सीबीआई जांच करवा लो फांसी पर लटका दो, लेकिन मैं मानेसर नहीं गया डॉ. पूनियां

जयपुर। भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष डॉ सतीश पूनिया ने उनको लेकर कुछ मीडिया संस्थानों और खुद मुख्यमंत्री के द्वारा सचिन पायलट के में से मिलने के लिए हरियाणा के मानेसर में जाने की खबरों को लेकर आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया है।

भाजपा अध्यक्ष ने अशोक गहलोत और जिन मीडिया संस्थानों के द्वारा उनके मानेसर में जाकर कांग्रेस के विधायकों व सचिन पायलट से मिलने का दावा किया गया था उन पर प्रहार करते हुए कहा कि यदि इस मामले में जरा सी भी सच्चाई है तो सीबीआई जांच करवा लें फांसी पर लटका दें, लेकिन मैं मानेसर नहीं गया था।

इसके साथ ही भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि पॉलिटिकल ड्रामा के एपिसोड में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का प्रवचन सुना तो अफसोस हुआ कि जिस तरीके की भाषा का इस्तेमाल उन्होंने किया, इस स्थिति की कभी कल्पना नहीं की थी।

फेयर माउंट होटल पहले भी सुर्खियों में रही है, एक बार फिर से उसकी चर्चाएं हैं, लेकिन इस बार चर्चा अलग रूप में हुई है। कुछ बातें वापस रिपीट होती हैं, लेकिन राजस्थान के इस ड्रामे में नायक भी कांग्रेस और खलनायक भी कांग्रेस पार्टी है।

और मुख्यमंत्री गहलोत के द्वारा इसकी तोहमत बीजेपी पर मढ़ी जा रही है। सोशल मीडिया पर कई जानकारियां मिलती हैं और उसमें सुभाष चंद्र बोस के कालखंड में 1939 से लंबी फेहरिस्त है, जिसमें चक्रवर्ती राजगोपालाचारी हैं, चौधरी चरण सिंह, मोरारजी देसाई के अलावा अनेक ऐसे उदाहरण हैं, वह कांग्रेस पार्टी को छोड़कर गए तो उसमें क्या बीजेपी का हाथ था?

राजस्थान में उनके पार्टी का अध्यक्ष अपनी पार्टी छोड़ता है, तो उनकी अपनी पार्टी में ही बीजेपी का हाथ कैसे हो सकता है?

यह भी पढ़ें :  सोनिया गांधी की झिड़की के बाद अशोक गहलोत ने की सचिन पायलट के साथ मुलाकात

10 दिन से ऊपर हुए अभी तक यह जवाब नहीं दिया कि वो लोग बाड़े में बंद क्यों हैं और कब तक रहेंगे? गहलोत बातें तो बहुत करते हैं, संवेदनाएं मानवता है जैसी कई बातें करते हैं।

होटल में विधायकों द्वारा कैरम खेला जा रहा है, फुटबॉल खेले जा रही है, मुग़ल-ए-आज़म, शोले जैसी फिल्में देखी जा रही हैं, इतना ही नहीं, अपितु सोनिया गांधी को खुश करने के लिए इटालियन डिस बनाई जा रही हैं।

होटल अभिराजरंग और रातरंग का केंद्र बन गया। राजनीति की सुचिता को भूल शब्दों की मर्यादा को भी भूल गए हैं। राजस्थान में कोरोना के संक्रमण की दर बढ़ती जा रही है, 550 से ज्यादा लोग कोरोना से मरे गए हैं।

टिड्डी के कारण लोग त्राहि-त्राहि कर रहे हैं, बिजली के बिल की माफी की बात कर रहे हैं, अपराध बेलगाम बढ़ रहे हैं, उसका कोई कहीं उल्लेख नहीं हो रहा है, वह गृहमंत्री भी हैं और मुख्यमंत्री भी हैं।

