-बायोमेडिकल साइंस में प्रिवेंन्टिव औषधियों अभी तक तो ज्ञात नहीं हैं।

ग्लोबल बर्डेन ऑफ डिजीज के अनुमान बताते हैं कि लोअर रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन से हुई 2.74 मिलियन मौतों में से लगभग 2 मिलियन आयु समूहों में थे और 10 प्रतिशत एन्फ्लुएंजा के कारण थे।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा दिसंबर 2017 में प्रकाशित, पहले विश्वव्यापी प्रत्यक्ष अनुमान के मुताबिक, दुनिया में फेफड़े की बीमारियों से 6,50,000 तक सालाना मौतें हो रही हैं।

एन्फ्लुएंजा वायरस का संक्रमण छींकने, खाँसने, या संक्रमित सतहों व वस्तुओं को छूने से फैलता है। एक व्यक्ति कई बार संक्रमित हो सकता है।

टाइप-ए एन्फ्लुएंजा वायरस असल में सुअर-जन्य वायरस का एक उप-प्रकार, ए(एच1एन1) है। इसके कारण वर्ष 2009 में स्वाइन फ्लू महामारी फैली।

अब यह मौसमी एन्फ्लुएंजा के रूप संक्रमित करता है। सबसे पहले यह मेक्सिको के सीमान्त क्षेत्र में पाया गया था, जो दो माह के भीतर 21वीं सदी की पहली महामारी बन गया था।

राजस्थान में अभी भी स्वाइन फ्लू एक समस्या बना हुआ है। अतः वर्ष 2017 में प्रकाशित जानकारी समाहित करते हुये एक बार आज पुनः आयुर्वेद की मदद से स्वाइन फ्लू वायरस की चपेट में आने से बचने के उपायों पर चर्चा आवश्यक हो गयी है।

आइये देखते है कि कुछ लोग वायरस की चपेट में क्यों आ जाते हैं जबकि अन्य लोग क्यों बचे रहते हैं। इस प्रश्न का उत्तर आयुर्वेद के बीज-भूमि का सिद्धांत और व्याधिक्षमत्व का सिद्धांत द्वारा समझा जा सकता है।

बीज-भूमि का सिद्धांत स्पष्ट करता है कि जब शरीर उपजाऊ होता है या कहिये कि सम्यक पाचन न होने के कारण जमा हुये आम जैसे विषाक्त पदार्थों के कारण, या पूर्व से ही अन्य रोगों से ग्रसित रहने के कारण, प्रतिरक्षा तंत्र या व्याधिक्षमत्व कमजोर हो जाता है, तब बीज अर्थात वायरस का संक्रमण होते ही आसानी से शरीर की कोशिकाओं में बढ़ने में सक्षम होते हैं।

इसके विपरीत जब भूमि बांझ होती है, अर्थात शरीर के आम-रहित होने से व्याधिक्षमत्व मज़बूत रहता है, तो बीज अंकुरित नहीं होते या कहिये वायरल संक्रमण होने के बावजूद बीमारी शरीर में आगे नहीं बढ़ती।

इसके साथ ही, यदि शरीर में जठराग्नि सम है तो भोजन के सम्यक पाचन से अंततः बनने वाला ओजस शरीर को संक्रमण से लड़ जाने और जीत जाने में मदद करता है।

भौतिक स्तर पर ओजस की कमी का तात्पर्य प्रतिरक्षा-शक्ति या व्याधिक्षमत्व की कमी है। मानसिक स्तर पर ओजस की कमी का तात्पर्य मानसिक शक्ति की कमी और अल्पसत्त्व की स्थिति है।

इस प्रकार यदि शरीर में रोग-प्रतिरक्षा-शक्ति या व्याधिक्षमत्व दुरुस्त बनाये रखा जाये तो वायरल संक्रमण की स्थिति के बावज़ूद शरीर में स्वाइन फ्लू के कोई लक्षण या बीमारी उत्पन्न संभावना कम ही रहती है।

