अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण जल्द होना चाहिए, फिर वह चाहे जैसे बने – मोहन भागवत

17
nationaldunia
- नेशनल दुनिया पर विज्ञापन देने के लिए संपर्क करें 9828999333-
dr. rajvendra chaudhary jaipur-hospital

नई दिल्ली।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण जल्द होना चाहिए, फिर वह चाहे जैसे बने। इस पर न तो राजनीति और न ही देरी होनी चाहिए। अगर यह आपसी सहमति और शांतिपूर्ण तरीके से होगा तो हिंदुओं और मुसलमानों के बीच हमेशा के लिए विवाद भी खत्म हो जाएगा।

भागवत ने कहा कि संघ प्रमुख होने के नाते मैं कह सकता हूं कि राम बहुसंख्यक हिंदुओं के भगवान हैं। लेकिन कई लोग उन्हें भगवान न मानकर पितृपुरुष मानते हैं। राम मंदिर देश की एकता और अखंडता को बढ़ाएगा।

भागवत दिल्ली में हुए आरएसएस के तीन दिन के व्याख्यानमाला कार्यक्रम ‘भारत का भविष्य’ के समापन अवसर पर बोल रहे थे।

गोरक्षा
गाय को परिवार का हिस्सा बनाया जाए: संघ प्रमुख
संघ प्रमुख ने कहा कि गोरक्षा तो होनी चाहिए। संविधान का भी मार्गदर्शक तत्व है तो उसका पालन भी करना चाहिए। लेकिन गोरक्षा केवल कानून से नहीं होती।

क लोग इस मुद्दे पर काम कर रहे हैं कि कैसे गाय को तकनीक का इस्तेमाल करते हुए रोजमर्रा की जिंदगी और हर परिवार का हिस्सा बनाया जाए। ऐसा विचार रखने वाले लोग गो-संरक्षण और समाज की बेहतरी की बात करते हैं। ऐसे लोग मॉब लिंचिंग में शामिल नहीं हैं।

उन्होंने ये भी कहा कि गोरक्षा समेत किसी भी मुद्दे पर कानून हाथ में लेना गलत और अपराध है। ऐसे लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।
भागवत ने कहा कि हिंदुत्व को लेकर विरोध नहीं बढ़ रहा, बल्कि दुनियाभर में इसकी स्वीकार्यता बढ़ रही है।

मुसलमान
भागवत ने स्पष्ट किया कि अगर ये कहें कि इस देश में मुसलमान नहीं रहेंगे, तो ये हिंदुत्व नहीं होगा। उन्होंने कहा, ‘हम कहते हैं कि हमारा हिंदू राष्ट्र है। हिंदू राष्ट्र है इसका मतलब इसमें मुसलमान नहीं चाहिए, ऐसा बिल्‍कुल नहीं होता।

जिस दिन ये कहा जाएगा कि यहां मुस्लिम नहीं चाहिए, उस दिन वो हिंदुत्व नहीं रहेगा।’ उन्होंने कहा, ‘हिंदुत्व संघ का विचार है, संघ ने नही खोजा, देश में चलता आया विचार है। हिंदुत्व मूल्य समुच्चय का नाम है। विविधता में एकता।

भार एक स्वभाव का नाम है। हमारे लिए हिंदू आग्रह का विषय है। जो भारत, इंडिक, आर्य कहते हैं उनसे हमारा विरोध नहीं है। धर्म शब्द भारत की देन है।’

जाति व्यवस्था
जाति व्यवस्था के बारे में भागवत ने कहा कि यह कभी जाति व्यवस्था रही होगी, अब जाति अव्यवस्था है। सामाजिक विषमता को बढ़ाने वाली सभी बातें बाहर होनी चाहिए। यह यात्रा लंबी है, लेकिन यह करनी ही होगी। संघ में किसी से जाति नहीं पूछी जाती।

संघ में कोटा सिस्टम नहीं है। उन्होंने कहा, ‘हमें अपने जैसे को नहीं पकड़ना है, सबको पकड़ना है। सम्पूर्ण समाज का संगठन है। यात्रा लंबी है, हम उस तरफ बढ़ रहे हैं।’

आरक्षण
आरक्षण के सवाल पर जवाब देते हुए मोहन भागवत ने कहा, ‘सामाजिक विषमता को हटाकर समाज में सबको अवसर मिले।

संविधान सम्मत आरक्षण को संघ का समर्थन है। आरक्षण कब तक चलेगा, इसका निर्णय वही करेंगे। आरक्षण समस्या नहीं है। आरक्षण की राजनीति समस्या है। समाज के सभी अंगों को साथ लाने पर ही काम करना होगा।

जो ऊपर हैं, उन्हें झुकना होगा और जो नीचे हैं, उन्हें एडी ऊपर करके बढ़ना होगा। 100-150 साल तक समझौता करके समाज के सभी अंगो को साथ लाया जा सकता है तो यह महंगा सौदा नहीं है।’

