यह है झुग्गी नं. 208 का हीरा: नाम है IPS हरीश चंदर

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नई दिल्ली।

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले एक दिहाड़ी मजदूर मां—बाप के बेटे हरीश चंदर ने पहले प्रयास में आईएएस का सफर तय कर दिखा दिया है कि कच्ची बस्तियों में केवल अपराधी ही नहीं, उसके जैसा नायाब हीरा भी पनपता है।

यह कहानी है एक बच्चे और उसके मां—बाप के द्वारा सफलता पाने वाली जिद की! यह दास्तां है एक छात्र के जुनून की! यह कोशिश है सपने देखने और उन्हें पूरा करने की इच्छा रखने वाले हर उस भारतीय की, जो अभावों का रोना रोने के बजाए अपने लक्ष्य पर अड़िग रहता है।

यह मिसाल है उस इंसान के जज्बे की, जिसमें कच्ची और मलिन बस्ती में रहते हुए दिहाड़ी मां—बाप के सपने को पूरा करते हुए आईएएस अफसर पूरा किया है।

जिसके पिता एक दिहाड़ी मजदूर हों और मां दूसरों के घरों में जाकर बर्तन साफ करने और झाडू—पौंछे का काम करती हों। ऐसे हालात में आम इंसान शायद कभी का बिखर गया होता।

लेकिन दिल्ली के 21 वर्षीय हरीश चंदर ने इन्हीं विपरीत हालात में रहकर वह करिश्मा कर दिया, जो आज पूरे देश में संघर्षशील गरीब युवाओं के लिए मिसाल बन गया है।

दिल्ली की कच्ची बस्ती के ओट्रम लेन, किंग्सवे कैंप की झुग्गी नं. 208 में रहने वाले हरीश चंदर ने पहले ही प्रयास में आईएएस परीक्षा 2010 में 309वीं रैंक हासिल करते हुए मां—बाबा के सपनों को अंजाम तक पहुंचा दिया।

हरीश चंदर कहते हैं: मैंने संघर्ष की ऐसी काल कोठरी में जन्म लिया था, जहां पर हर चीज के लिए कड़ी जद्दोजहद करनी पड़ती है। जब से होश संभाला खुद को जीवित रखने के लिए किसी न किसी कतार में ही पाया।

कभी पानी की लाइन, कभी राशन की लाइन, तो कभी शौच जाने के लिए भी लाइन में लगना पड़ता था। कच्ची बस्ती में माहौल ऐसा होता है कि पढ़ाई की बात तो बहुत दूर, सुबह-शाम का खाना मिल जाए, तो ही बड़ी बात मानी जाती है। बाबा (पिता) दिहाड़ी पर मजूदर करते थे।

उनको कभी कोई काम मिल जाए, तो वक्त पर रोटी नसीब हो जाती थी, नहीं मिले तो घर पर रखे चने खाकर रात गुजारने की हम सभी को आदत थी।

हमारी झुग्गी में जहां पीने को पानी नहीं मिलता, वहां बिजली के बारे में तो सोचना भी बेमानी है। जर्जर झोपड़ी की हालत ऐसी थी कि गर्मी में दिनभर सूरज, बरसात के दिनों में पानी और सर्दी में ठंड से हमारा सीधा सामना हुआ करता था।

बकौल हरीश: मां-बाबा पूरी तरह अनपढ़ हैं, किंतु उन्होंने मुझे, मेरे तीन भाई-बहनों को पढ़ाने का हर संभव प्रयास किया। मगर जिस घर में दो वक्त का खाना जुटाने के लिए भी कड़ी मशक्कत होती हो, वहां पढ़ाई का सपना कहां तक चल पाता।

घर के बिगड़े हालात देखकर मैं खुद भी एक किराने की दुकान पर काम करने लग गया। इसका बुरा असर मेरी पढ़ाई पर पड़ा। नतीजा, 10वीं में मैं फेल होते-होते बचा।

उस समय एक बार तो मैंने पढ़ाई को हमेशा के लिए छोड़ने की सोच ली थी। लेकिन मां, जिन्हें खुद एक अक्षरों का ज्ञान नहीं था, वो यह जानती थीं के ये अक्षर ही हैं, उससे बेटे का भाग्य बदला सकता है।

इसलिए मेरी मां ने मुझे पढ़ाने के लिए दुकान से हटाकर खुद दूसरों के घरों में बर्तन साफ करना और झाडू-पोंछा करने लगी। मां के कमाए हुए पैसों को पढ़ाई में खर्च करने पर मुझे एक अजीब सा जोश आता था।

तब मैं एक-एक मिनट को भी केवल पढ़ाई में इस्तेमाल करता था। मेरा यह मानना है कि यदि आपको किसी काम में पूरी तरह सफल होना है तो उसके लिए पूरी तरह समर्पित होना ही पड़ेगा। इसमें एक प्रतिशत लापरवाही भी आपकी पूरी जिंदगी के लिए खतरनाक साबित हो सकती है।