ओजस को दुरुस्त अवस्था में रखकर शरीर की प्रतिरक्षा-शक्ति या व्याधिक्षमत्व बढ़ाकर तमाम तरह के वायरल फीवर, स्वाइन फ्लू, इन्फ्लुएंजा जैसे सन्निपातकारी संक्रमणों से बचा जा सकता है।

यदि हमारी पाचन की आग सामान्य है—अर्थात विषमाग्नि नहीं है, माने न सुलग रही है (मन्दाग्नि), न धधक रही है (तीक्ष्णाग्नि)—तो हमारी प्रतिरक्षा और व्याधिक्षमत्व शक्तिशाली होगा और कोई संक्रमण हमारे ऊपर कब्ज़ा नहीं कर सकता है।

इसके लिये ऋतुओं के संधिकाल में विशेषकर वर्षाऋतु और शरदऋतु जैसे मौसमों के दौरान, जब मौसमी एन्फ्लुएंजा वायरल संक्रमण की संभावना अधिक होती है, तब पहले से ही सम्यक ऋतुचर्या के द्वारा आहार-विहार, सद्वृत्त, स्वस्थवृत्त, रसायन की सुरक्षा-दीवार खड़ा करके रखना उपयोगी रहता है।

स्वाइन फ्लू से बचाव का दूसरा कदम यह है कि संक्रमण फैलने की संभावना को दूर किया जाये। इस विषय में भारतीय वन सेवा के वरिष्ठ अधिकारी अजय गुप्ता जिन्हें आयुर्वेद की क्षमताओं की गहरी समझ है, की एक ठोस सलाह यह है कि हाथ जोड़कर अभिवादन करने की भारतीय परंपरा का पालन कर संक्रमण फ़ैलाने से बचाया जा सकता है।

हाथ मिलाना वायरल संक्रमण का आसान और पक्का रास्ता है। अजय गुप्ता की यह सलाह महर्षि सुश्रुत द्वारा औपसर्गिक रोगों के सन्दर्भ में।

संक्रामन्ति-नरान्नरम्-सिद्धांत से शत-प्रतिशत मेल खाती है (सु.नि. 5.33-34): प्रसङ्गाद्गात्रसंस्पर्शान्निश्वासात् सहभोजनात्। सहशय्यासनाच्चापि वस्त्रमाल्यानुलेपनात्।। कुष्ठं ज्वरश्च शोषश्च नेत्राभिष्यन्द एव च। औपसर्गिकरोगाश्च संक्रामन्ति नरान्नरम्।।।

अर्थात यौन संपर्क, शरीर से संपर्क, हाथ मिलाना, छोटी बूंदों से संक्रमण, पहले से संक्रमित व्यक्ति के साथ भोजन करना, संक्रमित व्यक्ति के साथ बैठना या सोना, संक्रमित व्यक्तियों के कपड़े, सौंदर्य प्रसाधन और गहनों का उपयोग आदि से संक्रमण की आशंका रहती है।

अतः सदैव हाथ जोड़कर अभिवादन कीजिये। हाथ मिलाकर वायरस मत बाँटिये।

स्वाइन फ्लू से बचाव का तीसरा कदम सम्यक दिनचर्या, रात्रिचर्या और ऋतुचर्या का पालन है। इसके लिये नियमित नस्य लेना, सप्ताह में कम से कम 150 मिनट व्यायाम व पैदल चलना आवश्यक है।

अभ्यंग, शरीर की सफाई, स्नान, साफ़-सुथरे कपड़े पहनना, योग, प्राणायाम, और रात में सात घंटे की नींद आदि आवश्यक हैं। संक्रमण काल में अणुतेल का प्रतिमर्श नस्य अत्यंत आवश्यक है।

बिना नस्य लिये घर के बाहर नहीं निकलना चाहिये। इसके लिये सुबह-शाम, साफ़ अँगुली में अणुतेल की कुछ बूंदें डालकर नासाछिद्र में लगाना चाहिये।

