Jaipur

राजस्थान स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय यानी आर यू एच एस में डॉक्टरों समेत करीब 200 से ज्यादा कर्मचारी अपनी मासिक तनख्वाह के लिए तरस गए हैं।

विश्वविद्यालय के CAO युगांतर कुमार की जिद के आगे कर्मचारियों की एक नहीं चल रही है।

शनिवार को हालात यह हो गए कि कर्मचारी और डॉक्टर आंदोलन पर उतर गए और CAO ने परिसर में पुलिस बुला ली।

आंदोलन के बाद दोनों तरफ से मामला तूल पकड़ने लगा तो विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर राजा बाबू पंवार ने मामले को संभाला और आपात बैठक बुलाकर कर्मचारियों को जल्द सैलरी देने का आश्वासन दिया।

किंतु इसके बाद भी डॉक्टरों और कर्मचारी पीछे नहीं हटे, सभी ने एक स्वर में मांग की कि पहले CAO युगांतर कुमार को विश्वविद्यालय से रिलीव किया जाए, उसके बाद सैलरी की बात की जाए।

बताया जा रहा है कि जब से युगांतर कुमार ने विश्वविद्यालय में CAO का कार्यभार संभाला है, तब से आरयूएचएस अस्पताल और कॉलेज में एक भी टेंडर नहीं हुआ है।

सभी टेंडर CAO युगांतर कुमार की टेबल पर जाकर दम तोड़ देते हैं। डॉक्टरों का कहना है कि CAO की जिद के कारण एक तरफ जहां अस्पताल मृत प्राय हो चुका है, तो दूसरी तरफ मेडिकल कॉलेज की हालत खस्ता है।

बावजूद इसके CAO अपनी जिद पर अड़े हुए हैं और टेंडर नहीं होने दे रहे हैं। डॉक्टरों और कर्मचारियों की तनखा का समय बीते आज 7 दिन हो चुके हैं, किंतु अभी भी वे अपने वेतन को तरस रहे हैं।

गौरतलब है कि राजस्थान स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय अस्पताल और मेडिकल कॉलेज की स्थापना होने के बाद इस अस्पताल को इसी साल शुरू किया गया था।

एसएमएस मेडिकल कॉलेज अस्पताल के विकल्प के रूप में स्थापित किए गए इस अस्पताल की हालत यह है कि यहां पर दवा काउंटर होने के बावजूद न तो दवाइयां उपलब्ध है और ना ही जांचे हो रही है।

रजिस्ट्रेशन के लिए केवल एक व्यक्ति बैठा रहता है और डॉक्टरों की कमी से जूझ रहे। इस अस्पताल के बंद होने की स्थिति हो गई है।

करीब 400 करोड़ की लागत से बने इस भव्य अस्पताल पर न तो सरकार की नजर है और CAO भी इसके विकास में बाधक बने हुए हैं, जिसके कारण डॉक्टर और कर्मचारी आंदोलनरत हैं।

सवाई मानसिंह अस्पताल के बाद सबसे बड़ी बिल्डिंग और सबसे अधिक संसाधनों के साथ शुरू किए गए आरयूएचएस अस्पताल के एक और बंद होने की नौबत आ गई है तो दूसरी तरफ इसके कारण सरकार के द्वारा स्वास्थ्य को लेकर किए जाने वाले तमाम दावे भी मिथ्या साबित हो रहे हैं।

कहा तो यहां तक जा रहा है कि सीकर रोड पर राजस्थान के सबसे पहले ट्रॉमा सेंटर को बाद में सोनी मणिपाल अस्पताल को बेचने और उसके बाद मानसरोवर स्थित ट्रॉमा सेंटर को निजी हाथों में सौंपने के बाद अब आरयूएचएस अस्पताल को भी प्राइवेट हाथों में देने की तैयारी कर ली गई है।

इसी का नतीजा है कि यहां पर सरकार CAO के माध्यम से टेंडर प्रक्रिया को बाधित कर रही है, ताकि यहां पर मरीजों की आवाजाही बंद हो और इस बात का मौका मिल सके कि यह अस्पताल सरकारी हाथों में संचालित नहीं हो सकता।

इसके बाद जैसे अमूमन दूसरे कार्य किए जाते हैं, ठीक उसी तरह इस अस्पताल को मंत्रियों और अफसरों के द्वारा अपने चहेते लोगों को संचालित करने के लिए ठेके पर दे दिया जाएगा।

अब सवाल खड़ा यह होता है कि जब सरकार को निजी हाथों में अस्पताल सपना ही था तो इस पर 400 करोड रुपए की खर्च करने की क्या जरूरत थी।

सबसे बड़ा सवाल यह है की राजस्थान की राजधानी के बीचो-बीच बने इस भव्य अस्पताल को सरकार शुरू होने से पहले ही प्राइवेट हाथों में सौंप कर क्या संदेश देना चाहती है।