गहलोत ने भाजपा की तरफ मुंह करके थूंका, थूंक खूद गहलोत के मुंह पा आ गिरा

गहलोत ने भाजपा की तरफ मुंह करके थूंका, थूंक खूद गहलोत के मुंह पा आ गिरा

जयपुर। राजस्थान में चल रही सियासी जंग की पहली लड़ाई तो राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने जीत ली है, ऐसा प्रतीत हो रहा है, लेकिन अभी घोड़े अस्तबल से निकले नहीं हैं, और आगे अभी भारी संग्राम हो सकता है। राज्यसभा चुनाव के दौरान प्रदेश के राजनीति में आरोप प्रत्यारोप का जो ऊफान आया था, वह धीरे धरे शांत होने लगा था, लेकिन पहले गहलोत के भक्त कहे जाने वाले निर्दलीय विधायक संयम लोढ़ा ने अपने ‘मालिक’ गहलोत को खुश करने के लिए भाजपा अध्यक्ष डॉ. सतीश पूनियां के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का जो प्रस्ताव दिया, वही गहलोत के लिए गले की हड्डी बन गया।

काफी समय से कोरोना के कालखंड़ में जनता की सेवा कर शांत बैठे समुद्र रुपी भाजपा में कंकर उछालकर कांग्रेस की सरकार को संयम लोढा ने फिर से भंवर फंसा दिया। भाजपा ने न केवल गहलोत के खिलाफ ही विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव विधानसभा अध्यक्ष को दिया, बल्कि ऐसा करवाकर गहलोत ने किसी सीएम के खिलाफ ऐसा प्रस्ताव पाकर इतिहास बना दिया।

कांग्रेस के जानकारों का कहना है कि राज्यसभा चुनावों से पूर्व भाजपा की ओर से हॉर्स ट्रेडिंग की कोशिश की गई थी। एसओजी को इसकी सूत्रों से जानकारी मिलते ही कांग्रेस की ओर से एसओजी में मामला दर्ज करवा दिया गया। इस बीच राज्यसभा चुनाव संपन्न हो गए। इसके बाद न तो कोई खरीददार पकड़ में आया और न ही बिकाऊ घोड़ों का पता चल सका। जिसके बाद से सारा मामला शांत होने लगा।

ऐसा लग रहा था कि सरकार यह जानना ही नहीं चाहती थी कि खरीदार कौन थे और बेचने वाले कौन थे? किंतु गहलोत को काफी समय से प्रसन्न कर मंत्री बननी की कोशिशों में जुटे उनके भक्त निर्दलीय विधायक संयम लोढ़ा ने 24 विधायकों को कांग्रेस उम्मीदवारों के पक्ष में वोटिंग करने के लिए सरकार द्वारा खान आवंटन, रीको में प्लाट और केस ट्रांजेक्शन का आरोप लगाने वाले भाजपा प्रदेशाध्यक्ष के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव पेश कर दिया।

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यहीं पर आकर सबकुछ ‘सत्यानाश’ हो गया। भाजपा ने इसका जवाब देने के लिए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव पेश कर दिया। ऐसा विशेषाधिकार का हनन का प्रस्ताव पाने वाले पहले मुख्यमंत्री बन गए।

भाजपा ने मुख्यमंत्री के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का जो पत्थर उछाला, उसने मुख्यमंत्री, उपमुख्यमत्री के बीच बीते पौने दो साल से जो शीतयुद्ध चल रहा था, वह खुलकर महाभारत में बदल गया। एक मुख्यमंत्री के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव पेश करना बहुत बड़ी बात होती है। प्रस्ताव पेश होते ही कांग्रेस में हड़कंप मच गया और वह इसकी काट ढूंढने लगी, पर लगता है खिसियानी बिल्ली खंभा नौचे की कहावत ने गहलोत को आग बबूला कर दिया।

गृहमंत्री अशोक गहलोत एसओजी के द्वारा भी कई खरीदारों का दावा किया गया और बिकाऊ घोड़ों उर्फ बकरों के सबूत मिल गए। एसओजी ने भी कमाल कर दिया, सूत्रों की सूचना के आधार पर तीन उन विधायकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली, जो पिछले दिनों कांग्रेस के साथ थे।

आईपीसी की धारा 124ए के तहत, जो कि देशद्रोह की धारा है, का मुकदमा उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के खिलाफ ही दर्ज कर दिया। इसके बाद सचिन पायलट दिल्ली चले गए। धीरे-धीरे करके उनके खेमे के भी कई विधायक राजस्थान के बाहर निकल गए और उनकी संख्या बढ़कर करीब 30 हो गई।

इसका पता चलते ही गहलोत सतर्क हो गए। पायलट खेमे के एकसाथ बाहर निकलने को कांग्रेस के खिलाफ खुला विद्रोह माना गया और केंद्रीय नेतृत्व तक सारे सबूत पहुंचा दिए गए। आनन फानन में मीटिंग्स कीं और मुख्यमंत्री के दावेदार सचिन पायलट को न केवल मंत्री पद से, बल्कि पीसीसी चीफ के पद से भी बर्खास्त कर दिया गया। उनके कट्टर समर्थक दो मंत्रियों को भी बर्खास्त कर दिया गया।

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सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व की ओर से सचिन पायलट खेमे को पिछले तीन दिनों से लगातार कहा गया कि गलती तो कर दी, लेकिन अभी भी मौका है कि गलती मान लो और वापस जयपुर लौट जाओ, लेकिन पायलट खेमे ने पीछे हटने के बजाए शेरदिल साथियों के साथ वापसी की सभी सीमाएं बंद कर दीं। अंतत: इज्जत बचाने के लिए कांग्रेस ने पायलट खेमे के खिलाफ कार्रवाई करनी पड़ी।