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-जो भी मुख्यमंत्री बनेगा, चार महीनों में करके दिखाना होगा काम

जयपुर।

नई दिल्ली में राम मंदिर के निर्माण के लिए आयोजित धर्मसभा में एकत्रित संतों ने कहा है कि अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के बाद ही देश में रामराज्य की स्थापना हो पाएगी।

पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव संपन्न हो चुके हैं और छह महीनों बाद लोकसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में कहा जा रहा है कि देश की सत्ता पर काबिज होने के लिए राम मंदिर निर्माण के पूर्व ही राम राज्य की परिकल्पना को जिसने साकार कर दिया, वहीं जीत की ओर अग्रसर हो सकता है।

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विश्लेषकों का कहना है कि पूरे देश के मतदाता उस दौर से गुजर रहे हैं, जबकि उन्होंने पिछले चुनावों में एक दल को बहुमत देकर केंद्र और राज्यों में बहुमत से सरकारें बनवाई, लेकिन सत्ता में आते ही राजनेताओं ने वोटरों को भुला दिया, जिससे वह नाराज हैं।

इसकी बानगी पांच राज्यों के चुनावों में देखने को मिली। चुनाव परिणाम इस नाराजगी पर मुहर लगाएंगे। देश का हर वर्ग किसी न किसी तरह से त्रस्त है और इसका सीधा असर 2019 के लोकसभा चुनावों में भी देखने को मिलेगा।

क्या है रामराज्य की परिकल्पना
रामराज्य की परिकल्पना का सीधा फंडा यह है कि वह राज्य जहां आम जनता अमन-चैन से रहे।

युवाओं के पास रोजगार हो, महिलाओं की सुरक्षा हो, विभिन्न संप्रदायों और जातियों में किसी प्रकार का विवाद नहीं हो, व्यापार अच्छा चले, बच्चों को शिक्षा मिले, किसानों को उनकी मेहनत का पूरा लाभ मिले।

विधानसभा चुनावों से पूर्व राजस्थान में एक नारा चला ‘मोदी से बैर नहीं, वसुंधरा तेरी खैर नहीं’। लेकिन, इस नारे का यह अर्थ नहीं निकाल लेना चाहिए लोकसभा चुनावों में राजस्थान की जनता मोदी के पक्ष में मतदान करेगी। नाराज वोटर लोकसभा चुनावों में भी पासा पलट सकते हैं।

ऐसे में कहा जा रहा है कि राजस्थान में जिस पार्टी की भी सरकार बने, जो भी मुख्यमंत्री बने उसे काम करके दिखाना होगा और यह काम करने के लिए उनके पास सिर्फ तीन से चार महीनों का समय रहेगा।

इस दौरान उन्हें युवाओं को सरकारी नौकरियों, महिला सुरक्षा, किसानों की कर्जा माफी, सिंचाई व अन्य समस्याओं, प्रदेश में बढ़ते क्राइम की दर घटाना, शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन, व्यापार और उद्योग-धंधों का विकास, बजरी जैसे मुद्दों पर एक साथ काम करना होगा।

आकाल प्रबंधन होगी अग्नि परीक्षा
विश्लेषकों का कहना है कि प्रदेश में जिस भी दल की सरकार और जो भी मुख्यमंत्री बनता है, उसके सामने आकाल प्रबंधन सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा होगी।

इस वर्ष राजस्थान के आधे जिलों से मानसून नाराज रहा और कई जिलों में औसत से कम बारिश हुई, जिससे प्रदेश में अकाल की समस्या ने दस्तक दे दी है। मानसून की कमी के चलते खरीफ की फसलें कई जगहों पर बर्बाद हुई, वहीं रबी की फसलों पर भी संकट है। ऐसे में आकाल प्रबंधन बड़ा मुद्दा होगा।

इस मुद्दे पर किसानों की भारी नाराजगी झेलनी पड़ सकती है। ऐसे में यदि नई सरकार सही ढंग से आकाल प्रबंधन कर पाई तो उसका फायदा लोकसभा चुनावों में मिलेगा।

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