विधानसभाध्यक्ष फिर कभी नहीं पहुंच पाए सदन

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-राजस्थान विधानसभा चुनाव, क्या इस बार टूटेगा मिथक?

जयपुर।
राजस्थान विधानसभा चुनावों की कवायद चल रही है। राजनीतिक दलों के आला नेता प्रचार में जुटे हुए हैं तो दिल्ली से नेताओं ने भी प्रदेश में कमान संभाल रखी है।

इस बीच राजस्थान के विधानसभा चुनाव से कई मिथक भी सामने आ रहे हैं। जिनमें राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष को लेकर भी ऐसा ही मिथक है।

विधानसभा अध्यक्ष को लेकर चल रही मिथक ऐसा है कि आजतक जितने भी विधानसभा अध्यक्ष बने हैं, वो अगली बार चुनाव जीतकर नहीं आए हैं। यह सिलसिला वर्ष 1993 से चल रहा है।

राजस्थान में जो भी विधायक विधानसभा अध्यक्ष बना, उसको फिर से विधानसभा जाने का मौका नहीं मिला। इसमें चाहे फिर विधायक का टिकट कटा, हो फिर हार का मुंह देखना पड़ा हो या फिर चुनाव ही नहीं लडा हो।

इस सीरीज में सबसे पहला नाम उस समय के विधानसभा अध्यक्ष शांतिलाल चपलोत का नाम आता है। चपलोत 1993 से 1998 में विधानसभाध्यक्ष थे। लेकिन 1998 के चुनाव वह जीत नहीं पाए।

वर्ष 1998 में विधानसभा अध्यक्ष परसराम मदेरणा बने, लेकिन मदेरणा ने साल 2003 में चुनाव ही नहीं लड़ा। इसी तरह उनके बाद सुमित्रा सिंह विधानसभा अध्यक्ष बनीं, लेकिन इसके बाद वो चुनाव तो लड़ीं, लेकिन हार गईं।

साल 2008 में विधानसभा अध्यक्ष बने दीपेंद्र सिंह शेखावत, जिनको 2013 के चुनाव में टिकट तो मिला, लेकिन फिर से संयोग ऐसा बना की वह भी विधानसभा तक नहीं पहुंच पाए।

फिलहाल राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष दीपेंद्र सिंह शेखावत और कैलाश चंद मेघवाल चुनाव लड़ रहे हैं। भाजपा ने मेघवाल पर फिर से विश्वास जताया है, तो दूसरी तरफ पिछला चुनाव हार चुके दीपेंद्र सिंह को भी कांग्रेस ने श्रीमाधोपुर से मैदान में उतारा है।

अब यह देखना दिलस्प होगा, कि जो मिथन विधानसभा अध्यक्ष को लेकर चला आ रहा है, वह इस बार भी टूटेगा या मिथक ही बना रहेगा।