आयुर्वेद के ये सात रक्षा-कवच आपको आईसीयू में मरने से बचा सकते हैं-

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- Advertisement - dr. rajvendra chaudhary

बात 26-27 सितम्बर 2018 की है| भारतीय वन सेवा के 1988 बैच के लगभग 70 वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा सेवा में तीस वर्ष पूरे करने पर इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी देहरादून में प्रशिक्षण चल रहा था|

साथियों से तीस साल बाद मिलकर बड़ा अच्छा लगा| वानिकी पर विभिन्न विषयों के दिग्गज विद्वानों के व्याख्यान हुये| ज्ञान की बातें हुईं| इस बीच कुछ साथियों का विचार आया कि हम सब उम्र के ऐसे पड़ाव पर हैं जब व्यक्तिगत स्वास्थ्य महत्वपूर्ण हो गया है| वन और पर्यावरण का स्वास्थ्य सम्हालने के लिये स्वयं का स्वास्थ्य सम्हालना आवश्यक है| अतः एक सत्र में स्वास्थ्य विषयक चर्चा का मुझे मौका मिला|

बात यहां तक तो सामान्य है, परन्तु महत्वपूर्ण बात यह है कि आयुर्वेद के प्रति देश के वरिष्ठ अधिकारियों में इतनी गंभीर रुचि देखकर मुझे यह लगा कि आयुर्वेद का समय एक बार पुनः आ गया है| संक्षिप्त व्याख्यान और चर्चा के दौरान न केवल पूरा हाल खचाखच भरा था बल्कि आधा घंटे की चर्चा को तीन सत्रों तक बढ़ाना पड़ा|

एक-एक घंटे के दो सत्र तो शाम को ही हो पाये जिसमें परिवार के सदस्य भी शामिल हुये| बातें तो बहुत हुईं पर एक बात स्पष्ट निकलकर आयी कि अगले एक वर्ष तक प्रत्येक रविवार अतिथि सम्पादकीय की श्रंखला इस प्रकार लिखी जाये जिसमें जीवन और मृत्यु के मध्य आयुर्वेद की सात रक्षा दीवारों के सिद्धांत के विविध पहलुओं पर क्रमानुसार व्यवस्थित रूप से प्रकाश डाला जाये|

तदनुसार एक वर्ष तक चलने वाली चर्चा की आज यहां शुरुआत है| इस श्रंखला को मैं भारतीय वन सेवा के वर्ष 1988 बैच के सभी अधिकारियों और उनके परिवारों को उनके आयुर्वेद प्रेम के लिये समर्पित करता हूँ|

दरअसल आयुर्वेद को आज नये सिरे से उस समग्रता में देखना आवश्यक है जिसे मैं “आयुर्वेद के सात रक्षा-कवचों का सिद्धांत” कहता हूँ। आहार, विहार, स्वस्थवृत्त, सद्वृत्त, पंचकर्म, रसायन और औषधि, जीवन तथा मृत्यु के मध्य आयुर्वेद के सात रक्षा-कवच हैं।

जब तक इन सात रक्षा-कवचों को मजबूत न रखा जाये तब तक बीमारियों से बचाव करना या स्वस्थ रहना संभव नहीं है। शरीर का व्याधिक्षमत्व या इम्यूनिटी, स्वास्थ्य या रुग्णता, हितकारी और सुखकारी आयु आदि अन्ततोगत्वा इन्हीं सात रक्षा-कवचों की दीर्घकालिक स्थिति से निर्धारित होते हैं। कहने को तो ये सात रक्षा-कवच साधारण हैं, किन्तु इनमें आयुर्वेद की समग्रता समाहित है|

जैसा कि आज की जीवन शैली से स्पष्ट है, हम सात में से उन छह किलेबंदियों या दीवारों को तोड़ रहे हैं जो हमारे स्वास्थ्य और रुग्णता के बीच मौजूद हैं।

