जयपुर।

लोकसभा चुनाव 2019 का परिणाम आने के साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने राजस्थान में अपनी सियासी बिसात निशानी शुरू कर दी है।

चुनाव प्रचार के दौरान मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के द्वारा बार-बार आरएसएस को टारगेट करते हुए फ्रंट पर आकर खेलने के लिए आमंत्रित करना शायद अभी भारी पड़ता नजर आ रहा है।

राजस्थान की सभी 25 लोकसभा सीटों पर कांग्रेस उम्मीदवार हारने के बाद एक और जहां अशोक गहलोत बैकफुट पर नजर आ रहे हैं, वहीं भारतीय जनता पार्टी आक्रामक हो गई है।

हालांकि, इस बार भाजपा की बागडोर वसुंधरा राजे के हाथ में नहीं होकर केंद्रीय नेतृत्व के निर्देश में आरएसएस और कुछ आरएसएस जुड़े नेताओं की हाथ में नजर आ रही है।

इससे पहले पूर्व गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया ने कहा था कि 23 मई को लोकसभा का चुनाव का परिणाम आने के बाद में राजस्थान में अशोक गहलोत सरकार को इस्तीफा देना होगा, राज्य में कोई दूसरा मुख्यमंत्री शपथ लेगा।

हालांकि, उन्होंने किसी का नाम नहीं बताया। उसके कुछ ही दिनों बाद पूर्व शिक्षा मंत्री वासुदेव देवनानी ने कहा था कि कांग्रेस के 23 विधायक उनके संपर्क में है और जल्द ही राजस्थान की कांग्रेस सरकार अपना स्थान छोड़ने वाली है।

ताजा घटनाक्रम के तहत राजस्थान में आरएसएस को सक्रिय बताया जा रहा है। कहा जा रहा है कि आरएसएस के कई पदाधिकारी इस काम में जुटे हुए हैं और सबसे पहले स्वर्ण जातियों से कांग्रेस में जो विधायक हैं, उनसे संपर्क किया गया है।

उनको कांग्रेस पार्टी साथ छोड़कर बीजेपी के पक्ष में लाने का प्रयास तेज कर दिया गया है। विधायकों को मंत्री पद से और कई अन्य प्रलोभन दिए जाने की चर्चा बीजेपी और कांग्रेस मुख्यालय में होने लगी है।

आज ही कांग्रेस पार्टी के राजस्थान प्रभारी अविनाश पांडे ने भारतीय जनता पार्टी पर आरोप लगाते हुए कहा है कि भाजपा राजस्थान की कांग्रेस सरकार को अस्थिर करने में लगी हुई है।

दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष मदन लाल सैनी ने इस बात को सिरे से खारिज किया है। उन्होंने कहा कि कांग्रेसी खुद अपने ही कर्मों से मरने वाली है, भाजपा को इसके लिए कुछ करने की आवश्यकता नहीं है।

बहरहाल दोनों की तरफ से आरोप-प्रत्यारोप के दौर चल रहे हैं, जिसमें से अभी तक तस्वीर साफ नहीं हो रही है, लेकिन इतना तय है कि आने वाले कुछ ही दिनों में राजस्थान की सियासत बड़ी करवट ले सकती है।