पांच मंत्रियों सहित 17 विधायकों पर गहलोत की खास नजर, मौका देख कर बदल सकते हैं पाला

नई दिल्ली/जयपुर। अति आत्मविश्वास में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की लगातार रणनीतिक चूक और अदालत से कोई राहत नहीं मिलने के बाद राजस्थान की कांग्रेस सरकार पर संकट गहराता जा रहा है।

कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि हड़बड़ाए मुख्यमंत्री गहलोत को विधायकों की बाड़ेबंदी लंबी चलने की सार्वजनिक घोषणा करनी पड़ी है।

मुख्यमंत्री को आशंका है कि सरकार पर संकट के बादल नहीं छंटने पर भी यदि बाड़ेबंदी समाप्त कर दी गई तो 1 दर्जन से अधिक विधायक पाला बदल सकते हैं। यहां तक की 4 से अधिक मंत्री भी अभी तक पायलट के संपर्क में बताए जाते हैं।

आलाकमान तक भी यह खबरें पहुंची है कि गहलोत की बाड़ेबंदी में करीब डेढ़ दर्जन विधायक पायलट से सहानुभूति रखते हैं। इन खबरों से आलाकमान चिंतित है।

सूत्रों के अनुसार बाड़ेबंदी में भी गहलोत के निजी व्यक्ति पांच मंत्रियों सहित 17 विधायकों पर विशेष नजर बनाए हुए हैं तथा इनकी सभी गतिविधियों की हर 2 घंटे में सीधे मुख्यमंत्री गहलोत को रिपोर्ट की जाती है।

इन पर है खास नजर

इन विधायकों में रघु शर्मा, प्रतापसिंह खाचरियावास, परसादीलाल मीणा, उदयलाल आंजना,राजेन्द्र यादव, जाहिदा, रोहित बोहरा, प्रशान्त बैरवा, दानिश अबरार, बाबूलाल बैरवा, रामनारायण मीणा, अमीन कागजी, गोविन्द मेघवाल, चेतन डूडी, राजेन्द्र विधूड़ी, दिव्या मदेरणा, संदीप कुमार शामिल हैं।

सूत्रों के अनुसार चिंतित आलाकमान ने एक बार फिर सचिन पायलट से बातचीत का चैनल खोला है, वहीं गहलोत को निर्देश दिया गया है कि वह केंद्र सरकार को कोई मौका नहीं दें‌, इसी आधार पर राजस्थान में राजभवन के सामने प्रदर्शन टाल दिया गया है।

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गहलोत की लगातार चूक, सीपी जोशी को भी निपटाया

राजस्थान की राजनीति के अजातशत्रु माने जाने वाले मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ताजा राजनीतिक संकट में पहली बार लगातार रणनीतिक चूक करते हुए नजर आ रहे हैं।

विश्वस्त सूत्रों का कहना है कि मुख्यमंत्री ने अति आत्मविश्वास में पहले विधानसभा सत्र बुलाकर विश्वास मत हासिल करने के बजाए फौरी तौर पर सचिन पायलट गुट को निपटाने का प्रयास किया।

इसके लिए स्पीकर सीपी जोशी का इस्तेमाल किया गया‌। तेजतर्रार माने जाने वाले स्पीकर सीपी जोशी इस बार गहलोत की चाल में फंस गए और उनके टूल बन गए।

सूत्रों का तो यहां तक कहना है कि जोशी अब गहलोत पर अंधविश्वास कर पछता रहे हैं।

जोशी जानते हैं की विधानसभा के बाहर होने वाली विधायक दल की बैठक विधाई कार्य का हिस्सा नहीं है तथा उस पर पार्टी व्हिप लागू कराने की जिम्मेदारी स्पीकर कि नहीं, बल्कि पार्टी की होती है।

इसके बावजूद जोशी ने गहलोत की चाल में फंस कर आनन-फानन में विधायकों को नोटिस जारी कर दिए।

यही नहीं, मामला कोर्ट में गया तो गहलोत की बात मान कर ही जोशी ने अपना वकील हाई कोर्ट भेज दिया, जबकि एक समानांतर संवैधानिक संस्था होने के नाते जोशी को इसकी आवश्यकता नहीं थी।

बताया जाता है कि हाईकोर्ट से कोई राहत नहीं मिलने पर जोशी ने अनावश्यक रूप से गहलोत की सलाह मानकर इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।

इस पूरे प्रकरण से जोशी की समझदार छवि को नुकसान पहुंचा। स्पीकर को सुप्रीम कोर्ट में भी कोई राहत नहीं मिली तो अब उनके पास कोई चारा नहीं बचा है।

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आमतौर पर सोच समझकर बोलने के लिए तथा मीडिया का उपयोग करने के लिए विख्यात मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, सरकार पर संकट की बौखलाहट में अपना संतुलन खो बैठे और पहले सचिन पायलट को नाकारा और निकम्मा कहकर अपनी भद्द पिटवाई।

बाद में मुख्यमंत्री और गृह मंत्री रहते राजभवन का घेराव करने एवं सरकार की जिम्मेदारी से पीछे हटने का बयान देकर बुरी तरह फस गए।

हालात यह बने की शुक्रवार को राजभवन का सत्र बुलाने तक घेराव करने की घोषणा करने वाले गहलोत को ना केवल पार्टी आलाकमान से फटकार पड़ी, वही केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रपति शासन की आहट मिलने पर तत्काल धरना समाप्त कर विधायकों को होटल दौड़ाना पड़ा।