राजनीतिक चर्चाओं में फिर से एक 1993 का वो सियासी हादसा ताजा हो गया

जयपुर। राजस्थान की राजनीति में जिस तरह से 24 जुलाई को राजस्थान हाई कोर्ट की डबल बेंच का फैसला आया और उसके बाद दिल्ली रोड पर स्थित मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के स्वामित्व वाली एक होटल से सीएम अशोक गहलोत, उनका पूरा मंत्रिमंडल और उनको समर्थन देने वाले तमाम विधायकों को दो बसों में भरकर राजभवन में लाया गया और जिस तरह से मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के द्वारा राज्यपाल कलराज मिश्र को मीडिया के माध्यम से चेतावनी देते हुए कहा गया कि अगर राज्यपाल ने विधानसभा सत्र आहूत करने के निर्देश नहीं दिए तो प्रदेश की जनता राजभवन को घेर लेगी और उसकी जिम्मेदारी हमारी नहीं होगी।

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के इस बयान के बाद राजभान में दो बसों में भरकर तमाम मंत्रियों और विधायकों को लाया गया और राजभवन परिसर में ही मंत्रियों विधायकों के द्वारा राज्यपाल और केंद्र सरकार के खिलाफ नारेबाजी की गई। राजभवन परिसर में ही मंत्री और विधायक धरने पर बैठे।

उसके बाद राजनीतिक हलकों में 1993 का वह राजनीतिक घटनाक्रम फिर से ताजा हो गया। उस वक्त कांग्रेस के 76 विधायक जीतकर आये थे।

वरिष्ठ पत्रकार नारायण बारेठ बताते हैं कि तत्कालीन भाजपा नेता स्वर्गीय भैरों सिंह शेखावत के द्वारा भारतीय जनता पार्टी के 95 और 11 निर्दलीय विधायकों के साथ राजभवन गए थे और तत्कालीन राज्यपाल बलिराम भगत के द्वारा तत्कालीन केंद्र सरकार के दबाव में विधानसभा का सत्र नहीं बुलाने और सरकार को अल्पमत में बताने का प्रयास किया गया था।

तब पूरा सियासी ड्रामा कुल 3 दिन तक चला था। उसी तरह से एक बार फिर से राजभवन में पूरी गतिविधि ने राजनीति के जानकारों को सोचने पर मजबूर कर दिया। जयपुर में बरसों से राजनीति को नजदीक से देख रहे कुछ वरिष्ठ पत्रकार बताते हैं कि तब निर्दलीय विधायकों के साथ भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन नेता भैरों सिंह शेखावत ने राज्यपाल बलिराम भगत के समक्ष अपनी सरकार गठन के लिए दावा पेश किया गया था।

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लेकिन उन्होंने बहुमत नहीं होने का हवाला देते हुए भैरों सिंह शेखावत की सरकार के गठन से इंकार कर दिया था, तब भी राजभवन में शुक्रवार ही की तरह हाई प्रोफाइल पॉलिटिकल ड्रामा चला था।

तब 1993 में तत्कालीन भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी एक विशेष विमान से जयपुर आए थे और राजभवन में बलिराम भगत से मुलाकात की थी।

इसके साथ ही भाजपा के ही वरिष्ठ नेता अटल बिहारी वाजपेई ने तत्कालीन राष्ट्रपति से मुलाकात करके पूरे संवैधानिक संकट को टालने के लिए गुहार लगाई थी।

इसके बाद राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा के द्वारा तत्कालीन राज्यपाल बलिराम भगत को निर्देश दिए गए थे कि सबसे बड़ा दल होने के नाते भाजपा के नेता भैरोंसिंह शेखावत को सरकार गठन के लिए आमंत्रित किया जाए।

उसके बाद भैरों सिंह शेखावत की सरकार बनी और पूरे 5 साल तक चली थी। तब कुल 22 मंत्री बने, जिनमें से 10 निर्दलीय विधायक थे।

शुक्रवार को दिल्ली रोड पर स्थित अशोक गहलोत के स्वामित्व वाली होटल से लेकर राजभवन में कलराज मिश्र के सामने सरकार के मंत्रियों और विधायकों के द्वारा नारेबाजी करने देर रात तक धरने पर बैठने और मुख्यमंत्री के द्वारा ही संवैधानिक पद पर बैठे हुए राज्यपाल को एक तरह से चेतावनी देने के बाद राजनीति के जानकारों ने 1993 का वो राजनीतिक हादसा याद किया।