिक्कतें खत्म नहीं हुईं हैं। अभी भी संगठनों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बरकरार है, जिसके लिये इनको 25 अगस्त तक जूझना होगा।

राज्य के सबसे बड़े और सबसे पुराने विवि, राजस्थान यूनिवर्सिटी में एबीवीपी ने अध्यक्ष पद के लिये अमित कुमार बड़बड़वाल, उपाध्यक्ष पद पर दीपक कुमार वर्मा, महासचिव पद पर अरूण शर्मा और संयुक्त सचिव पर किरण मीणा को टिकट देकर प्रत्याशी बनाया है।

इधर, एनएसयूआई ने अध्यक्ष पद के लिये उत्तम चौधरी, उपाध्यक्ष के लिये प्रियंका मीणा, महासचिव के लिये महावीर गुर्जर और संयुक्त सचिव पद के लिये लक्ष्मी प्रताप सिंह को प्रत्याशी घोषित किया है।

किंतु इसके साथ ही दोनों संगठनों के सामने टिकट नहीं मिलने पर बागी होकर चुनाव मैदान में उतरने का दम ठोकने वाले उम्मीदवारों के रूप में मुंहबाहें खड़ी इस वक्त की सबसे बड़ी चुनौती से पार पाना बेहद कठिन है। बगावत ने संगठनों की नींद उड़ा चुके हैं।

एबीवीपी से बुधवार तक शौय जैमन, नितिन कुमार शर्मा बगावत पर उतरने का ऐलान कर चुके हैं। दोनों ने अध्यक्ष पर के लिये अपनी दावेदारी जताई है। इधर, एनएसयूआई से अशोक फागणा ने कोर्ट से योग्यता हासिल की है। पूजा वर्मा ने भी चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है। इसके साथ ही ओम प्रकाश पाण्डर भी मैदान में उतर सकते हैं।

इस बार अपनी राह को आसान मानकर दोनों संगठनों ने जो टिकट बांटे थे, उन पदों के उम्मीदवारों की साफ सुथरी जीत अब खटाई में पड़ती नजर आ रही है। याद दिला दें कि बीते तीन साल से दोनों ही संगठन अध्यक्ष पद के अपने—अपने उम्मीदवार नहीं जिता पाये हैं।

साल 2016 में एबीवीपी के बागी अंकित धायल ने एबीवीपी के अधिकारिक उम्मीदवार अखिलेश पारीक को हराकर जीत दर्ज की थी। उसके बाद 2017 में भी एबीवीपी के बागी पवन यादव ने एबीवीपी के प्रत्याशी संजय माचेड़ी को हराकर जीत हासिल की थी। साल 2018 में एनएसयूआई के बागी विनोद जाखड़ी ने एबीवीपी के राजपाल चौधरी को शिकस्त दी थी। एनएसयूआई के रणवीर सिंघानिया तीसरे नंबर पर रहे थे।

जबकि एबीवीपी 2013 के बाद से अब तक अध्यक्ष पद पर अपना कंडीडेट नहीं जिता पाई है। आखिरी बार एबीवीपी के अध्यक्ष पद के उम्मीदवार कानाराम जाट ने 2013 में जीत दिलाई थी।

अब यदि बागी उम्मीदवारों ने मैदान नहीं छोड़ा तो फिर से एबीवीपी और एनएसयूआई के लिये संकट का समय शुरू हो रहा है। हालांकि, हर साल अधिकांश निर्दलीय उम्मीदवार अंत समय में अपना नाम वापस ले लेते हैं, लेकिन ऐसा नहीं होने पर जीत की लालसा में दिनरात एक करने वाले संगठनों के लिये स्थितियां चिंताजनक जरूर हैं।

बहरहाल, बागियों की मान—मनोव्वल का दौर जारी है। दिनरात चुनाव प्रचार में जुटे उम्मीदवार और संगठन के पदाधिकारी अपने—अपने संगठनों से बगावत कर रहे छात्रनेताओं को मनाने का प्रयास कर रहे हैं। एनएसयूआई ने कहा है कि बगावत करने के बाद ऐसे उम्मीदवार के लिये संगठन हमेशा अपने द्वारा बंद कर देगा।