ये सात दीवारों को पुनः समझें तो आहार या खान-पान, विहार या जीवनशैली, स्वस्थवृत्त या व्यक्तिगत स्वास्थ्य से जुड़े आचरण, सद्वृत्त या व्यक्तिगत सदाचरण, पंचकर्म या शारीरिक विषाक्तता को बाहर करने के लिये आयुर्वेद की पांच प्रक्रियायें, रसायन या उम्र-आधारित रोगजनन को रोकने हेतु कायाकल्प उपाय और अंततः औषधि या चिकित्सा हैं।

जब हम पहली छः दीवारों को टूटने देते हैं, जैसा कि हम प्रायः करते हैं, तो हमारे विकल्प सीमित हो जाते हैं। हमारा जीवन सीधा दवाओं के भरोसे हो जाता है।

मैंने यहां पहले भी लिखा है जैसे ही हम बीमार होते हैं वैसे ही हम उन उद्योगों के लिये रेवेन्यू-जेनरेटर हो जाते हैं जिनके लिये स्वास्थ्य या हेल्थकेयर अब दुधारू गाय बन गया है| अगर सातवीं दीवार टूटी या कहिये कि दवा विफल हुई तो हमारा काम-तमाम हो जाता है।

आने वाले एक वर्ष तक हम प्रत्येक रक्षा-कवच के प्रत्येक पहलू पर प्रकाश डालेंगे| इस विश्लेषण के लिये आयुर्वेद की संहितायें, आधुनिक वैज्ञानिक शोध और अनुभवजन्य ज्ञान की त्रिवेणी का उपयोग किया जायेगा|

संहिताओं, शोध और अनुभव की त्रिवेणी का संगम ही हमारा प्रमाण-आधार होगा| इस कार्य के लिये दुनिया की सर्वश्रेष्ठ शोध-पत्रिकाओं में आयुर्वेद के सिद्धांतों, योगों, और औषधियों पर आज तक विश्व भर में प्रकाशित लगभग सात लाख शोधपत्रों का डेटाबेस भी तैयार किया गया है।

इन शोधपत्रों में से अनेक में आयुर्वेद शब्द का उल्लेख हुआ हो या नहीं पर विषय-वस्तु की दृष्टि से ये सभी शोधपत्र आयुर्वेद से सम्बंधित हैं।

अगले एक वर्ष तक यह श्रंखला असल से एक मूल प्रश्न का उत्तर देगी कि कि यदि हम ईमानदारी से बेहतर उम्र चाहते हैं और पृथ्वी पर हमारे कार्यकाल के आखिरी दिन तक स्वस्थ रहना चाहते हैं, तो क्या करना चाहिये|

दूसरे शब्दों में, हम आपको यहां बतायेंगे कि जीवन-शैली, खान-पान, रहन-सहन कैसा हो कि हम सदैव स्वस्थ व्यक्ति की श्रेणी में गिने जायें| इस प्रश्नों के उत्तर उन सात रक्षा-दीवारों के निरंतर रखरखाव और प्रबंधन पर आपको ठोस जानकारी उपलब्ध करायेंगे, जिनको हमने ऊपर स्पष्ट किया है।

सदा निरोगी रहने के लिये आपको अपने आयुर्वेदाचार्य से निरंतर परामर्श करने की जरूरत है, फिर भी यह श्रंखला आपको उपयोग के लिये ऐसा ज्ञान उपलब्ध करायेगी जिसके द्वारा आप सदैव स्वस्थ रह सकते हैं|

दरअसल, तीन कारक हैं जो सभी बीमारियों को जन्म देते हैं—जीवन में हमारे द्वारा की जाने वाली बौद्धिक त्रुटियां, इन्द्रियों का असंतुलित उपयोग और समय का प्रभाव—ये तीनों सभी प्रकार के विकारों का कारण हैं।

यदि हम त्रुटियां न करें, बुद्धि, इंद्रियों और समय का संतुलित उपयोग करें तो बीमारी से बचाव संभव है। आयुर्वेद किसी अन्य चिकित्सा प्रणाली की तुलना में अच्छे स्वास्थ्य को अधिक व्यापक और समग्र रूप से परिभाषित करता है।