ध्यान रखें कि एक नासाछिद्र में जिस अँगुली से नस्य लें, उसी से दूसरे नासाछिद्र में नहीं। पुनः दूसरी साफ़ अँगुली का प्रयोग करें। भीड़-भाड़ वाले क्षेत्रों में जाने के पूर्व भी नस्य लेना आवश्यक है।

अगर अणु तेल उपलब्ध न हो तो तिल या सरसों का तेल भी उपयोग कर सकते हैं।

नस्य पर आज तक हुई शोध से यह स्पष्ट है कि यह साधारण सी लगाने वाली क्रिया असल में अत्यंत लाभकारी है। यह आरोग्य और दृढ़ता देती है। वायरस संक्रमण को निश्चित रूप से रोकती है।

स्वाइन फ्लू से बचाव का चौथा कदम, आयुर्वेदाचार्यों की सलाह से, आहार, रसायन और औषधि के सम्यक प्रयोग पर है। आहार ऐसा हो जिससे जठराग्नि सदैव सम रहे एवं व्याधिक्षमत्व बढ़ा रहे।

आधुनिक वैज्ञानिक संदर्भ में कहें तो ऐसा आहार जो ऑक्सीडेंटिव स्ट्रेस लोड को कम से कम बढ़ाये, वही व्याधिक्षमत्व बढ़ा सकता है।

रेसवेराट्रॉल एवं ऑक्सीरेसवेराट्राल युक्त खाद्य एवं पेय जैसे द्राक्षासव, ग्रीन-टी, द्राक्षा, अनार, संतरे व अनन्नास, आँवला आदि बचाव में मददगार है क्योंकि इनमें एंटीऑक्सीडेंट व एंटीवायरल गुण पाये जाते हैं।

अश्वगंधा, शुण्ठी, कालीमिर्च, पिप्पली, गुडूची, पुदीना, हल्दी, यष्टिमधु, बिभीतकी, लहसुन, तुलसी, सहजन, चित्रक, कालमेघ, वासा, सप्तचक्र (सैलेसिया रेटीकुलाटा), दूधी (राइटिया टिंक्टोरिया) का क्षीर आदि बहुत उपयोगी हैं।

शहतूत की नई टहनियों में पाया जाने वाला आक्सीरेसवेराट्राल भी वाइरस रेप्लीकेशन को रोकता है।

विशेष रूप से अश्वगंधा और कालमेघ की न्यूरामिनिडेज-इन्हिबिटर एक्टिविटी ठीक वैसी ही है जैसी कि आधुनिक औषधियों जानामिविर, ओसेल्टामिविर व पेरामिविर की है।

इलाहबाद में आयुर्वेदपुरम के संस्थापक और विश्व-प्रसिद्ध क्षारसूत्र सर्जन डॉ. वी.बी. मिश्रा, जिन्हें पाइल्स, फिस्टुला, सेंटीनेल टैग (सेंटिनेल पाइल्स), फिशर्स, पिलोनिडल सायनस, रेक्टल पॉलीप्स आदि से पीड़ित रोगियों में लगभग 25,000 सफल सर्जरी सहित आयुर्वेद चिकित्सा का विशाल अनुभव है, का कहना है कि साधारण स्वास्थ्य समस्याओं के उपचार में एंटीबायोटिक्स, दर्द निवारक, एन्टीपाइरेटिक, म्यूकोलाइटिक, खांसी-निवारक तथा कन्जेशन निवारक दवाओं का अंधाधुंध उपयोग करना बहुत हानिकारक है।

