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जयपुर। राजस्थान विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. आरके कोठारी का कभी भी इस्तीफा हो सकता है। उनपर न केवल सरकार की तरफ से, बल्कि विवि में छात्रों के प्रतिनिधियों ने भी मोर्चा खोल दिया है।

विवि के शोध छात्र प्रतिनिधि रामसिंह सामोता ने आज अभियान शुरू करते हुए कुलपति का पुतला फूंका। उसके बाद राज्यपाल कल्याण को को अपनी 11 सूत्री मांगों को लेकर ज्ञापन दिया।

विवि सूत्रों के अनुसार कुलपति और कांग्रेस सरकार के बीच पटरी बैठ नहीं रही है। कुलपति को आरएसएस का आदमी माना जाता है।

राज्य में सरकार बदलने के साथ ही इस बात की आशंका व्यक्त की जा रही थी, कि कुलपति को इस्तीफा देना पड़ सकता है।

इसपर कुलपति ने हमेशा खंडन किया। लेकिन सूत्र बताते हैं कि कुलपति पर अब दबाव बहुत बन चुका है।

पांच कुलपति बदले, कार्यकाल हमेशा अधूरा

गौरतलब है कि इससे पहले 2013 में राज्य की सरकार बदलने के साथ ही तत्कालीन कुलपति डॉ. देवस्वरूप को इस्तीफा देकर वापस यूजीसी में लौटना पड़ा था।

यह भी बता दें कि विवि में पांच कुलपतियों के कार्यकाल की बात करें एक भी वाइस चांसलर ने अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया है।

बीएल शर्मा के द्वारा छोड़कर जाने के बाद संभागीय आयुक्त को काम सौंपा गया। फिर यूजीसी के संयुक्त सचिव डॉ. देवस्वरूप को कुलपति बनाया गया, लेकिन 2013 में सरकार बदलने पर उनको भी इस्तीफा देना पड़ा।

फिर से कार्यभार संभागीय आयुक्त को काम सौंप दिया गया। कुछ उसके बाद जेपी सिंघल को कुलपति बनाया, लेकिन मामला कोर्ट में चैलेंज हो गया। इसके बाद बीच में ही सिंघल को इस्तीफा देना पड़ा।

इसके बाद फिर से विवि संभागीय आयुक्त के पास चला गया। राज्य सरकार ने मशक्कत कर प्रो. आरके कोठारी को कुलपति बनाया गया, जिनका करीब एक साल का कार्यकाल बाकी है, लेकिन दबाव फिर बनने लगा है।

इन मांगों को लेकर इस्तीफे की मांग

अब रामसिंह सामोता ने कुलपति से इस्तीफा मांगा है। उन्होंने आरोप लगाया है कि मानवीकी पीठ के लिए 5 करोड़ रुपए आए, लेकिन 2 साल बाद अभी तक काम शुरू नहीं किया गया।

17 करोड़ रुपए सेंट्रल लाइब्रेरी के लिए मिले, लेकिन 3 साल में काम अधूरा है। रिसर्च फेलोशिप के पैसे नहीं मिल रहे। हर साल एक करोड़ रुपए शोधार्थियों के एचआरए के कट जाते हैं, लेकिन विवि को नहीं मिल रहे।

सीसीटीवी नहीं है, रोजाना चोरियां हो रही हैं। महिला गार्ड नहीं है, जिसके चलते महिला छात्रावासों में पुरुष गार्ड काम करे रहे हैंं। हर साल 4000 रुपए लिए जाते हैं, लेकिन इसका कोई हिसाब ही नहीं है।

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