लगभग 1200 ईसा पूर्व से 600 ई.पू. के दौरान आचार्य सुश्रुत, जो दुनिया के पहले सर्जन और संत-वैज्ञानिक के रूप में प्रतिष्ठापित हैं, ने त्रिदोष (मूल सिद्धांत जो शरीर की फिजियोलोजी को सम्हालते हैं), अग्नि (चयापचय और पाचन तंत्र), धातुयें (शरीर के ऊतक), मलक्रिया (अपशिष्ट उत्पादों का उत्सर्जन) बराबर काम करते हैं, और आत्मा, मन और इन्द्रियां प्रसन्न रहती हैं, तो हम मान सकते हैं कि हम स्वस्थ हैं।

दूसरे शब्दों में कहें तो शरीर, मन और आत्मा का सुसंगत संतुलन ही स्वास्थ्य है। हम इन कारकों पर भी विस्तार से प्रकाश डालेंगे|

आयुर्वेद वैयक्तिक चिकित्सा का जनक है| प्रत्येक व्यक्ति के लिये प्रकृति (वात, पित्त, कफ) और सत्त्व (सत्त्व, रजस, तमस प्रवृत्ति की वर्तमान स्थिति) तथा साथ शरीर बल (जीवन शक्ति) और कई अन्य प्रासंगिक कारकों का मूल्यांकन किया जाना आवश्यक होता है।

बढ़ती आयु से संबंधित रोगजनन को रोकने के लिये कुछ सामान्य निर्देशों का पालन उपयोगी है| उपयुक्त आहार, विहार (जीवनशैली, व्यायाम, नींद इत्यादि), सद्वृत्त (व्यक्तिगत आचरण का कोड), स्वस्थ्यवृत (व्यक्तिगत स्वास्थ्य का कोड), रसायन (वयःस्थापक और कायाकल्प), पंचकर्म (शारीरिक विषाक्तता को बाहर करने के लिये आयुर्वेद की पांच प्रक्रियायें) और औषधि (चिकित्सा) को न अपनाने के कारण हम तमाम रोगों की समस्या भुगतते हैं।

आहार या भोजन और पेय पदार्थ के संबंध में एक सलाह यह है कि हमारे कुल आहार का एक तिहाई फलों के रूप में होना चाहिये| सभी फलों को भोजन के आरंभ में खाया जाना चाहिए, भोजन के तुरंत बाद नहीं।

फल भी विविध प्रकार के, विविध रंगों वाले, व बहुत खट्टे नहीं होना चाहिये| केवल एक ही प्रकार का फल भी सदैव नहीं होना चाहिये, हालांकि अनार, मुनक्का और आमला सदैव खाये जा सकते हैं।

आयुर्वेदिक खाद्य पदार्थों में से कई बहुआयामी हैं: उदाहरण के लिए खजूर, अंगूर, किशमिश, बादाम, तिल, आमलकी, लहसुन, अदरक, काली मिर्च, हल्दी, केसर, जीरा, धनिया, शहद, गाय का दूध, गाय का घी, गुड़ और त्रिफला आदि।

यदि इन्हें उचित तरीके से लिया जाता है, तो वे फ्री-रेडिकल्स की सफाई और ऑक्सीडेटिव-तनाव में कमी में लाने में सहायता करते हैं।

ये दर्द को कम करते हैं। ये भोजन, रसायन और औषधि सब कुछ एक में हैं। ये सुपर-फ़ूड हैं तथा स्वास्थ्यकर हैं।

भोजन तब ही लिया जाना चाहिये जब भूख लगी हो अर्थात जब पहले खाया हुआ खाना पूरी तरह से पच गया हो। चाय यदि छोड़ नहीं सकें तो कम तो कर ही देना चाहिये|

चाय की बजाय फलों का रस, आयुर्वेदिक क्वाथ या जड़ी-बूटियों का काढ़ा दिन में दो-तीन बार लिया जा सकता है।

छाछ सबसे अच्छा पेय होता है, जिसे जीरा, कालीमिर्च और थोड़े से सैन्धव नमक के साथ लिया जाना चाहिये। बाकी सब नमक छोड़कर सैन्धव नमक का उपयोग करना चाहिये।

खाने में सभी स्वाद या रस (मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय) खायें। भोजन की शुरुआत हमेशा मधुर रस से और अंत हमेशा कटु, तिक्त व कषाय रस के साथ होना चाहिये।

