पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा भाजपा के साथ क्यों नहीं हैं?

जयपुर। राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भाजपा में रहकर भी भाजपा के साथ नहीं दिख रही हैं। पिछले लगभग एक साल से, खासकर 6 माह में तकरीबन हर कार्यक्रम के दौरान उन्होंने प्रदेश भाजपा के ज्यादातर कार्यक्रमों से दूरी बनाये रखी हैं।

गुरुवार को भी प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सतीश पूनियां के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार के खिलाफ पार्टी द्वारा ट्विटर पर हैशटैग ‘कब होगा न्याय’ अभियान चलाकर विरोध दर्ज करवाया है।

जिसमें भाजपा प्रदेशाध्यक्ष डॉ. सतीश पूनियां, नेता प्रतिपक्ष गुलाबचंद कटारिया, उपनेता प्रतिपक्ष राजेन्द्र राठौड़, केन्द्रीय मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत, कैलाश चौधरी, तमाम सांसदों, सभी विधायकों एवं पदाधिकारियों ने ट्वीट कर सक्रिय भागीदारी निभाई, लेकिन वसुंधरा ने ट्वीट ना करके अभियान से दूरी बनाये रखी।

इसके अलावा सभी जिलों में कलेक्टरों को भाजपा द्वारा दिये गये ज्ञापन कार्यक्रम में भी वसुंधरा राजे कहीं किसी जगह नजर नहीं आईं।

इससे पहले 28 अगस्त को फेसबुक पर ‘हल्ला बोल’ कार्यक्रम को लेकर भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वसुंधरा राजे ने कोई संदेश जारी नहीं किया था।

इतना ही नहीं, अपितु 29 अगस्त को ट्विटर पर चलाये गये हैशटैग ‘गहलोत सरकार होश में आओ’ अभियान से भी दो बार मुख्यमंत्री रह चुकीं वसुंधरा राजे ने दूरी बनाई थी।

इसके अलावा 31 अगस्त को प्रदेश भाजपा नेतृत्व द्वारा बिजली दरों में बढ़ोतरी सहित विभिन्न मुद्दों को लेकर राज्यभर में जीएसएस पर दिये गये ज्ञापन कार्यक्रम में किसी भी जिले के कार्यक्रम में वसुंधरा राजे शामिल नहीं हुईं।

जबकि प्रदेशाध्यक्ष, नेता प्रतपिक्ष, उपनेता प्रतिपक्ष, सांसदों, केन्द्रीय मंत्रियों, विधायकों एवं पदाधिकारियों ने सक्रिय भागीदारी निभाई थी।

दिसम्बर 2018 का विधानसभा चुनाव हारने और खासतौर पर भाजपा अध्यक्ष सतीश पूनियां को पार्टी की कमान सौंपी जाने के बाद भाजपा के सभी कार्यक्रमों से वसुंधरा द्वारा दूरी बनाये जाने को लेकर सियासी गलियारों में चर्चा है कि, राजे की निष्क्रिय बेरुखी से क्षुब्ध होकर शायद पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व से लेकर प्रदेश नेतृत्व ने भी वसुंधरा से दूरी बनाने का निर्णय ले लिया है।

यह भी पढ़ें :  सरकार बनते ही मंत्री के लिए हुई आफत, तबादलों को लेकर दे रहे हैं जवाब

भले ही वसुंधरा पार्टी में हैं, लेकिन केन्द्र के टॉप तीनों नेताओं से लेकर प्रदेश का नेतृत्व भी उन्हें अब पार्टी के किसी कार्यक्रमों में प्रमुखता नहीं दे रहा है। भले ही प्रदेश के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के साथ अध्यक्ष पूनियां का वर्चुअल संवाद हों या कोई अन्य कार्यक्रम हो।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जन्मदिवस को ‘सेवा सप्ताह’ के रूप में मनाने को लेकर पार्टी का प्रदेश नेतृत्व तैयारियों में जुटा है, जिसको लेकर अध्यक्ष पूनियां द्वारा कोरोना वायरस से पीड़ित होने के बाद भी लगातार वर्चुअल बैठकें की गई हैं, उनमें भी वसुंधरा की उपस्थिति नहीं रहीं हैं।

इन सबको देखते हुए वसुधंरा के राजनीतिक भविष्य को लेकर प्रदेश के सियासी गलियारों में तमाम चर्चा है कि आखिर क्यों वसुंधरा राजे जैसी सीनियर नेत्री भाजपा प्रदेश नेतृत्व के कार्यक्रमों से दूर कांग्रेस सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ पार्टी द्वारा चलाये जा रहे ‘हल्ला बोल’ अभियान में शामिल ना होकर वसुंधरा राजे राज्य के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की सरकार को मौन समर्थन दे रही हैं?

यह चर्चायें गहलोत-पायलट विवाद के दौरान भी चलीं थीं, जब बार-बार मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उनके खास मंत्री प्रतापसिंह खाचरियावास द्वारा वसुंधरा राजे को सबसे बड़ी नेता और प्रदेश की कमान सौंपने की मुफ्त सलाह दी जा रही थीं।

इसके बाद जब वे भाजपा के द्वारा सदन में सरकार के विश्वासमत हासिल करने के दौरान व्हिप जारी कर वोटिंग के वक्त अपने सभी विधायकों को उपस्थित रहने के सख्त निर्देश दिए गए थे, तब आदिवासी क्षेत्र से आने वाले पार्टी के 4 विधायकों के गायब होने के मामले को लेकर भी वसुंधरा राजे पर अपने ही दल में अविश्वास की अंगुलियां उठती रही हैं।