अशोक गहलोत सरकार बचते ही वसुंधरा राजे क्यों हुईं हमलावर?

जयपुर। राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच 1 महीने तक चली खींचतान का अंत हो गया है।

इस दौरान कांग्रेस पार्टी दो दलों में भटकी हुई और एक दूसरे पर हमले करती हुई उस स्तर तक पहुंच गई, जहां पर राजनीति में किसी भी व्यक्ति के लिए कोई जगह नहीं हो सकती है।

बावजूद इसके कांग्रेस आलाकमान के द्वारा कथित तौर पर सचिन पायलट को मनाकर उनको वापस पार्टी में लेने का और उनके साथ ही विधायकों को सम्मानजनक पद देने का वादा किया है।

जैसे ही सोमवार को कांग्रेस में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच कथित तौर पर सुलह हुई तो उसके कुछ ही देर बाद राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वसुंधरा राजे के द्वारा सरकार पर हमला करते हुए इस महीने का पहला ट्वीट किया गया।

ऐसा लग रहा था, मानो वसुंधरा राजे केवल इसी बात का इंतजार कर रही थीं कि अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच जैसे ही सुलह होगी, सरकार की स्थिति जैसे ही पटरी पर लौटेगी, उसके बाद वह खुद भी अपनी राजनीतिक गतिविधियों को अंजाम देना शुरू कर देंगी।

आपको बता दें कि पिछले एक महीने के दौरान जब से कांग्रेस में लड़ाई शुरू हुई है, तब से लेकर अब तक वसुंधरा राजे ने ट्वीट और फेसबुक के माध्यम से तमाम तरह के त्यौहार और शहीदों, स्वतंत्रता सेनानियों और भाजपा के नेताओं के ट्वीट को रिट्वीट करने का और बयान देने का काम किया, लेकिन उन्होंने कभी भी इस दौरान अशोक गहलोत की सरकार पर किसी भी तरह का हमला नहीं किया।

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इससे जाहिर होता है कि वसुंधरा राजे चाहे अशोक गहलोत की सरकार को स्थिर करना नहीं चाहती हों, लेकिन इतना तय नजर आ रहा है कि उनके द्वारा परोक्ष रूप से अशोक गहलोत की सरकार को बचाने का काम जरूर किया गया है।

उल्लेखनीय है कि कुछ ही दिनों पहले वसुंधरा राजे को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के द्वारा दिल्ली तलब किया गया था। सूत्रों का दावा है कि उसके बाद राजस्थान के मीडिया के माध्यम से खबरें प्रसारित करवाई गईं कि वसुंधरा राजे अपनी शर्तों को मनवाने के लिए भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व पर दबाव बना रही हैं।

हालांकि, यह भी बातें सामने आईं कि तमाम तरह की खबरों को प्रचारित और प्रसारित करने के लिए एक विशेष प्रकार के सोशल मीडिया ग्रुप का इस्तेमाल किया गया और उसके द्वारा वसुंधरा राजे के पक्ष में खबरें लिखने और राष्ट्रीय व राज्य मीडिया में उनको पब्लिश करवाने और टेलीविजन में प्रसारित करवाने के लिए सुनियोजित तरीके से काम किया गया।

जिसका नतीजा यह हुआ कि जहां एक तरफ वसुंधरा राजे को राष्ट्रीय नेतृत्व के द्वारा ज्यादा तवज्जो नहीं दी जाने की सूत्रों के द्वारा खबरें मिलीं, तो दूसरी ओर स्थानीय मीडिया के द्वारा ऐसा दिखाया गया, मानो वसुंधरा राजे अपनी खोई हुई राजनीतिक प्रतिष्ठा फिर से प्राप्त कर चुकी हैं और राजस्थान में वो विजेता बनकर लौट रही हैं।

वैसे भी पिछले एक महीने के दौरान वसुंधरा राजे के द्वारा ट्वीट और फेसबुक के माध्यम से जो बयान जारी किए गए, उनमें कहीं भी नहीं लग रहा था कि वसुंधरा राजे अशोक गहलोत सरकार के खिलाफ आंदोलन कर रही भाजपा के साथ खड़ी हुई नजर आ रही हैं।

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यहां तक कि तमाम तरह की पार्टी में टूट फूट की खबरों के बावजूद वसुंधरा राजे ने ट्विटर या फेसबुक के माध्यम से ऐसा कोई बयान जारी नहीं किया, जिससे साबित होता है कि राजस्थान भाजपा एक सूत्र में बंधी हुई है और वसुंधरा राजे ऐसी भाजपा का हिस्सा हैं।

एक तरफ जहां भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डॉ सतीश पूनिया, नेता प्रतिपक्ष गुलाबचंद कटारिया, उप नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र सिंह राठौड़ और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने लगातार अशोक गहलोत की सरकार को सवालों के दायरे में रखा, तो दूसरी तरफ पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष होने के बावजूद, कद्दावर नेता होने के बावजूद वसुंधरा राजे के द्वारा अशोक गहलोत की सरकार कोई सवाल नहीं करना लोगों के गले नहीं उतर रहा है।

भाजपा की दिल्ली सूत्रों का दावा है कि भले ही वसुंधरा राजे ने अशोक गहलोत सरकार का बचाव नहीं किया हो, लेकिन इतना तय है कि भाजपा के साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चलने के कारण वसुंधरा राजे ने परोक्ष रूप से अशोक गहलोत की सरकार को फायदा पहुंचाने का काम जरूर किया है।

इस बात को लेकर भाजपा के प्रदेश स्तर के तमाम नेताओं के द्वारा लगातार वसुंधरा राजे का बचाव किया गया है।

भाजपा के अध्यक्ष, नेता प्रतिपक्ष, उप नेता प्रतिपक्ष ने भी हमेशा कहा है कि वसुंधरा राजे उनकी नेता हैं और वह जब चाहेंगी, तब राजस्थान में सक्रिय हो जाएंगी और भाजपा में वसुंधरा राजे को लेकर किसी तरह का कोई अंतरकलह नहीं है, किसी तरह के दो फाड़ नहीं है, दो खेमे नहीं है, लेकिन इसके बावजूद राजनीति के जानकारों ने हमेशा वसुंधरा राजे की इस चुप्पी को अशोक गहलोत की सरकार को फायदा पहुंचाने के रूप में देखा है।

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अब, जबकि 14 अगस्त से विधानसभा का सत्र शुरू होने जा रहा है और 13 अगस्त को राजस्थान भाजपा विधानसभा में विधायक दल की बैठक होगी, उसमें वसुंधरा राजे की उपस्थिति या अनुपस्थिति भाजपा की वर्तमान स्थिति को बताने के लिए काफी होगी।