डॉ. वी.बी. मिश्रा का मानना है कि स्वाइन फ्लू सहित अनेक प्रकार के वायरल रोगों से बचे रहने के लिये संहिताओं, साइंस और अनुभव को साथ लेकर कालमेघ, तुलसी, शुंठी, कालीमिर्च, पिप्पली, गुडूची, हल्दी, यष्टिमधु, बिभीतकी, और अश्वगंधा युक्त, आधुनिक वैज्ञानिक विधियों से निर्मित, कोल्डकैल, एलेरकैल, जेरलाइफ-एम व जेरलाइफ-डब्ल्यू जैसी डबल-स्टैंडर्डाइज़्ड मल्टीस्पेक्ट्रम आयुर्वेदिक रसायन व औषधियाँ बचाव और उपचार का अच्छा साधन सिद्ध हुई हैं।

स्वाइन फ्लू से बचाव का पाँचवां सुझाव यह है कि सद्वृत्त और आचार रसायन का निरंतर पालन किया जाये।

विशेषकर स्नान, मलमार्गों व हाथ की सफाई, संक्रमित वस्तुओं, व्यक्तियों व स्थलों से सुरक्षित दूरी रखना, जम्हाई, छींक व खाँसी के समय मुंह ढकना, नासिका-द्वारों को कुरेदना से बचाना, सोने, जागने, मदिरापान, भोजन आदि में अतिवादी नहीं होना, स्नान के बाद पुनः पूर्व में पहने हुये कपड़े नहीं पहनना, हाथ, पैर व मुंह धोये बिना भोजन नहीं करना, गंदे या संक्रमित बर्तनों में भोजन नहीं करना, संक्रमित व्यक्तियों द्वारा लाया हुआ भोजन नहीं करना चाहिये।

स्वाइन फ्लू से बचाव के लिये वैक्सीनेशन महत्वपूर्ण उपाय माना जाता है, परन्तु वैक्सीन उत्पादन के तौर तरीके लम्बे समय से नहीं बदले।

वैक्सीन की प्रभाविता भी बड़े-बूढ़ों में असंतोषजनक है। वैक्सीनेशन न केवल हर वर्ष जरूरी है, बल्कि सभी वायरल संक्रमणों के विरुद्ध प्रभावी एकल वैक्सीन उपलब्ध नहीं है।

एन्फ्लुएंजा के उपचार हेतु भी केवल एन्टीन्यूरामिनीडेज औषधियाँ ही कारगर मानी जाती हैं। पालीमेरेज मैकेनिज्म से सम्बंधित औषधियाँ अभी विकसित नहीं हो पाईं हैं।

एन्फ्लुएंजा के नये-नये रूपांतर या वैरिएंट से आपदा की आशंका सदैव बनी रहती है। वर्ष 2017 में हुये कुछ अध्ययनों में पाया गया कि वैसे तो ज्यादातर लोगों में फ्लू के लक्षण नहीं दिखते हैं, लेकिन टीकाकरण किये हुये लोगों के बीमार हो जाने की अधिक आशंका व्यक्त की गयी है।

यह बहुत चिंताजनक स्थिति है। स्वाइन फ्लू से बचने के लिये प्रतिदिन नस्य लीजिये, फल खाइये, समय समय पर हाथ धोइये, हाथ मिलाने की बजाय हाथ जोड़कर अभिवादन कीजिये, सप्ताह में कम से कम 150 मिनट व्यायाम व योग कीजिये, रात में सात घंटे की नींद लीजिये, रसायनों का सेवन कर व्याधिक्षमत्व बढ़ाइये, और आयुर्वेदाचार्यों की सलाह से प्रोफाइलैक्टिक औषधियों द्वारा तमाम तरह के फ्लू से बचाव कीजिये।

यह मत भूलिये कि वर्ष 1918 के स्पैनिश फ्लू से 100 मिलियन लोगों मृत्यु हुई थी जो उस समय कुल मानव जनसंख्या का 5 प्रतिशत था।

डॉ. दीप नारायण पाण्डेय
(इंडियन फारेस्ट सर्विस में वरिष्ठ अधिकारी)
(यह लेखक के निजी विचार हैं और ‘सार्वभौमिक कल्याण के सिद्धांत’ से प्रेरित हैं)