अब वसुंधरा राजे के राजनीतिक दांवपेच भाजपा पर सवाल खड़े कर रहे हैं

जयपुर। राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री और भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वसुंधरा राजे के द्वारा पिछले 1 महीने से जिस तरह से चुप्पी साधने के बाद राष्ट्रीय नेतृत्व के द्वारा बुलाने पर दिल्ली पहुंची और वहां से अपने समर्थित मीडिया के द्वारा राजस्थान के पत्रकारों के माध्यम से अखबारों और टेलीविजन में खबरें चलाई गईं, उसके बाद सवालों में घिरी कांग्रेस सरकार के साथ अब भाजपा पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं।

एक दिन पहले ही भारतीय जनता पार्टी ने अपने करीब दो दर्जन विधायकों को पोरबंदर भेजा है, वहीं रविवार को भी ऐसी खबरें सामने आईं हैं कि वसुंधरा राजे के करीबी माने जाने वाले कोटा और झालावाड़ के कुछ विधायकों को मध्यप्रदेश भेजने की योजना थी, लेकिन उन्होंने वसुंधरा राजे की अनुमति के बिना जाने से इंकार कर दिया।

इस मामले को लेकर कुछ विधायकों की तरफ से नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया गया कि उनको अगर राजस्थान नेतृत्व की तरफ से मध्य प्रदेश या गुजरात में से कहीं पर भी भेजा जाएगा, तो वो चले जाएंगे, लेकिन जिस तरह से भाजपा में बैठे हुए कुछ लोगों के द्वारा उनको राजनीतिक तौर पर कमजोर करने के लिए वसुंधरा राजे के इशारे पर चलने वाले बताए जा रहे हैं, उससे वो लोग काफी आहत हैं और इस बारे में उन्होंने प्रदेश नेतृत्व को सूचित भी कर दिया है।

इधर राजनीति में चर्चा जोरों पर है कि वसुंधरा राजे जिस तरह एक महीने तक सरकार के खिलाफ कुछ भी नहीं बोलीं और जब राष्ट्रीय नेतृत्व के द्वारा उनको दिल्ली तलब किया गया, तब अचानक से अपनी ताकत का एहसास कराते हुए कुछ विशेष प्रकार के लोगों के माध्यम से खबरें फैलाने का कार्य किया गया कि उनको बार-बार बुलाने पर ही वह दिल्ली गई हैं और उन्होंने राष्ट्रीय नेतृत्व के समक्ष अपनी शर्तों का एक पुलिंदा रख दिया है, जिस पर राष्ट्रीय अध्यक्ष को मानने पर मजबूर होना पड़ेगा।

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गहलोत के साथ राजनीतिक गठबंधन के आरोपों में घिरी हुई वसुंधरा राजे अब अपना आखिरी ब्रह्मास्त्र मीडिया के रूप में प्रयोग में ले रही हैं चर्चा यह भी है कि जिस तरह से राष्ट्रीय नेतृत्व के द्वारा खासतौर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के द्वारा बीते डेढ़ साल से वसुंधरा राजे को मिलने का समय नहीं दिया गया है, उससे वह अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर काफी घबराई हुई हैं और इसी का परिणाम है कि उन्होंने राष्ट्रीय नेतृत्व को एक बार फिर से 2018 की तरह चुनौती के रूप में ललकारने का प्रयास किया है।

किंतु भाजपा सूत्रों का दावा है कि राष्ट्रीय नेतृत्व की तरफ से जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह बार-बार रिक्वेस्ट किए जाने के बावजूद वसुंधरा राजे से मिलने को समय नहीं दे रहे हैं, वही राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के द्वारा लगातार वसुंधरा राजे की चुप्पी के मद्देनजर उनको दिल्ली तलब किया गया और फिर उनसे इस बारे में स्पष्टीकरण मांगा गया है।