यदि आपके पास अंत में खाने के लिये कटु, तिक्त या कषाय रस नहीं बचा तो एक चुटकी काली मिर्च से भोजन समाप्त करना अच्छा विकल्प है|

भोजन कितना खायें? यह आपके पेट की अग्नि-क्षमता पर निर्भर करता है| लेकिन याद रखें कि पेट के एक तिहाई हिस्से में ठोस भोजन, एक तिहाई में तरल पदार्थ, और पेट के शेष तीसरे भाग को पाचन-क्रिया के कुशलतापूर्वक संपन्न होने के लिये खाली छोड़ देना चाहिये।

निद्रा अच्छे स्वास्थ्य के तीन स्तंभों में से एक है, और यह स्वास्थ्य को बनाये रखने और बढ़ती उम्र के कारण होने वाले रोगों को रोकने में महत्वपूर्ण है।

दरअसल, सुख और दुख, पोषण और कुपोषण, शक्ति और कमजोरी, उर्वरता और बांझपन, ज्ञान और अज्ञान, जीवन और मृत्यु सब उचित नींद पर निर्भर करते हैं। अत्यधिक नींद या नींद का अभाव खुशी और दीर्घायु दोनों को छीन लेते हैं|

उचित मात्रा में नींद खुशी और दीर्घायु प्रदान करती है| रात के दौरान न्यूनतम 7 घंटे नींद लें। लेकिन 8 घंटे से अधिक समय तक नहीं सोना चाहिये|

दिन के दौरान सोना हानिकारक है| किसी कारण से थक जाने या बीमार होने पर दिन में सोया जा सकता है|

स्वस्थ आयु के लिये आयुर्वेद स्वयं की देखभाल करने हेतु दिनचर्या सुझाता है। इनमें सुबह जागने, मल-विसर्जन, स्वच्छता, अभ्यंग, खान-पान, रहन-सहन, आवाजाही, उठाना-बैठना आदि शामिल हैं।

सोना, जागना, मुंह, दांतों, आँखों, नाक, कान और त्वचा की देखभाल, सफाई प्रक्रिया, योग आदि भी इसी चर्या के अंग हैं। ये सभी दिन, रात और मौसम (दिनचर्या, रात्रिचर्या,ऋतुचर्या) के अनुसार सर्कैडियन रिद्म के साथ तारतम्य बनाते हुये उम्र-आधारित रोगजनन को रोके रहते हैं।

उदाहरण के लिये हल्के गुनगुने महानारायण तेल से नियमित अभ्यंग अच्छे स्वास्थ्य को बनाये रखने और बढ़ती उम्र के साथ होने वाले रोग परिवर्तनों को विलंबित करने में फायदेमंद होगा।

अभ्यंग को नियमित रूप से दैनिक या कम से कम साप्ताहिक जीवनशैली में शामिल किया जा सकता है क्योंकि यह दोषों के संतुलन को पुनर्स्थापित करते हुये कल्याणकारी दीर्घायु प्रदान करता है|

प्रत्येक सुबह अणु तेल की कुछ बूंदों से प्रतिमर्श नस्य उपयोगी है। नस्य के लिये घी या तिल तेल भी उपयोगी होते हैं| यह वायरल संक्रमण को दूर रखने में सक्षम बनाता है और स्वास्थ्य के अनेक लाभ देता है|

हमें योग—आसन, प्राणायाम और ध्यान—में भी प्रतिदिन निवेश करना चाहिये। सप्ताह में कम से कम 150 मिनट व्यायाम में भी निवेश करना चाहिये।

व्यायाम हमेशा अपनी शक्ति या बल के आधे तक या व्यक्तिगत क्षमता के आधे तक करना चाहिये, ज़्यादा नहीं| व्यायाम बहुत थकावट के स्तर तक नहीं करना चाहिये।

जैविक घड़ी और सर्कैडियन लय-ताल के अनुसार दिनचर्या स्वास्थ्य के लिये बहुत प्रभावी है| असल में यह पूरी कवायद उम्र बढ़ने के साथ रोगजनन को रोकती है और प्रमाण-आधारित है।

