narendra modi devotee
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भारतीय राजनीति में नेताओं के भक्त या कट्टर समर्थक हर दौर में रहें हैं। चाहे जवाहर लाल नेहरू हो, इंदिरा गांधी या राजीव गांधी। हालांकि, मैंने उनका दौर तो नहीं देखा है, लेक़िन पढ़ने और सुनने के बाद आसानी से यह कह सकता हूं।

मैंने जिस नेताओं के प्रति भक्ति देखी है, उनमें वायएस राजशेखर रेड्डी, जयललिता और करुनानिधि शामिल हैं। एक हद तक इन तीनों के निधन के बाद इनके समर्थकों ने आत्महत्या तक कर लीं।

एक बात यहां साफ़ है कि दक्षिण भारत में नेताओं के प्रति अंधभक्ति या कहें कि दीवानीगी हद से ज्यादा है, बनिस्पत उत्तर भारत और बाकि देश के।

आज अग़र नेताओं के प्रति भक्ति देखें, तो लगता है कि उनके नेता से सवाल करना, आलोचना करना, देशद्रोह के सूची में आता है।

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हालांकि, जब से पिछले साढ़े 4 साल से नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं, तो समर्थक को भक्त का ख़िताब मिल गया है। यह सियासत में बिल्कुल नया शब्द है।

इससे पहले समथर्क कहा जाता था, अब उनके विरोधी उनको भक्त कह कर संबोधित करतें हैं इस भक्ति में आम और ख़ास से लेकर बॉलीवुड खेल मीडिया हर क्षेत्र के लोग शामिल हैं। लेक़िन पिछले एक दो साल में भक्ति की शक्ति में भी बड़ी गिरावट आई है।

यही हाल पिछले एक साल से राहुल गांधी को लेकर भी है। जब से बमुश्किल 3 राज्यों में कांग्रेस की सरकार बनी है, तब से उनके प्रति भी कांग्रेस के समर्थकों की भक्ति उबाल मार रही है। ये भक्त भी मोदी भक्त से कहीं कम नही है। औऱ तो और जब से प्रियंका वाड्रा आधिकारिक तौर पर कांग्रेस की महासचिव बनी हैं, तब से अलग ही माहौल बनाया जा रहा है।

तब से औऱ ज्यादा भक्ति के शक्ति में इज़ाफ़ा हुआ है, जैसे प्रियंका वाड्रा के पास कोई जादू की छड़ी हो और वह कांग्रेस को यूपी में 2 सीट से 20 सीट पर पहुंचा देगी। वैसे यही भक्ति राहुल गांधी के लिए 2013 में थी, जब वो उपाध्यक्ष बने थे और आज की स्थिति सबको पता है।

जेएनयू में कथित तौर पर देश विरोधी नारेबाजी के बाद नेता बने कन्हैया कुमार को वैसे तो नेता बनाने का श्रेय बीजेपी को जाता है। ऐसा लग रहा है कि खुद माकपा भी अब कन्हैया को नेता मान चुकी है। ज़िला कमिटी ने उन्हें लोकसभा का बेगूसराय से उम्मीदवार भी बना दिया है।

वैसे अब एक क्षेत्र विशेष में कन्हैया के प्रति भी अंधभक्ति अपने चरम सीमा पर है। क्योंकि मैं खुद भी उसी क्षेत्र से आता हूं, औऱ मैंने भी इसको करीब से देखा है। उनके भक्तों में ज्यादातर युवा नेता शामिल है।

किसी भी नेता के पतन के पीछे उनके भक्त ही होतें हैं। समर्थक होना और भक्त होना दो अलग अलग चीच हैं, लेक़िन अबके दौर समर्थक कम भक्त ज्यादा देखने को मिल रहें हैं औऱ यही भक्त उनको ले डूबते हैं।

लेखक
ZEESHAN NAIYER,
MAULANA AZAD NATIONAL URDU UNIVERSITY HYDERABAD
(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

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