जम्मू-कश्मीर
भागवत ने कहा कि ‘कश्मीर में धारा 370 और 35ए के बारे में हमारे विचार सब जानते हैं। हमारा मानना है कि ये नहीं होने चाहिए। हम इसे हटाने के पक्ष में हैं।

भटके युवाओं के लिए देश संघ के स्वयंसेवक कार्य कर रहे हैं। वहां के लोगों का सहयोग और समर्थन भी मिलता है। मैं विजयदशमी के भाषण में बोला था, कश्मीर के लोगों के साथ मेल-मिलाप बढ़ना चाहिए।’

उन्होंने कहा कि एक देश के लोग एक कानून के भीतर रहें। समान नागरिक संहिता का मतलब सिर्फ हिंदू और मुसलमान ही नहीं है। सबके विचारों को ध्यान में रखकर किसी एक विचार पर मन बनना चाहिए।

जनसंख्या
जनसंख्या के मामले पर बोलते हुए संघ प्रमुख ने कहा, ‘संघ का प्रस्ताव है कि जनसंख्या का विचार एक बोझ के रूप में है, लेकिन जनसंख्या काम करने वाले हाथ भी देती है। डेमोग्राफिक बैलेंस की बात समझनी चाहिए।

इसे ध्यान में रखकर नीति हो। अगले 50 साल को ध्यान में रखकर नीति बने। नीति को सब पर समान रूप से लागू किया जाए। संतान कितनी हो यह सिर्फ देश का नहीं बल्कि परिवार का भी विषय है।’

भाषा
भाषा के मुद्दे पर बोलते हुए भागवत ने कहा कि “संघ अंग्रेजी समेत किसी भी भाषा के विरोध में नहीं है, लेकिन उनका अपना स्थान होना चाहिए। ऐसी भाषा किसी भारतीय भाषा का स्थान नहीं ले सकती।” भागवत ने कहा, ‘अंग्रेजी के प्रभुत्व की बात हमारे मन में है। हमें अपनी मातृभाषाओं को सम्मान देना शुरू करना होगा।

किसी भाषा से शत्रुता की जरूरत नहीं। अंग्रेजी हटाओ नहीं, अंग्रेजी का हव्वा हटाओ। जितना स्वभाषा में काम करेंगे उतनी बात बनेगी। देश की उन्नति के नाते हमारी भाषा में शिक्षा हो। किसी एक भारतीय भाषा को सीखें, यह मन बनाना पड़ेगा।’

उन्होंने कहा, ‘हिंदी प्रांतों के लोगों को भी चाहिए कि दूसरे प्रांतों की भाषा को सीखना चाहिए। संस्कृत के विद्यालय घट रहे हैं, क्योंकि महत्व घट रहा है। अपनी विरासत को समझने के लिए संस्कृत भाषा को महत्व देना जरूरी है। भारत की सभी भाषाएं मेरी हैं, यह भाव होनी चाहिए।’

अंतरजाती विवाह
आरएसएस प्रमुख ने यह भी कहा कि संघ अंतरजातीय विवाह के खिलाफ नहीं है। यह मुद्दा सीधे तौर पर एक महिला और एक पुरुष के विचारों के आपस में मेल खाने का है। अगर अंतरजातीय विवाहों पर जनमत संग्रह कराया जाए तो ज्यादातर संघ के लोग ऐसे निकलेंगे जिन्होंने अंतरजातीय विवाह किया है। स्वयंसेवकों में

अंतरजाती विवाह आम बात है।
उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र में पहला अंतरजातीय विवाह 1942 में हुआ था। ऐसा विवाह करने वालों को कई बधाई संदेश मिले थे। एक-एक संदेश बाबा साहेब अांबेडकर और गुरुजी (गुरु गोलवलकर) ने भी भेजा था। तब गुरुजी ने कहा था कि आप सिर्फ शारीरिक आकर्षण के कारण विवाह नहीं कर रहे, आप यह संदेश भी देना चाहते हैं कि हर कोई समान है।

राजनीतिक दल
भागवत ने कहा कि हमने एक नीति का समर्थन जरूर किया है और हमारी नीति के समर्थन करने का लाभ यह मिला कि हमारी शक्ति बढ़ी है। वैसे ही शक्ति इसका समर्थन करने वाले राजनीतिक दलों को भी मिल सकती है। जो इसका लाभ ले सकता है, वो ले जाता है। हमने इमरजेंसी का विरोध किया। इमरजेंसी के खिलाफ अनके दलों के नेता थे। उनमें बाबू जगजीवन राम भी थे। हमने ऐसा विचार नहीं किया कि इसका लाभ जनसंघ को ही मिले। हम राजनीति नहीं करते।