दिनचर्या की अक्षुण्णता दीर्घायु और स्वास्थ्य प्रदान करती है| साथ ही सर्कैडियन लय में गड़बड़ी के कारण थकान, भटकाव, अनिद्रा और कई बीमारियों के लिये बढ़ते जोखिम को कम कर सकती है। योग और व्यायाम भी संतुलन बहाल करते हैं।

ऊतकों या धातुओं के पोषण व शक्ति के लिये पंचकर्म या शुद्धि और कायाकल्प बहुत उपयोगी है| उम्र-संबंधी रोगजनन को रोकने में भी बहुत उपयोगी है।

इसी तरह रसायन भी आयुर्वेद के चमत्कार हैं जो दीर्घायु, स्मृति, बुद्धिमत्ता, बीमारी से लड़ने की क्षमता, शरीर की चमक, रंग और आवाज, शक्ति, वाणी, आदि तमाम लाभ प्रदान करते हैं।

रसायन शरीर की कोशिकाएं और ऊतकों को उत्कृष्ट स्थिति में रखते हैं। रसायन आज तक ज्ञात सर्वोत्तम और सुरक्षित एंटीऑक्सीडेंट हैं|

इन विषयों की विविधता को देखें तो सबसे पहले आयुर्वेद में स्वास्थ्य-रक्षण के विविध आयामों पर विश्लेषण किया जायेगा।

अस्वास्थ्यकर जीवनशैली के कारण रोगोत्पत्ति एवं उनसे निपटने में वैश्विक वित्तीय बोझ का आंकलन भी किया जायेगा है।

इसके साथ ही आयुर्वेद द्वारा जीवनशैली-आधारित रोगों से निपटने के लिये विविध सुझाव और उनकी उपयोगिता, आधुनिक शोध और अनुभवजन्य ज्ञान आदि सब प्रस्तुत होंगे।

स्वास्थ्य-रक्षण के साथ ही उन रोगों पर विशेष विश्लेषण भी किया जायेगा जो बायोमेडिकल चिकित्सा पद्धति को दी गई भारी प्राथमिकता एवं बजट के बावजूद विश्व को निरंतर बीमार करते जा रहे हैं।

इनमें मोटापा, हृदय रोग, मानसिक रोग, कैन्सर, मधुमेह, एवं श्वसन तंत्र आदि के रोग शामिल हैं। इन रोगों के सन्दर्भ में ही जीवनशैली, पंचकर्म एवं रसायन चिकित्सा आदि का प्रमाण-आधारित विश्लेषण भी किया जायेगा।

चयनित रोगों और उनसे बचने के लिये आयुर्वेद, शोध, और अनुभव से प्रमाणित सलाह का निरंतर समावेश किया जायेगा।

सात-रक्षा दीवारों की इस श्रंखला में आयुर्वेद के उस समेकित स्वरूप की चर्चा होगी जिसमें दिनचर्या, रात्रिचर्या, स्वास्थ्यवृत्त, मानसिक सद्वृत्त, चारित्रिक सद्वृत्त, सामाजिक सद्वृत्त, योग, ध्यान और प्राणायाम आदि शामिल होंगे।

इस प्रकार रोग-विशेष पर ध्यान केन्द्रित कर उससे बचाव के लिये आयुर्वेदोक्त सलाह का विश्लेषण और साथ ही आहार-विहार आदि के पृथक-पृथक घटकों को प्रस्तुत करते हुये उनके पालन से विविध रोगों से बचाव का समग्र विश्लेषण भी किया जायेगा।

देश, काल और वातावरण की आवश्यकता के अनुरूप शहरी प्रदूषण जैसी कुछ विशेष समस्याओं का आँकलन करते हुये आयुर्वेदोक्त समाधन प्रस्तुत किया जायेगा।

उदाहरण के लिये वायु, जल, देश एवं काल के प्रदूषण के कारण होने वाले जनपदोध्वंस (सोसायटल कोलैप्स, कल्चरल कोलैप्स, एपिडेमिक्स) का गहन विश्लेषण आवश्यक है। यह तमाम सामग्री इस प्रकार की होगी जिसे आप अपने जीवन में प्रतिदिन उपयोग कर सकते हैं।