डॉ पूनियां ने कहा कि हमारे राष्ट्रीय प्रवक्ता ने भी साफ तौर से कहा कि राजस्थान में अप्रत्यक्ष रूप से आपातकाल है, यह साफ तौर से दिख भी रहा है।

धारा 124a, जिसका अंग्रेजों ने महात्मा गांधी और लोकमान्य तिलक पर लगाई, उसका इस्तेमाल अपने ही नेता पर लगाई है।

जिस तरीके से एसओजी, एसीबी का भेजा दुरुपयोग किया जा रहा है, जब सीबीआई का डर लगा, अब सीबीआई राज्य सरकार की सहमति के बाद ही किसी मामले की जांच करेगी।

इसका मतलब दाल में कुछ काला है, इस कालखंड में हुई वह भी सामने आ जाती है। ऐसे लग रहा है कि उन्होंने हार मान ली है। ऐसे ही असंतुलित भाषा, व्यक्ति जब ही बोलता है, तब उसका नैतिक साहस कमजोर हो जाता है।

यह भी पढ़ें :  महिला प्रोफेसर्स का रेप करने की धमकी, लाचार पुलिस, बेखौफ बदमाश

खुद के मानेसर जाने की खबरों को लेकर अध्यक्ष ने कहा कि मैं पार्टी का अध्यक्ष हूं, दिल्ली जाता हूं, संगठन के काम से जाता हूं तो क्या मैं सरकार गिराने ही जाता हूं, जो बात की गई, उनसे मेरा सख्त ऐतराज है।

मैं मानेसर नहीं गया, न ही सचिन पायलट के लोगों से मिला, इस बात पर आपत्ति है। आप अपनी लड़ाई में किसी तीसरे व्यक्ति को घुसा रहे हो, क्या इसके सरकार बच जाएगी? क्या यही हमारी नैतिक जिम्मेदारी है?

सरकार बचाने की बड़ी परेशानी है, सरकार उनके अपने कर्मों से जा रही हैं। आलाकमान ने चार-चार प्रभारी और प्रवक्ता लगा रखे हैं, कुछ और भाषा बोल रहे हैं और मुख्यमंत्री कुछ अलग भाषा बोल रहे हैं।

राजस्थान को तमाशा बना रखा है, आप बाड़े पर 3 लेयर की सुरक्षा, बीटीपी के विधायकों के साथ ज्यात्ति, लोगों का ऐसा आचरण, चलती प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रतिज्ञा, हैरान करने वाला दिख रहा है।

साफ तौर से जाहिर है कि सरकार कमजोर है, मुख्यमंत्री कमजोर हैं, जिस तरीके की भाषा वह बोल रहे हैं, जिस तरीके से प्रधानमंत्री, गृहमंत्री को ताना देते हैं, इसमें ऐसा लग रहा है कि उन्होंने नैतिक रूप से हार मान ली।

आज की उनकी बातचीत से साफ है कि एक बड़े प्रदेश का मुख्यमंत्री पहले ही अपने लोगों के खिलाफ बोल रहा है, इस तरीके की भाषा इस तरीके से संसदीय आचरण में इस तरीके की भाषा का कोई स्थान नहीं है, दुर्भाग्यपूर्ण है।

जिस तरीके से पूरी सरकार बंधक है, विधायकों को उनके लोग ढूंढ रहे हैं, मंत्रियों को ढूंढ रहे हैं, सारे काम ठप पड़े हैं, यह अगर आपातकाल नहीं तो क्या है?

यह भी पढ़ें :  Loksabha chunav 2019: RLP को मिल सकती है नागौर के अलावा बाड़मेर और भरतपुर की सीट

सरकार अपने कर्मों से जा रही है, इसमें हमारा कोई लेना देना नहीं है। इस तरीके की भाषा की अपेक्षा राजस्थान के मुख्यमंत्री जैसे पद पर बैठे व्यक्ति से नहीं की जा सकती, शोभा नहीं देती।