sambhar lake news and photo of bieds death
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अमेरिका एक ऐसा देश है जहाँ एवियन बोटुलिज़्म का इतिहास बहुत पुराना और बहुत भयावह है| शोधपत्रों में उपलब्ध जानकारी से स्पष्ट होता है वर्ष 1910 में उटाह और कैलिफ़ोर्निया में एक साथ तकरीबन दस लाख से ज्यादा जलीय पक्षियों की मृत्य हुई थी|

तब से लेकर अभी तक इस बीमारी के लिये जिम्मेदार बैक्टीरिया क्लोस्ट्रीडियम बोटुलिनम पर विश्व भर में आज तक 6,821 शोधपत्र प्रकाशित हो चुके हैं| इनमें से 350 से अधिक शोधपत्र एवियन बोटुलिज़्म पर हैं|

यूएसजीएस नेशनल वाइल्डलाइफ हेल्थ सेंटर ने 1971 और 2005 के बीच पैथोलॉजिकल जांच और आंकड़ों के विश्लेषण में जलीय पक्षियों की मृत्यु की कुल 3619 घटनाओं का दस्तावेजीकरण किया|

इन आंकड़ों से ज्ञात होता है कि 23 फैमिलीज़ में वर्गीकृत 158 जलीय पक्षी प्रजातियों के कम से कम 6,33,708 मरे पाये गये|

पर्यावरणीय और जलवायुवीय कारकों के साथ ही बोटुलिनम बायोटॉक्सिन (सी और ई) इन मौतों का प्रमुख कारण रहा है। पिछले 30 सालों के आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि बायोटॉक्सिन, वायरल, और बैक्टीरियल रोगों के कारण अमेरिका में 50 लाख से अधिक जलीय पक्षियों की जानें गयीं।

एवियन बोटुलिज़्म की एकल घटना के कारण पक्षियों के नुकसान के उदाहरण पूरी दुनिया में पाये गये हैं|

इनमें से अमेरिका के उटाह में 1980 में 1,05,000 पक्षी, 1982 में कैस्पियन सागर (तत्कालीन रूस के गुरयेव क्षेत्र में) में लगभग 10,00,000 पक्षी, 1997 में कनाडा की ओल्ड वाइव्स लेक में लगभग 10,00,000 पक्षी एवियन बोटुलिज्म के कारण मरे थे।

ये मात्र कुछ ही उदाहरण हैं। विश्व भर के शोध पत्रों में ऐसे अनेक उदाहरण भरे पड़े हैं।

संयुक्त राज्य अमेरिका के ग्रेट लेक्स में 1960 के दशक के बाद से एवियन बोटुलिज़्म टाइप ई का समय समय पर अनेक बार प्रकोप हजारों की संख्या में पक्षियों की मृत्यु के लिये जिम्मेदार रहा है।

हाल के वर्षों में ये घटनायें अधिक आम और व्यापक हो गई हैं। अक्सर यह पाया गया है कि जब जब झील के तापमान में बढ़त और जल स्तर में कमीं होती है, तब तब इन मौतों की संख्या बढ़ जाती है। इसका तात्पर्य स्पष्ट रूप से यह है कि पर्यावरण और जलवायु की स्थिति स्थानीय मृत्यु दर बढ़ाने में महत्वपूर्ण कारक है।

लम्बे समय तक इस समस्या के निदान के लिये अमेरिका जैसा राष्ट्र जूझता रहा है। अब जाकर वर्ष 2010 में आम नागरिकों के सहयोग से एक सिटीजन साइंस प्रोग्राम जिसे एवियन मॉनिटरिंग फॉर बोटुलिज़्म लेकशोर इवेंट्स के नाम से जाना जाता है, प्रारंभ किया गया है।

असल में यह निगरानी उत्तरी लेक मिशिगन में एवियन बोटुलिज़्म टाइप ई के प्रकोप से मरे जलीय-पक्षियों के झील के तट पर आये शवों की उपस्थिति का पता लगाने के लिए प्रारंभ किया गया था।

वहां वैज्ञानिकों ने इन आंकड़ों का उपयोग यह जांचने के लिये किया कि क्या इन घटनाओं के समय पर्यावरणीय कारकों में हुआ उतार-चढ़ाव, जैसे झील के पानी का तापमान और मैक्रोएलगी या हरी काई की व्यापकता उत्तरदाई है।

पक्षियों की सामूहिक मृत्यु की दो अलग-अलग घटनाओं के दौरान एकत्र किये गए आंकड़ों से वैज्ञानिकों को यह स्पष्ट हुआ कि पक्षियों की मृत्यु दर झील की सतह के पानी के तापमान में उतार-चढ़ाव और हरी काई के प्रसार से तालमेल खाती है।

जब जब झील का तापमान बढ़ता है और काई का फैलाव बढ़ता है तब तक एवियन बोटुलिज़्म के कारण भारी संख्या में जलीय पक्षियों की मृत्यु होती है।

भविष्य के लिये वैज्ञानिकों का सुझाव यह था कि आगे व्यापक मृत्यु दर की घटनाओं से जुड़ी संभावित पर्यावरणीय स्थितियों की पहचान करने और जलीय पक्षियों की आबादी के लिए भविष्य के जोखिम का अनुमान लगाने के लिए लोगों की मदद से सतत निगरानी आवश्यक है।

यह निगरानी आने वाले समय में और भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि क्लाइमेट चेंज के अनेक दुष्प्रभावों में से एवियन बोटुलिज़्म में गंभीर बढ़ोत्तरी भी एक है|

फिलहाल पूरी दुनिया में इस समस्या से निपटने के लिए जो विधि अपनाई जाती है वह यह है कि जैसे ही मरे हुए पक्षी मिलते हैं उन्हें तत्काल एकत्र कर जमीन में गाड़ दिया जाता है या जला दिया जाता है।

सन्दर्भ–
Princé, K., J. G. Chipault, C. L. White and B. Zuckerberg (2018). “Environmental conditions synchronize waterbird mortality events in the Great Lakes.” Journal of Applied Ecology 55(3): 1327-1338.

Mooij, W. M., S. Hülsmann, L. N. De Senerpont Domis, B. A. Nolet, P. L. E. Bodelier, P. C. M. Boers, L. M. Dionisio Pires, H. J. Gons, B. W. Ibelings, R. Noordhuis, R. Portielje, K. Wolfstein and E. H. R. R. Lammens (2005). “The impact of climate change on lakes in the Netherlands: A review.” Aquatic Ecology 39(4): 381-400.

Friend, M., R. G. McLean and F. J. Dein (2001). “Disease emergence in birds: Challenges for the twenty-first century.” Auk 118(2): 290-303.

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