राज्यसभा चुनाव को इतना नाटकीय किसने बनाया? गहलोत, पायलट, पूनियां या वसुंधरा?

जयपुर

राजस्थान में आज तीन राज्यसभा सीटों के लिए मतदान हो रहा है, लेकिन उससे पहले लगातार 10 दिन तक राजस्थान में जिस तरह का राजनीतिक ड्रामा चला, उसकी पटकथा किसने लिखी और इससे किसको फायदा हुआ, इसको लेकर भी चर्चा करना बेहद जरूरी हो जाता है।

कांग्रेस पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के उच्च पदस्थ सूत्रों की माने तो राजेंद्र गहलोत को जब बीजेपी ने उम्मीदवार बनाया था, तब उनको उन्हीं के जिले जोधपुर के सांसद और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत की पसंद का प्रत्याशी माना जा रहा था।

सीधे तौर पर देखा जाए तो गजेंद्र सिंह शेखावत और अशोक गहलोत, जिनका बेटा वैभव गहलोत लोकसभा चुनाव में गजेंद्र सिंह शेखावत के सामने जोधपुर में चुनाव हार गया था, उसका बदला लेने के लिए अशोक गहलोत के मन में आज भी टीस है।

इसी तरह से राजनीतिक हलकों में चर्चा यह भी है कि पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और वर्तमान मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बीच अगले चुनाव में संभावित मुख्यमंत्री उम्मीदवार गजेंद्र सिंह शेखावत को पटखनी देने के लिए अभी से तैयारी की जा रही है।

दोस्ती के भारतीय जनता पार्टी की कमान वसुंधरा राजे के धुर विरोधी माने जाने वाले डॉ. सतीश पूनिया के हाथ में है और डॉक्टर सतीश पूनिया के द्वारा ही पुकार सिंह लखावत को पार्टी का दूसरा उम्मीदवार बनाया गया था, क्योंकि संख्याबल कम होने के बावजूद जिस तरह से सरकार को अंदर तक हिलाने के लिए प्रोग्राम बनाया गया था, वह सारा डॉ सतीश पूनिया के दिमाग की ही उपज है।

यह भी पढ़ें :  राजस्थान में 2185 लोग कोरोनावायरस, 41 लोगों की मौत, देखिए जिलेवार आंकड़े

इसका सबसे ज्यादा फायदा हुआ मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को, जिन्होंने एक तीर से दो शिकार किया है। पहला तो यह कि आलाकमान की नजर में खुद बहुत बड़े डिजास्टर मैनेजमेंट साबित करने में कामयाब रहे हैं तो दूसरी तरफ प्रतिद्वंदी उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट को एक बार फिर से आलाकमान की नजर में नीचा दिखाने का पूरा प्रयास किया है।

डॉ सतीश पूनिया के द्वारा पिछले करीब 10 दिन से सरकार के खिलाफ बीजेपी की तरफ से मोर्चाबंदी की जा रही थी। केंद्रीय नेतृत्व के साथ भी डॉ सतीश पूनिया का कम्युनिकेशन जगजाहिर है। दूसरी तरफ वसुंधरा राजे को जिस तरह से नरेंद्र मोदी अमित शाह और जेपी नड्डा के द्वारा दरकिनार किया गया है, जिससे भी राज्य के लिए अशोक गहलोत का सपोर्ट करना लाजमी नजर आता है।

जिस तरह से बीते डेढ़ साल के दौरान केंद्रीय नेतृत्व ने पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को पूरी तरह से दरकिनार करते हुए अगली पीढ़ी के सतीश पूनिया को संभालाकर उनको पूरी राज्य भाजपा हाथ में दे दी है उससे भी वसुंधरा राजे तिलमिलाई हुई हैं।

राजस्थान में दो बार मुख्यमंत्री रहने के नाते वसुंधरा राजे का संगठन में अंदर तक दखल है, लेकिन जिस तेजी से पिछले साल 8 महीने के दौरान सतीश पूनिया ने संगठन को एक नई दिशा दी है और पूरी तरह से सत्ता से दूर एक सक्रिय संगठन के रूप में पहचान दी है, वह भी वसुंधरा राजे के लिए असहनीय होता जा रहा है।

बड़ी बात है कि इस पूरे घटनाक्रम के दौरान जहां सतीश पूनिया के द्वारा बनाई गई रणनीति कारगर साबित हुई और पूरी सरकार में एक जबरदस्त दहशत का माहौल बना, तो दूसरी तरफ इस आपदा को अवसर में बदलते हुए अशोक गहलोत ने सचिन पायलट को एक बार फिर से आलाकमान की नजर में विलेन बनाने में कामयाबी हासिल कर ली।

यह भी पढ़ें :  प्रियंका गांधी वाड्रा की चापलूसी कर रहे मुख्यमंत्री अशोक गहलोत: डॉ. पूनियां

घटनाक्रम में सबसे ज्यादा नुकसान सचिन पायलट को ही हुआ तो कांग्रेस पार्टी और मुख्यमंत्री को यह भी एहसास हो गया कि पूर्व अध्यक्ष अशोक परनामी की तरह सतीश पूनिया व्यक्ति के बजाए संगठन के प्रति वफादार हैं और तगड़ी प्रतिद्वंदी हैं, जिनको वसुंधरा की तरह मैनेज कर पार नहीं पाया जा सकता है।

इस पूरे घटनाक्रम से एक बात और साबित हो गई है कि राजस्थान की राजनीति में सतीश पूनिया भविष्य के एक कद्दावर नेता हैं और केंद्रीय नेतृत्व के साथ कदमताल करके उन्होंने वसुंधरा राजे को राजस्थान की राजनीति से लगभग विदा कर दिया है।

यह भी समझना बेहद आवश्यक है कि 2023 के चुनाव से पहले सतीश पूनिया का इस तरह से बढ़ता कद न केवल वसुंधरा राजे के लिए, बल्कि मुख्यमंत्री की महत्वाकांक्षा पाले गजेंद्र सिंह शेखावत, राज्यवर्धन सिंह राठौड़ और अन्य भाजपा नेताओं के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है।

पिछले दिनों जब सतीश पूनिया के घर पर मिलने के लिए केंद्रीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत पहुंचे और करीब 1 घंटे से ज्यादा समय तक गुप्त मंत्रणा की, तभी स्पष्ट हो गया था कि दोनों नेताओं के बीच में ऐसी खिचड़ी पक रही है, जो वसुंधरा राजे के लिए सियासी तौर पर बेहद खतरनाक है।

माना जा रहा है कि आज शाम को चुनाव समाप्त होने और परिणाम घोषित होने के साथ ही राजस्थान में राजनीतिक घटनाक्रम खत्म हो जाएगा और एक बार फिर से राज्य की सियासत पटरी पर लौट आएगी कांग्रेस के सभी विधायक जो पिछले 10 दिन से एक होटल में कैद हैं, उनको भी आजादी मिल जाएगी।

यह भी पढ़ें :  सिंधिया का इस्तीफा, शाह के साथ एक गाड़ी में निकले तो सियासत में तूफान, शिवराज होंगे अगले मुख्यमंत्री