हरीश बताते हैं कि: यूं तो उनकी मां ही सबसे बडी प्रेरणा रहीं, लेकिन जिस एक शख्स से उनको सबसे ज्यादा प्रभावित किया और जिसने झकझोर कर रख दिया, वह हैं गोविंद जायसवाल। यह वही गोविंद हैं, जिनके पिता रिक्शा चलाते थे और वो साल 2007 में आईएएस बने थे।

एक अखबार में गोविंद जायसवाल का साक्षात्कार पढ़ने के बाद लगा कि यदि वह आईएएस बन सकते हैं, तो मैं क्यूं नहीं? किंतु मैं 12वीं तक यह भी नहीं जानता था, कि आईएएस होते क्या हैं।

हिंदू कॉलेज से स्नातक करने के दौरान मुझे मित्रों के जरिए जब आईएएस सेवा के बारे में पता चला, तो उसी वक्त मैंने आईएएस बनने की ठान ली।

आईएएस की परीक्षा के दौरान राजनीतिक विज्ञान और दर्शन शास्त्र मुख्य विषय थे। सब्जेक्ट चयन के बाद दिल्ली स्थित पतंजली संस्थान के धर्मेंद्र सर ने मेरा पूरा मार्गदर्शन किया।

उनकी इस विषय पर जबरदस्त पकड़ है। पढ़ाने का तरीका ही कुछ ऐसा है कि सारे कॉन्सेप्ट खुद ब खुद क्लीयर हो जाते हैं। धर्मेंद सर का मार्गदर्शन मुझे नहीं मिला होता, तो शायद मैं कभी आईएएस नहीं बन पाता।

हरीश के अनुसार: जिंदगी के हर मोड़ पर उन्होंने संघर्ष ही देखा है, किंतु कभी विपरीत परिस्थितियों से हार स्वीकार नहीं की। मां ने जब किराने की दुकान से हटा दिया था, तब कई साल तक मैंने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते हुए खुद पढ़ता रहा। तब न जाने कितने लोगों ने मेरी उपेक्षा की और मैंने कितनी ही मुसीबतों का सामना किया। उस वक्त लोग मुझे पास बिठाना भी पसंद नहीं करते थे, क्योंकि मैं कच्ची बस्ती से था।

लोग यह मानते हैं कि बस्तियों से तो केवल अपराधी ही बनतकर निकलते हैं। लेकिन मेरी इस कोशिश ने यह साबित कर दिया कि कच्ची बस्तियों से अफसर भी बनकर निकलते हैं। तब लोगों ने भले ही मुझे कमजोर आंका हो, किंतु मैं खुद को हमेशा मजबूत ही मानता था। मेरा यह मानना है कि जब भी आपको खुद पर संदेह हो तो अपने से नीचे वालों को देख लो, हिम्मत आपके अंदर खुद ब खुद आ जाएगी।

इस परीक्षा के बारे में एक सही बात यह भी है, कि मेरा पहला ही नहीं था, बल्कि यही मेरा आखिरी प्रयास भी था। यदि मैं इस प्रयास में सफल नहीं होता तो मेरे मां-पिता के पास इतना पैसा नहीं था कि वे मुझे दोबारा से इस परीक्षा की तैयारी करवा पाते।

उनके अनुसार: जिंदगी में सबसे ज्यादा खुशी का पल वह था, जब हर दिन की भांति मेरे बाबा मजदूरी करके घर लौटे और उनको यह पता चला कि उनका बेटा भी आईएएस परीक्षा में पास हो गया है। मुझे गर्व है कि मुझे ऐसे मां-बाप मिले, जिन्होंने हमें कामयाबी दिलाने के लिया सब कुछ स्वाहा कर दिया।

मेरे को यह बताते हुए आज गर्व हो रहा है कि मेरा निवास का पता ओट्रम लेन, किंग्सवे कैंप, झुग्गी नंबर 208 है। जब टीवी चैनल वाले जर्नलिस्ट और पत्रकार मेरे बाबा की बाइट ले रहे थे, तो उनकी आंसू भरी खुशी के सामने मानों मेरी इतने बरसों की सारी तकलीफें और मेहनत बहुत बौनी हो गईं।

हरीश बताते हैं कि: मेरा मानना है कि एक सफल और एक निराश हुए असफल व्यक्ति में केवल ज्ञान का ही फर्क नहीं होता है, दोनों के बीच फर्क होता है तो सिर्फ इच्छा शक्ति के साथ संघर्ष से डटकर मुकाबला करने का। आपके हालात कितने ही बुरे हों, आप घनघोर गरीबी हों। इसके बावजूद आपकी विल पावर बेहद मजबूत हो, आप पर हर हाल में कामयाब होने की जिद सवार हो, तो दुनिया की कोई शक्ति सफल होने से आपको रोक नहीं सकती।

जब हम कठिन काम को चुनौती के रूप में स्वीकार करते हैं, उन्हें खुशी और उत्साह से करते हैं, तो यह तय मानकर चलिए कि चमत्कार होते ही हैं। यूं तो निराशा कभी भी मुझपर हावी नहीं हुई, किंतु जब भी कभी परेशान होता था, तो कवि नीरज की यह पंक्तियां मुझे बहुत हौसला देती हैं, “मैं तूफानों में चलने का आदी हूं….”