बताया जा रहा है कि जिस तरह से रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष के अलावा कुछ अन्य बड़े नेताओं के साथ वसुंधरा राजे ने मुलाकात कर अपनी राजनीतिक लॉबी को फिर से जागृत करने का प्रयास किया है।

वहीं राजस्थान में वसुंधरा राजे की निष्क्रियता का सीधा फायदा अशोक गहलोत की गिरती हुई सरकार को मिल रहा है।

इसके चलते न केवल राजस्थान प्रदेश नेतृत्व को अपनी ही पार्टी में बेवजह जवाब देने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है तो दूसरी तरफ अब तक एक महीने से प्रदेश अध्यक्ष डॉ. सतीश पूनियां, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष गुलाबचंद कटारिया और उपनेता प्रतिपक्ष राजेंद्र सिंह राठौड़ के द्वारा जो राजनीतिक युद्ध अशोक गहलोत और उनकी सरकार के खिलाफ छेड़ा गया था, उसमें भी वसुंधरा राजे की वजह से कमजोरी आने की संभावना जताई जा रही है।

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हालांकि, इस बात का खुलासा हो चुका है कि भारतीय जनता पार्टी ने जिन दो दर्जन विधायकों को गुजरात शिफ्ट किया है, उनके ऊपर राजस्थान की आईपीएस और आईपीएस अधिकारियों की लोबी के द्वारा प्रेशर क्रिएट किया जा रहा था और उनको किसी भी तरह से डिफेम करने के लिए सरकार प्रयासरत थी।

जिसके बारे में पूरी जानकारी होने के कारण डॉ. सतीश पूनियां के द्वारा न केवल अशोक गहलोत की सरकार की साजिश को नाकाम किया गया, बल्कि अपने विधायकों को सुरक्षित स्थान पर भी भेज दिया गया।

अब वसुंधरा राजे के द्वारा यदि राजस्थान की वर्तमान सरकार के खिलाफ खुलकर बोलने का साहस नहीं किया जाएगा तो निश्चित रूप से यह माना जाएगा कि राष्ट्रीय नेतृत्व के द्वारा उनको भविष्य को लेकर कोई आश्वासन नहीं दिया है।

इससे पहले कहा जा रहा था कि वसुंधरा राजे राष्ट्रीय नेतृत्व के समक्ष राष्ट्रीय महामंत्री बनने की अपनी शर्त रख सकती हैं, किंतु भाजपा सूत्रों ने दावा किया है कि राष्ट्रीय नेतृत्व की तरफ से वसुंधरा राजे को अधिकतम किसी राज्य का राज्यपाल बनाए जाने का महज आश्वासन देकर विदा कर दिया गया है।

यदि यह बात सही है तो निश्चित रूप से आने वाले 5-6 दिनों में जहां मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच चल रही कांग्रेस की कलह विधानसभा के माध्यम से खुलकर सामने आ जाएगी, वहीं इसी अवसर पर भाजपा के बीच एकता है या कलह है, इस बात का भी खुलासा हो जाएगा।

फिलहाल भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं में चर्चा है कि पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे किसी भी तरह से राष्ट्रीय नेतृत्व के समक्ष दबाव बनाकर अपनी खोई हुई राजनीतिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने का प्रयास कर रही हैं, इसी का परिणाम है कि उनके 10 साल के मुख्यमंत्री काल में जिन लोगों को विभिन्न प्रकार से ओब्लाइज्ड किया गया था, उनके द्वारा सोशल मीडिया के माध्यम से सच्ची-झूठी खबरें प्रसारित की जा रही हैं।

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सोमवार से शुरू हो रहे इस सप्ताह को राजस्थान की राजनीति के लिए बेहद खास माना जा रहा है। इसी सप्ताह में जहां राजस्थान हाई कोर्ट के द्वारा बसपा के 6 विधायकों की योग्यता को लेकर सुनवाई हो रही है, वहीं 14 अगस्त से राजस्थान विधानसभा का सत्र शुरू होने जा रहा है, जिसमें राज्य सरकार खुद की ही परीक्षा करवा सकती है।