वस्तुतः प्रत्येक अतिथि-संपादकीय में लेखन की उस विधि का प्रयोग होता है जो इस प्रकार के विश्लेषणों की सर्वमान्य तथा वैश्विक स्तर पर विद्वानों के मध्य स्वीकार्य विधि है|

शास्त्र, साइंस और अनुभव के साथ कोई समझौता न करते हुये भी भाषा की सहजता का ध्यान रखा जाता है| प्रत्येक सप्ताह सबसे पहले जनोपयोगी विषय का चयन किया जाता है|

फिर उस विषय पर आयुर्वेद के 5000 साल के इतिहास में उपलब्ध संस्कृत साहित्य का अनुशीलन, आयुर्वेद और औषधीय पौधों पर विश्व की सर्वाधिक प्रतिष्ठित शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित लगभग 1,50,000 शोधपत्रों के डेटाबेस में से संबंधित विषय पर प्रकाशित शोध को भी सार-रूप में समाहित किया जाता है|

तत्पश्चात इस विषय पर अनुभवजन्य ज्ञान को समाहित करते हुये प्रारंभिक ड्राफ्ट तैयार होता है| इस ड्राफ्ट को रिव्यू और फीडबैक के लिये देश के लगभग 1500 आयुर्वेदाचार्यों के मध्य रखकर उनके विचार आमंत्रित किये जाते हैं|

और अंततः जितनी भी टिप्पणियां और फीडबैक मिलते हैं, उनको समाहित करते हुये एक समग्र-दृष्टिकोण युक्त आलेख अतिथि-संपादकीय के रूप में प्रकाशित होता है।

आयुर्वेद जैसे तकनीकी और गूढ़ वैज्ञानिक विषय पर विश्लेषण तैयार करने की यह उत्तम विधि है|

मेरे लिये ज्ञान की यह व्यक्तिगत यात्रा अब व्यक्तिगत नहीं रही| बहुत लोग साथ हो चले हैं| ज्ञान का उत्पादन स्वान्तःसुखाय और समस्या-समाधान दोनों ही कारणों से हो सकता है|

अतः यह भी देखना आवश्यक है कि इन संक्षिप्त आलेखों का जनसामान्य, आयुर्वेदाचार्यों या अन्य स्टेकहोल्डर्स के मघ्य क्या प्रभाव पड़ा? इन आलेखों की अखबार के माध्यम से लोगों तक पहुंच सुनिश्चित तो होती ही है, सोशल मीडिया के इस युग में किसी विचार की पहुंच का दायरा बहुत बढ़ जाता है।

यह आलेख प्रत्येक सप्ताह एक लाख से अधिक लोगों तक, जिनमें इलेक्ट्रॉनिक ग्रुप्स से जुड़े 35000 आयुर्वेदाचार्य सम्मिलित हैं, पहुंचता है|

सोशल मीडिया के माध्यम से आगे के सर्कुलेशन को गणना में शामिल करें तो यह संख्या और भी बड़ी होगी। तात्पर्य यह है कि प्रत्येक अतिथि-संपादकीय की सुव्यवस्थित पहुंच है।

विद्वानों के इन तमाम समूहों तथा अन्य सोशल-मीडिया से प्रत्येक सप्ताह उपयोगिता तथा महत्व पर औसतन 1500 टिप्पणियां मिलती हैं| सबका सार यह है कि इन पृष्ठों पर उपलब्ध जानकारी को कार्य से जोड़े जाने के निर्विवाद और ठोस प्रमाण हैं|

आयुर्वेदाचार्यों के मध्य हाल ही में किये गये एक संक्षिप्त सर्वे में प्राप्त फीडबेक में भी उपयोगिता सिद्ध होती है। न केवल आयुर्वेदाचार्यो ने अपने कार्य में समय समय पर इस जानकारी का उपयोग किया है, बल्कि आम आदमी ने आयुर्वेद को अपने जीवन का अंग बनाने में भी इस श्रृंखला का भरपूर उपयोग किया होगा।

थोड़ी सी व्यक्तिगत बात की जाये तो आयुर्वेद मेरे लिये आजीविका का नहीं बल्कि जीने का साधन है| आयुर्वेद मेरे उस विश्वास का प्रतीक है जिसका मानना है कि युक्ति से उम्र बढ़ाई जा सकती है।

