नई दिल्ली।

Jawaharlal Nehru university (JNU) में कथित तौर पर देशद्रोही नारों में शामिल मुख्य आरोपी कन्हैया कुमार को करीब 1 साल पहले ही बिहार के बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र से मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का उम्मीदवार बना दिया गया था।

मार्क्सवादी (एमएल), जनता दल यूनाइटेड, कांग्रेस और अन्य भाजपा विरोधी दलों के महागठबंधन में कन्हैया कुमार को बेगूसराय से एकमात्र उम्मीदवार माना जा रहा था, लेकिन अंत समय में महागठबंधन ने कन्हैया कुमार को दरकिनार कर दिया।

कन्हैया कुमार को दरकिनार किए जाने के बाद अब यह कयास लगाए जा रहे हैं कि उनको अपनी ही पार्टी (CPI-ML) में भी विरोध का सामना करना पड़ सकता है।

ऐसा माना जा रहा है कि कन्हैया कुमार अब भारतीय जनता पार्टी के लिए मुश्किलें खड़ी करने की स्थिति में नहीं है, क्योंकि उनके साथ केवल उनका खुद का दल है, जबकि भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर 2014 में भोला सिंह को करीब 4.28 लाख वोट मिले थे।

दूसरे नंबर पर रहे राजद के तनवीर हसन को 3.70 लाख वोट मिले थे। दोनों में अंतर था। यहां पर महागठबंधन के उम्मीदवार भी सीपीआई के लिए कोई मायने नहीं रखते हैं।

यानी कि देखा जाए तो महागठबंधन का टिकट नहीं मिलने पर कन्हैया कुमार को करीब 200000 वोट मिलते नजर आ रहे हैं। इसमें कुछ बढ़ोतरी हो सकती है और उनकी देशद्रोही के रूप में बनी छवि और मुकदमों के कारण कमी भी हो सकती है।

इसलिए नहीं मिला कथित देशद्रोही कन्हैया कुमार को बेगूसराय से महागठबंधन का टिकट- 1

बिहार में राष्ट्रीय जनता दल 20, कांग्रेस 9, उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी 5, विकासशील इंसान वाली 3 और जीतन राम मांझी की हिंदुस्तान आवाम मोर्चा पार्टी 3 सीटों पर चुनाव लड़ेगी।

राष्ट्रीय जनता दल ने अपने कोटे से सीपीआई (माले) को 1 सीट देने की बात कही है। यह उनके जनाधार के हिसाब से बताई गई है। उम्मीद लगाई जा रही थी बिहार में महागठबंधन जेएनयू के पूर्व छात्र कन्हैया कुमार को बेगूसराय से टिकट दे सकते हैं।

उनकी पार्टी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया को महागठबंधन में जगह दिए जाने की चर्चा थी। लेकिन जब गठबंधन बना तो पूरी तरह से दरकिनार कर दिया गया।

इससे पहले कन्हैया कुमार और राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव के बीच में कुछ महीनों से काफी नजदीक या चल रही थी। दोनों कई मंच भी साझा कर चुके थे जिसके चलते यह बात पक्की होती जा रही थी कि महागठबंधन बेगूसराय से कन्हैया कुमार को ही अपना उम्मीदवार बनाएगा।

लेकिन अंत समय में दोनों के बीच सहमति नहीं बनी और अंततः महागठबंधन में अपना अलग उम्मीदवार उतार दिया। इसके पीछे विशेषज्ञ कई बातें बताते हैं।

एक राय के मुताबिक तेजस्वी यादव को कन्हैया कुमार की विद्रोही छवि के कारण खुद के कमजोर होने का डर सता रहा है। जिसके चलते उनको गठबंधन में शामिल कर खुद से बड़ा होते हुए नहीं देख सकते।

यह बात सही है कि भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी के खिलाफ लगातार विवरण देने के कारण कन्हैया कुमार राष्ट्रीय स्तर पर युवाओं की सूची में शामिल हो गए हैं, जो विद्रोही और बीजेपी विरोधी प्रवृत्ति के लोगों को अपना रोल मॉडल मानते हैं।

सियासी गलियारों में यही चर्चा है कि तेजस्वी यादव यहां पर बिलकुल सेफ गेम खेलना चाहते हैं। क्योंकि कन्हैया कुमार एक मजबूत आवाज है और आम आदमी को बहुत सरल शब्दों में अपनी बात कहने में सक्षम हैं।

ऐसी स्थिति में कन्हैया कुमार का महागठबंधन में शामिल होना कहीं ना कहीं तेजस्वी यादव को कमजोर करने में कामयाब हो जाता। यहां पर बरसों से रिपोर्टिंग करने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार का दावा है कि बिहार में सीपीआई के पास लोकसभा में कोई खास आधार नहीं होने की वजह से उनको टिकट की रेस से बाहर किया गया है।

यह बात सही है कि राष्ट्रीय स्तर पर एक युवा छात्र के रूप में उनकी बगावती छवि युवाओं को आकर्षित करती है। राजनीतिक विशेषज्ञों के मुताबिक कन्हैया कुमार को महागठबंधन में शामिल करके बड़ा नुकसान किया गया है।

क्योंकि यह युवा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ एक मजबूत आवाज बनकर उभरा था। जिसके चलते बीजेपी के विरोधी ही नहीं, बल्कि मुस्लिम दलित और यादव मिलकर भाजपा के उम्मीदवार के लिए बहुत भारी पड़ सकते थे।

लेकिन गठबंधन ने इस अवसर को खो दिया। इतिहास पर नजर डाली जाए तो बीजेपी को तभी फायदा हुआ है जब त्रिकोणीय मुकाबला होगा। चतुष्कोण चतुष्कोण मुकाबले में बीजेपी हमेशा रही नुकसान में रही है।

अब एक तरफ महागठबंधन है, दूसरी तरफ कन्हैया कुमार और तीसरी बीजेपी है। जिसके चलते यह कयासबाजी लगाई जा रही है कि इस तरह के समीकरण का फायदा निश्चित रूप से बीजेपी को मिलेगा।

बीजेपी ने यहां से गिर्राज सिंह को टिकट देकर मैदान में उतारा है। गिरिराज सिंह भूमिहार समाज से ही आते हैं। वह अभी भी लोकसभा सांसद हैं।