प्रदेश नेतृत्व को चुनौती देते भाजपा के नेता, आखिर किसके इशारे पर चल रहा है ये सब?

जयपुर।
राजस्थान में पिछले कुछ दिनों से केंद्र की सरकार के एक साल पूरा होने पर वर्चुअल रैलियों का दौर चल रहा है। सबसे पहले 14 जून को केंद्रीय मंत्री स्मृति इरानी की रैली, फिर 20 जून को अध्यक्ष जेपी नड्डा की रैली और आखिर में 27 जून को नितिन गडकरी की रैली ने वर्चुअल रैली के द्वारा सोशल मीडिया के दर्शकों के रिकॉर्ड बना डाले।

भाजपा के प्रदेश नेतृत्व को इस बात का पूरा श्रेय दिया जाना चाहिए कि इस तरह की रैलियों का सफल आयोजन कर एक इतिहास बनाया है। कांग्रेस पार्टी और प्रदेश की सरकार जहां अब तक इस प्लेटफॉर्म का उपयोग करने का सपना भी ढ़ंग से नहीं देख पा रही है, वहां भाजपा अध्यक्ष डॉ. सतीश पूनियां ने संगठन के एकीकरण के साथ अपनी बढ़ती ताकत का अहसास भी करा दिया है।

किंतु सबसे सोचनीय बात यह है कि इन रैलियों में प्रदेश भाजपा के कुछ नेताओं की कार्यप्रणाली काफी सवालों के घेरे में है। ये नेता केवल प्रदेश नेतृत्व को स्वीकार ही नहीं कर पा रहे हैं, बल्कि इसको खुलकर जाहिर भी करने की हिमाकत दिखा पा रहे हैं।

wp 1593346630932भाजपा के वर्तमान में विधायक और पूर्व में कैबिनेट मंत्री रहे कालीचरण सराफ, पूर्व कैबिनट मंत्री अरूण चतुर्वेदी, वर्तमान विधायक नरपत सिंह राजवी, पूर्व विधायक और पूर्व कैबिनेट मंत्री, जो कि वसुंधरा राजे के एक नंबर मंत्री हुआ करते थे, ऐसे यूनुस खान और पूर्व विधायक अशोक परनामी के नाम ऐसी ही सूची में आते हैं।

जब भी रैली हुई और सोशल मीडिया के माध्यम से उसका प्रचार किया गया तो इन नेताओं ने भाजपा अध्यक्ष डॉ. सतीश पूनियां को अपने सोशल मीडिया पोस्टर्स में से गायब रखा। इनके सोशल मीडिया अकाउंट्स पर नजर डालने पर पता चलता है कि जो पोस्ट इनके द्वारा क्रियेट की गई थीं, उनमें नरेंद्र मोदी, अमित शाह, जेपी नड्डा और खुद की ही महत्व दिया गया।

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दरअसल, राजनीतिक प्रोटोकॉल के अनुसार खुद की फोटो के पहले और केंद्रीय नेतृत्व के बाद भाजपा अध्यक्ष डॉ. सतीश पूनियां की फोटो होनी चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। कुछ नेता तो ऐसे भी थे, जिन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे तक की फोटो लगा ली, लेकिन भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. सतीश पूनियां, जो कि प्रोटोकॉल के हिसाब से प्रदेश भाजपा में पहले स्थान पर आते हैं, उनकी फोटो लगाना मुनासिब नहीं समझा।

हालांकि, इस सूची में पहले उपनेता प्रतिपक्ष राजेंद्र सिंह राठौड़ और पूर्व शिक्षामत्री और वर्तमान विधायक वासुदेव देवनानी का भी नाम था, लेकिन पिछले दिनों ‘नेशनल दुनिआ’ के द्वारा सवाल उठाए जाने के बाद दोनों नेताओं ने अपनी गलती में सुधार कर लिया है।

असल में देखा जाए तो यूनुस खान वसुंधरा राजे के खास हैं, नरपत सिंह राजवी भी पिछले दिनों वसुंधरा राजे से मिलकर गुप्त मंत्रणा कर चुके हैं। अरूण चतुर्वेदी पूर्व अध्यक्ष हैं और आरएसएस पृष्ठभूमि से होने के बाद भी पिछले कार्यकाल के समय वसुंधरा राजे के खेमे में चले गए थे।

wp 1593346630901इसी तरह से अशोक परनामी के बारे में सबको पता है कि वसुंधरा राजे के रहमो करम पर दो बार प्रदेश अध्यक्ष रहे थे। पूर्व मंत्री कालीचरण सराफ को भी वसुंधरा राजे खेमे का ही नेता माना जाता है। ऐसे ही दूसरे कई नेता हैं, जिनपर वसुंधरा का आर्शीवाद रहा है।

राजेंद्र राठौड़ पहले वसुंधरा के करीबी माने जाते थे, लेकिन पिछले कार्यकाल के दौरान दोनों नेताओं के बीच बनी दुनियां अब जग जाहिर हो चुकी हैं। अब तो राठौड़ पूरी तरह से वसुंधरा राजे से दूर निकलकर डॉ. सतीश पूनियां के खास बनने के लगभग करीब हैं। वो लगातार डॉ. पूनियां के सलाहकार की भूमिका में आते जा रहे हैं।

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इसी तरह से शिक्षामंत्री रहे वासुदेव देवनानी भी वसुंधरा राजे के खेमे से निकलकर डॉ. पूनियां के तरफ पलटी मार चुके हैं। वो दिखाना भी चाहते हैं कि उनका वसुंधरा राजे का खेमा पसंद नहीं है और भाजपा अध्यक्ष होने के नाते डॉ. सतीश पूनियां के साथ दिखना पसंद करते हैं।

ऐसे में यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि कालीचरण सराफ, अरूण चतुर्वेदी, अशोक परनामी, यूनुस खान और नरपत सिंह राजवी जैसे कैबिनेट मंत्री रह चुके नेता भाजपा नेतृत्व को अब तकरीबन 10 महीने पूरे होने के बाद भी पचा नहीं पा रहे हैं।

wp 1593346630949किंतु सवाल यह उठता है कि जब केंद्रीय नेतृत्व करीब—करीब स्पष्ट कर चुका है कि अब वसुंधरा राजे का युग समाप्त हो गया और डॉ. सतीश पूनियां के रूप में पार्टी नये नेताओं को आगे बढ़ाने का काम कर रही है, तो ऐसे समय में इन खिलाफत करने वाले नेताओं की इतनी हिम्मत किसके इशारे पर हो रही है?

इस प्रकरण को लेकर जब भाजपा अध्यक्ष डॉ. सतीश पूनियां से सवाल किया गया तो उन्होंने साफ तौर पर कह दिया कि उनको केंद्रीय नेतृत्व के द्वारा अध्यक्ष बनाया गया है और कोई माने या न माने, किंतु जब तक केंद्रीय नेतृत्व चाहेगा, तब तक वो प्रदेशाध्क्ष रहेंगे, इसके लिए किसी भी प्रदेश स्तरीय नेता के प्रमाण पत्र की आवश्यता नहीं है।