युक्ति से स्वस्थ रहा जा सकता है| मेरे लिये आयुर्वेद एक कोरी आस्था नहीं बल्कि ठोस प्रमाण पर आधारित आयु का विज्ञान है। आयुर्वेद की संहिताओं की समझ मेरे लिये केवल वाच्यार्थ तक सीमित नहीं है|

यह ठोस आधुनिक वैज्ञानिक संदर्भ में फलितार्थ को समझते हुये सत्य तक पहुँचने की व्यक्तिगत यात्रा है। आयुर्वेद मेरे लिये सार्वभौमिक कल्याण के सिद्धांत का अद्वितीय उदाहरण भी है|

मेरे लिये आयुर्वेद उस महावाक्य का जीता-जागता प्रमाण है जिसे महर्षि अग्निवेश ने “सत्यो नाम यथार्थभूतः” कहा है (च.वि.8.38)| असल में आयुर्वेद मेरे लिये व्यक्तिगत ऑपरेटिंग मैनुअल भी है|

एक बार पुनः यह बताना उचित होगा कि पत्रकारिता और विज्ञान के साझा सर्वोच्च वैश्विक मूल्यों और मानदंडों के अनुरूप यहां प्रस्तुत प्रमाण-आधारित सामग्री में आप निष्पक्षता, सत्यवादिता, पारदर्शिता, न्यायप्रियता, उत्तरदायित्व, प्रामाणिकता और स्पष्टोक्ति पायेंगे।

परन्तु केवल ज्ञान की उपलब्धता स्वास्थ्य में सुधार नहीं ला सकती। इस जानकारी का उपयोग आप अपनी आयु को हितकारी एवं सुखकारी बनाने में करेंगे तभी लाभ है। ज्ञान को कार्य से जोड़ना और जीवन में आत्मसात करना आवश्यक है।

आयुर्वेद पर जितनी अधिक चर्चा हो उतनी ही उपयोगी है| आयुर्वेद के जनोपयोगी विषयों की यह यात्रा जारी रहेगी| आयुर्वेद में ज्ञान तो बहुत उपलब्ध है पर भारतीय समाज ने इस ज्ञान को ऐसा भुलाया कि आज भारत अनेक रोगों की वैश्विक राजधानी बनता जा रहा है।

यहां प्रस्तुत की जाने वाली जानकारी इन समस्याओं से मुक्त रहने में निरंतर आपकी मदद करती रहे, यही कामना है।

जब एक व्यक्ति गलती करता है तो वह केवल स्वयं बीमार होता है, जब समाज प्रज्ञापराधी होता है तो सामाजिक-सांस्कृतिक, पारिस्थितिक और आर्थिक व्यवस्था चौपट हो जाती है, और जब शासन-व्यवस्था प्रज्ञापराधी होने लगती है तो जनपदोध्वंस होता है।

भारतीय समाज ने आयुर्वेद के ज्ञान को ऐसा भुलाया कि आज भारत अनेक रोगों की वैश्विक राजधानी बनता जा रहा है। यहाँ प्रस्तुत की गयी जानकारी इन समस्याओं से मुक्त रहने में निरंतर आपकी मदद करती रहे, यही कामना है।

यहाँ दिये गये सुझाव बहुत संक्षेप में हैं पर शुरुआत करने के लिये पर्याप्त हैं| आने वाले एक वर्ष तक इन विषयों पर संहिताओं, साइंस और अनुभव की त्रिवेणी के संगम से उपजी जानकारी को समाहित करते हुये विस्तार से प्रकाश डालेंगे|

अपने आयुर्वेदाचार्य के साथ मिलकर आप इस जानकारी का उपयोग स्वयं को स्वस्थ रखने में कर पायेंगे ऐसी आशा है|

डॉ. दीप नारायण पाण्डेय
(इंडियन फारेस्ट सर्विस में वरिष्ठ अधिकारी)
(यह लेखक के निजी विचार हैं और ‘सार्वभौमिक कल्याण के सिद्धांत’ से प्रेरित हैं|)